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आइये जानते हैं विवाह मुहूर्त, मुहूर्त संशोधन, कुंडली मिलान और त्रिबल शुद्धि क्या है

आइये जानते हैं विवाह मुहूर्त, मुहूर्त संशोधन, कुंडली मिलान और त्रिबल शुद्धि क्या है

आइये जानते हैं विवाह मुहूर्त, मुहूर्त संशोधन, कुंडली मिलान और त्रिबल शुद्धि क्या है
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आइये जानते हैं विवाह मुहूर्त, मुहूर्त संशोधन, कुंडली मिलान और त्रिबल शुद्धि क्या है

विवाह मुहूर्त कैसे निकाले: कुंडली मिलान, मुहूर्त संशोधन और त्रिबल शुद्धि

विवाह मुहूर्त कैसे निकाले – यह लेख इसी विषय पर है। इसमें बताया गया है कि विवाह मुहूर्त कैसे तय किया जाता है और क्यों कुंडली मिलान आवश्यक माना जाता है। साथ ही, मुहूर्त संशोधन की प्रक्रिया, शुभ तिथि-नक्षत्र/वार का उल्लेख और त्रिबल शुद्धि (वर हेतु सूर्य बल, कन्या हेतु गुरु बल और दोनों हेतु चंद्र बल) की भूमिका समझाई गई है।

विवाह मुहूर्त कैसे निकाले: उत्तम मुहूर्त का महत्व

उत्तम मुहूर्त में शादी करने से वर-वधू का दांपत्य जीवन सुखमय बीतता है। बाधाएं उपस्थित नहीं होतीं। अतः विवाह शुभ लग्न व मुहूर्त के साथ-साथ शुद्ध मंत्रोच्चार व विधि-विधान से ही होना चाहिए।

सभी ग्रह अपनी-अपनी उपस्थिति जीवित अवस्था में बताते हैं। यथा ब्रह्मांड तथा पिंडे के कथन के अनुसार प्रत्येक व्यक्ति सभी ग्रहों से पूर्ण है। संसार में पिता के रूप में सूर्य, माता के रूप में चंद्र, भाई के और पति के रूप में मंगल, बहन-बुआ-बेटी के रूप में बुध, धर्म-भाग्य के प्रदाता तथा शिक्षा देने वाले गुरु (बृहस्पति), पत्नी और भौतिक संपन्नता के रूप में शुक्र, जमीन-जायदाद कार्य तथा काम करने वाले लोगों के रूप में शनि, ससुराल और दूर के संबंधियों के रूप में राहु, पुत्र-भांजा-साले आदि के रूप में केतु जीवित रूप में माने जाते हैं।

इन सभी ग्रहों के अनुसार व्यक्ति के लिए विवाह मुहूर्त बनाए गए हैं। जिस प्रकार की प्रकृति व्यक्ति के अंदर होती है उसी प्रकार के ग्रह की शक्ति के समय में विवाह किया जाता है। जब स्त्री और पुरुष के आपसी संबंधों के लिए विवाह मिलान किया जाता है तथा दोनों के ग्रहों को राशि स्वामियों के अनुसार समय तय किया जाता है तभी विवाह किया जाता है, और उसी ग्रह के नक्षत्र के समय में लग्न और समय निकाल कर विवाह किया जाता है।

मुहूर्त संशोधन क्या है और कैसे होता है

पंडित दयानंद शास्त्री के अनुसार हिंदुओं में शुभ विवाह की तिथि वर-वधू की जन्म राशि के आधार पर निकाली जाती है। वर या वधू का जन्म जिस चंद्र नक्षत्र में हुआ होता है, उस नक्षत्र के चरण में आने वाले अक्षर को भी विवाह की तिथि ज्ञात करने के लिए प्रयोग किया जाता है। विवाह की तिथि सदैव वर-वधू की कुंडली में गुण-मिलान करने के बाद निकाली जाती है। विवाह की तिथि तय होने के बाद कुंडलियों का मिलान नहीं किया जाता।

