परमार्थ निकेतन में धूमधाम से मनायी गई गुरूपूर्णिमा
- हिन्दुजा परिवार ने किया गुरूपूजन में सहभाग
- स्वामी चिदानन्द सरस्वती जी महाराज ने भगवान शिव की मनमोहक प्रतिमा भेंट कर हिन्दुजा परिवार का अभिनन्दन किया
- परमार्थ निकेतन में उत्तराखण्ड संस्कृत विश्वविद्यालय के कुलपति पधारे
- चार वेद धामों की स्थापना पर हुई चर्चा
- मानसून सत्र में उत्तराखण्ड संस्कृत विश्वविद्यालय परिसर में वृक्षारोपण पर बनी विशाल योजना
- उत्तराखण्ड विद्या की धरती है, वह विद्वानों की धरती बनें
- जल का संकट जीवन का संकट बन सकता है – स्वामी चिदानन्द सरस्वती
ऋषिकेश, 16 जुलाई। परमार्थ निकेतन में धूमधाम से मनाया गुरूपूर्णिमा पर्व। महामण्डलेश्वर स्वामी असंगानन्द सरस्वती जी महाराज और स्वामी चिदानन्द सरस्वती जी महाराज ने वेद मंत्रों के उच्चारण के साथ पूज्य गुरूओं का पूजन किया। इस अवसर पर देश विदेश से आयें भक्तों, परमार्थ गुरूकुल के ऋषिकुमारों और आचार्यों ने सहभाग किया।


परमार्थ निकेतन में पूज्य स्वामी शुकदेवानन्द सरस्वती जी महाराज का 54 वाँ निर्वाण-महोत्सव मनाया गया। इस अवसर पर श्रीरामचरित मानस का सप्तदिवसीय सामूहिक संगीतमय अखण्ड पाठ का आयोजन किया गया।
परमार्थ निकेतन के परमाध्यक्ष स्वामी चिदानन्द सरस्वती जी महाराज ने उत्तराखण्ड संस्कृत विश्वविद्यालय के कुलपति श्री देवी प्रसाद त्रिपाठी जी से चार वेद धामों की स्थापना पर विस्तृत चर्चा की। चार वेद धामों की स्थापना हेतु परमार्थ निकेतन, उत्तराखण्ड सरकार और बद्री-केदार समिति मिलकर कार्य करें तो बेहतर परिणाम प्राप्त हो सकते है।

स्वामी जी महाराज ने बताया कि उत्तराखण्ड के मुख्यमंत्र श्री त्रिवेन्द्र सिंह रावत जी एवं उत्तराखण्ड सरकार में शिक्षा मंत्री श्री अरविन्द पान्डे जी से चर्चा हुई थी कि उत्तराखण्ड के पास चार धाम है, उसी प्रकार चार वेद धाम भी होने चाहिये क्योंकि इसी पवित्र धरती ने पूरी मानवता को वैदिक मंत्रों के संदेश दिये, ये संदेश पूरे विश्व के लिये धरोहर है। यह संदेश मानवता को जोड़ते है; वसुधैव कुटुम्बकम् का संदेश देते है, सर्वे भवन्तु सुखिनः का नाद करते है तथा ’’आ नो भद्राः क्रतवो यन्तु विश्वतोऽदब्धासो’’ की चर्चा करते है तथा विश्व एक बाजार नहीं बल्कि परिवार है का संदेश देते है। स्वामी जी ने कहा कि बाजार में तो लेन-देन होता है परन्तु परिवार में देने की ही भावना रहती है, समर्पण की भावना रहती है क्योंकि अपनी संस्कृति तो अर्पण, तर्पण और समर्पण की संस्कृति है, इसी भाव को जागृत रखते हुये छात्रों को संस्कार देने पर विशद चर्चा हुयी।

स्वामी चिदानन्द सरस्वती जी महाराज ने कहा कि उत्तराखण्ड के सभी संस्कृत विद्यालयों को डिजिटल लर्निग से जोड़ा जायें ताकि घर बैठे-बैठे लोग वेद का पाठ श्रवण कर सकेंगे, वेदों को पढ़ सकेंगे तथा ऐसे मंत्र जो परिवारिक शान्ति और नवग्रह शान्ति करते हैं, वे गंगा के पावन तट से उन मंत्रों का नाद श्रवण कर सकें इस हेतु भी विशद चर्चा हुई। उन्होने कहा कि परमार्थ निकेतन इसमें महत्वपूर्ण भूमिका निभायेगा। उन्होने कहा कि उत्तराखण्ड विद्या की धरती है वह अब विद्वानों की धरती भी बनें। यही गुरूपूर्णिमा के अवसर पर अपने गुरूओं को सच्ची भावाजंलि और श्रद्धाजंलि होगी।