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कुंडली मिलान क्यों किया जाता है

विवाह स्त्री व पुरुष की जीवन यात्रा की शुरुआत मानी जाती है। पुरुष का बायां व स्त्री का दायां भाग मिलाकर एक-दूसरे की शक्ति को पूरक बनाने की क्रिया को विवाह कहा जाता है। भगवान शिव और पार्वती को अर्द्धनारीश्वर की संज्ञा देना इसी बात का प्रमाण है। ज्योतिष में चार पुरुषार्थों में काम नाम का पुरुषार्थ विवाह के बाद ही पूर्ण होता है।

विवाह मुहूर्त कैसे निकाले: शुभ तिथि, नक्षत्र और वार

पंडित दयानंद शास्त्री के अनुसार विवाह मुहूर्त के लिए मुहूर्त शास्त्रों में शुभ नक्षत्रों और तिथियों का विस्तार से विवेचन किया गया है। उत्तराफाल्गुनी, उत्तराषाढ़, उत्तराभाद्रपद, रोहिणी, मघा, मृगशिरा, मूल, हस्त, अनुराधा, स्वाति और रेवती नक्षत्र में; 2, 3, 5, 6, 7, 10, 11, 12, 13, 15 तिथि तथा शुभ वार में तथा मिथुन, मेष, वृष, मकर, कुंभ और वृश्चिक के सूर्य में विवाह शुभ होते हैं। मिथुन का सूर्य होने पर आषाढ़ के तृतीयांश में, मकर का सूर्य होने पर चंद्र पौष माह में, वृश्चिक का सूर्य होने पर कार्तिक में और मेष का सूर्य होने पर चंद्र चैत्र में भी विवाह शुभ होते हैं।

त्रिबल शुद्धि क्या है और क्या विवाह मुहूर्त में जरूरी है

पंडित दयानंद शास्त्री के अनुसार विवाह मुहूर्त का विचार करते समय वर के लिए सूर्य का बल, कन्या के लिए बृहस्पति (गुरु) का बल और वर-कन्या दोनों के लिए चंद्रमा के बल का विचार किया जाता है। यदि सूर्य, चंद्रमा तथा गुरु का बल पूर्ण नहीं हो तो विवाह नहीं किया जाता है।

क्योंकि वर-कन्या के विवाह के समय गुरु जीवनदाता एवं भाग्य विधाता होते हैं। चंद्रमा धन देने वाले तथा मानसिक शांति प्रदान करते हैं। इसी प्रकार सूर्य तेज प्रदान करते हैं। कहने का अभिप्राय यह है कि ये सब ग्रह यदि विवाह के समय पूर्ण अनुकूल हों तो सर्वथा उत्तम हैं और वर-वधु के लिए सौभाग्यशाली होते हैं।

क्या है त्रिबल शुद्धि ?

शास्त्रीय निर्देश: किन स्थितियों में विवाह शुभ नहीं

जन्म लग्न से अथवा जन्म राशि से अष्टम लग्न तथा अष्टम राशि में विवाह शुभ नहीं होते हैं। विवाह लग्न से द्वितीय स्थान पर वक्री पाप ग्रह तथा द्वादश भाव में मार्गी पाप ग्रह हो तो कर्तरी दोष होता है, जो विवाह के लिए निषिद्ध है।

इन शास्त्रीय निर्देशों का सभी पालन करते हैं, लेकिन विवाह मुहूर्त में वर और वधु की त्रिबल शुद्धि का विचार करके ही दिन एवं लग्न निश्चित किया जाता है। कहा भी गया है—

स्त्रीणां गुरुबलं श्रेष्ठं पुरुषाणां रवेर्बलम्।
तयोश्चन्द्रबलं श्रेष्ठमिति गर्गेण निश्चितम्॥

विवाह मुहूर्त कैसे निकाले: त्रिबल विचार के नियम

त्रिबल विचार के लिए वर-कन्या की जन्म राशि से तत्समय जिन-जिन राशियों में गुरू-सूर्य तथा चंद्र विचरण कर रहे हों, वहां तक गिनती की जाती है तथा इनका निर्णय निम्न प्रकार से करते हैं

वर के लिए सूर्य विचार

  • यदि वर की राशि से वर्तमान राशि में गतिशील सूर्य गिनती करने पर चौथे, आठवें या बारहवें स्थान में पड़ें तो ऐसे समय में विवाह नहीं करें। यह पूर्णरूपेण अशुभ है।

  • यदि पहले, दूसरे, पांचवें, सातवें या नवें स्थान में सूर्य पड़े तो सूर्य के दान और पूजादि करके विवाह शुभ हो सकता है।

  • वक्री राशि से यदि सूर्य तीसरे, छठे, दशवें या ग्यारहवें स्थानों में हों तो विवाह अधिक शुभप्रद होता है।

कन्या के लिए बृहस्पति (गुरु) विचार

  • कन्या की राशि से वर्तमान राशि में गतिशील गुरू यदि चौथे, आठवें या बारहवें स्थान में पड़े तो विवाह अशुभ होगा। ऐसे समय में विवाह नहीं करें।

  • यदि पहले, तीसरे, छठे या दशवें स्थान में गुरू हों तो दान-पूजादि करने पर ही शुभकारक होता है।

  • यदि दूसरे, पांचवे, सातवें, नौवें या ग्यारहवें स्थान में गुरू हों तो शुभप्रद होंगे। यानी विवाह करना शुभ रहेगा।

चंद्र विचार (दोनों के लिए)

  • यदि वर-कन्या दोनों की राशि से चंद्रमा चौथे, आठवें या बारहवें स्थान में पड़े तो अशुभ है। ऐसे में विवाह नहीं करें।

  • अन्य सभी स्थानों पर चंद्रमा के रहते विवाह करना शुभ रहेगा।

 

निष्कर्ष

सारांश यह है कि सूर्य-चंद्र तथा गुरु तीनों ही विवाह के समय यदि चौथे, आठवें या बारहवें स्थान पर पड़ें तो अशुभ होते हैं। इस समय विवाह नहीं करें। कुछ शास्त्रकार पुरुष के लिए बारहवें चंद्रमा को शुभ मानते हैं, परन्तु स्त्री के लिए बारहवां चंद्रमा सर्वथा निषिद्ध है। इसी प्रकार त्रिबल विचार में ग्यारहवां स्थान सर्वथा शुभ होता है।

सिंह राशि भी गुरु की मित्र राशि है, लेकिन सिंहस्थ गुरु वर्जित होने से मित्र राशि में गणना नहीं की गई है। भारत की जलवायु में प्रायः 12 वर्ष से 14 वर्ष के बीच कन्या रजस्वला होती है। अतः बारह वर्ष के बाद या रजस्वला होने के बाद गुरु के कारण विवाह मुहूर्त प्रभावित नहीं होता है।

यह भी पढ़ें – नाड़ी दोष का महत्व

FAQs

1) विवाह मुहूर्त कैसे निकाले?
विवाह मुहूर्त निकालते समय शुभ तिथि, नक्षत्र और वार के साथ-साथ वर-वधू की कुंडली में गुण-मिलान और आवश्यक शुद्धियों (जैसे त्रिबल शुद्धि) का विचार किया जाता है।

2) विवाह मुहूर्त तय करने से पहले कुंडली मिलान क्यों किया जाता है?
लेख के अनुसार विवाह की तिथि सदैव वर-वधू की कुंडली में गुण-मिलान करने के बाद ही निकाली जाती है। तिथि तय होने के बाद कुंडलियों का मिलान नहीं किया जाता।