स्वामी जी महाराज ने कहा कि हम सब मिलकर उत्तराखण्ड के इन वेद विद्यालयों और वैदिक विद्यालयों के माध्यम से जल और पर्यावरण को सहेजें, इस पर भी कार्य करने की आवश्यकता है। हमें जल संरक्षण की शिक्षा को भी मुख्य केन्द्र में रखना होगा। साथ ही हमंें पेड़, पानी, पौधे और पहाडों के संरक्षण के लिये तथा वर्षा जल को सहेजने पर विशेष ध्यान देने की जरूरत है। स्वामी जी ने कहा कि जल शक्ति ही जन शक्ति बनंे यह बहुत जरूरी है। जल के प्रति हर व्यक्ति को जागृत होना होगा। उन्होने बताया कि उत्तराखण्ड की राजधानी के एकदम करीब चकराता, उत्तराखण्ड के आठ गावाें में पानी का कोई भी स्रोत नहीं बचा है वे सभी गांव वर्षा जल पर निर्भर है। इसका मतलब है कि उत्तराखण्ड जो जल का प्रमुख स्रोत है, जीवनदायिनी और मोक्षदायिनी नदियों का प्रदेश है उसके आठ गांवों का जल सूख सकता है तो यह स्थिति देश के अन्य राज्यों में भी आ सकती है। जल का संकट जीवन का संकट बन सकता है।

गुरूपूर्णिमा के महत्व पर प्रकाश डालते हुये स्वामी चिदानन्द सरस्वती जी महाराज ने कहा कि आज का दिन भारतीय संस्कृति और सनातन परम्परा में बहुत ही महत्वपूर्ण है। हमारे शास्त्रों में भी अद्भुत महिमा बतायी गयी है गुरू की। गुरूपूर्णिमा, पूरे विश्व के लिये भारत की ओर से एक बहुत बड़ा संदेश है। आदिकाल से ही यह परम्परा चली आ रही है, गुरू के रूप में महर्षि व्यास जी, सूत जी, वाल्मीकि जी, सांदीपनि जी को जो सम्मान मिला यही तो पूरे विश्व को संदेश है कि भारत केवल मंत्रों को गाता नहीं है कि विश्व एक परिवार है बल्कि जीता भी है तथा भारत ने गुरूओं के रूप में विश्व को अनमोल रत्न दिये है। पूज्य गुरूओं ने वेद, पूराणों और दिव्य ग्रंथों के माध्यम से हमें बताया कि कैसे जियें। स्वामी जी ने श्रद्धालुओं को इन दिव्य ग्रंथों के पढ़ने का संदेश दिया और कहा कि इन दिव्य ग्रंथों के मंत्र जीवन के सभी रहस्यों को खोल सकते है। मंत्रों की गहराई को समझने से मन, वचन, कर्म और विचारों में अद्भुत परिवर्तन होता है।

स्वामी जी महाराज ने कहा कि गुरूपूर्णिमा का दिन हमें यह याद दिलाता है कि हमारा ध्यान उस गुरू तत्व की ओर जाये जो जीवन की सारी निराशाओं को नष्ट कर विशाद युक्त जीवन को प्रसाद बना दे। गुरू की इतनी महिमा है कि भगवान श्री राम और भगवान श्री कृष्ण को भी गुरूकुल में जाकर शिक्षा ग्रहण करनी पड़ी थी। उन्होने कहा कि गुरूकुल अर्थात गुरू का वह कुल जहां पर भीतर का अनुशासन और स्वयं पर शासन गुरू की छत्रछाया में होने लगता है। पूर्णिमा अर्थात पूर्ण-माँ, माँ तो केवल जन्म देती है और गुरू, जीवन प्रदान करता है। प्रतिवर्ष गुरूपूर्णिमा पर्व हमें याद दिलाता है कि जीवन में जो अन्धकार है, उस अन्धकार के मध्य गुरू रूपी ज्योति भी है उससे अपने जीवन को प्रकाशित करे और परमार्थ की ओर बढ़ते रहे।
स्वामी चिदानन्द सरस्वती जी महाराज ने उपस्थित सभी श्रद्धालुओं को मानवता, पर्यावरण और धरा की सेवा का संकल्प कराया। उत्तराखण्ड संस्कृत विश्वविद्यालय के कुलपति श्री देवी प्रसाद त्रिपाठी जी एवं देश विदेश से आये सभी भक्तों को रूद्राक्ष का पौधा देकर विदा किया। सभी भक्तों ने भक्ति भाव से गुरूपूर्णिमा पर्व मनाया।
Editorial Review Note
Written by Religion World — Bhavya Srivastava is the founder of Religion World and a veteran journalist with over 18 years of experience across broadcast, print, and digital media. A founding member of the International Association of Religion Journalists (IARJ), he has spent much of his career reporting on and producing content about religion, faith, and spirituality. View full profile →.
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