3) मुहूर्त संशोधन क्या होता है?
मुहूर्त संशोधन में वर-वधू की जन्म राशि के आधार पर शुभ विवाह तिथि निकाली जाती है। इसके साथ जन्म के चंद्र नक्षत्र के चरण में आने वाले अक्षर का प्रयोग भी तिथि ज्ञात करने के लिए बताया गया है।

4) त्रिबल शुद्धि क्या है?
त्रिबल शुद्धि में विवाह मुहूर्त के समय वर के लिए सूर्य बल, कन्या के लिए गुरु (बृहस्पति) बल और वर-कन्या दोनों के लिए चंद्र बल का विचार किया जाता है।

5) त्रिबल शुद्धि में कौन से स्थान अशुभ माने गए हैं?
लेख के अनुसार सूर्य, गुरु और चंद्र—यदि वर/कन्या की जन्म राशि से गिनती करने पर चौथे, आठवें या बारहवें स्थान पर पड़ें, तो वह समय अशुभ माना गया है और ऐसे समय में विवाह नहीं करने की बात कही गई है।

6) वर के लिए सूर्य बल का नियम क्या बताया गया है?
लेख के अनुसार वर की राशि से सूर्य चौथे, आठवें या बारहवें स्थान में पड़े तो विवाह नहीं करना चाहिए। पहले, दूसरे, पांचवें, सातवें या नवें स्थान में होने पर दान/पूजा के बाद शुभ हो सकता है, और तीसरे, छठे, दशवें या ग्यारहवें स्थान में अधिक शुभप्रद बताया गया है।

7) कन्या के लिए गुरु बल का नियम क्या बताया गया है?
लेख के अनुसार कन्या की राशि से गुरु चौथे, आठवें या बारहवें स्थान में पड़े तो अशुभ है। पहले, तीसरे, छठे या दशवें स्थान में दान/पूजा के बाद शुभकारक बताया गया है, और दूसरे, पांचवें, सातवें, नौवें या ग्यारहवें स्थान में शुभप्रद बताया गया है।

8) चंद्र बल (दोनों के लिए) का नियम क्या है?
लेख के अनुसार वर-कन्या दोनों की राशि से चंद्रमा चौथे, आठवें या बारहवें स्थान में पड़े तो अशुभ है। अन्य सभी स्थानों में चंद्रमा के रहते विवाह करना शुभ बताया गया है।

9) किन नक्षत्रों और तिथियों में विवाह शुभ बताया गया है?
लेख में उत्तराफाल्गुनी, उत्तराषाढ़, उत्तराभाद्रपद, रोहिणी, मघा, मृगशिरा, मूल, हस्त, अनुराधा, स्वाति और रेवती नक्षत्र; तथा 2, 3, 5, 6, 7, 10, 11, 12, 13, 15 तिथि को शुभ बताया गया है।

10) विवाह मुहूर्त में कर्तरी दोष कब माना गया है?
लेख के अनुसार विवाह लग्न से द्वितीय स्थान पर वक्री पाप ग्रह और द्वादश भाव में मार्गी पाप ग्रह होने पर कर्तरी दोष बताया गया है, जिसे विवाह के लिए निषिद्ध कहा गया है।

11) 2027 में विवाह के शुभ मुहूर्त कब-कब हैं?
2027 में विवाह के लिए कई शुभ मुहूर्त बताए गए हैं। विवाह की शुभ तिथि तय करते समय तिथि, वार, नक्षत्र और अन्य ज्योतिषीय योगों के साथ वर-वधू की कुंडली का भी विचार किया जाता है। 2027 के महीनेवार सभी शुभ विवाह मुहूर्त, तिथि और समय की पूरी जानकारी इस लेख में दी गई है।

ज्योतिषाचार्य पंडित दयानंद शास्त्री जी 

RW

Editorial Review Note

Reviewed by Bhavya Srivasava on September 1, 2026.

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July 8, 2019 9 min read
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