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छठ पूजा तिथि और मुहूर्त और महत्व : सूर्य देव का महात्यौहार

छठ पूजा तिथि और मुहूर्त और महत्व : सूर्य देव का महात्यौहार

छठ पूजा तिथि और मुहूर्त और महत्व : सूर्य देव का महात्यौहार
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छठ पूजा तिथि और मुहूर्त और महत्व : सूर्य देव का महात्यौहार

छठ पूजा तिथि और मुहूर्त और महत्व : सूर्य देव का महात्यौहार

इस बार छठ पर्व पर कई दुर्लभ शुभ संयोग बन रहे हैं जो शुभ फलदायी और समृद्धिदायक हैं। रविवार भगवान सूर्य का दिन माना जाता है इस दिन से छठ आरंभ हो रहा है। 11 नवंबर रविवार को नहाय-खाए पर सिद्धि योग का संयोग बन रहा है। सांझ के अर्घ्यवाले दिन यानी 13 नवंबर को अमृत योग और सर्वार्थ सिद्धि योग का संयोग बन रहा है।

छठ के अंतिम दिन अर्थात प्रात:कालीन अर्घ्य पर बुधवार 14 नवंबर को सुबह के समय छत्र योग का संयोग बन रहा है। इस योग को धन और समृद्धिदायक माना गया है।

13 नवंबर 2018, मंगलवार के दिन षष्ठी तिथि का आरंभ 01:50 मिनट पर होगा जिसका समापन 14 नवंबर 2018, बुधवार के दिन 04:21 मिनट पर होगा।

13 नवंबर 2018 (संध्या अर्घ्य)
सूर्यास्त का समय – 17:28:46

14 नवंबर 2018 (उषा अर्घ्य)
सूर्योदय का समय – 06:42:31

ये हैं छठ पूजा के 4 दिन एवं पूजा विधि..

1. पहला दिन नहाय खाय

कार्तिक शुक्ल चतुर्थी को यह व्रत आरंभ होता है। इसी दिन व्रती स्नान करके नए वस्त्र धारण करते हैं। नहाए-खाए के दिन महिलाएं और पुरुष नदियों में स्नान करते हैं। इस दिन चावल, चने की दाल इत्यादि बनाए जाते हैं। इस दिन विशेष रूप से कद्दू की सब्जी और पकवान बनाए जाते हैं इसलिए इस दिन को कदुआ भात भी कहते हैं।

2. दूसरा दिन खरना

कार्तिक शुक्ल पंचमी को खरना बोलते हैं। पूरे दिन व्रत करने के बाद शाम को व्रती भोजन करते हैं।इसी दिन शाम के समय प्रसाद बनाया जाता है। प्रसाद में चावल, दूध के पकवान, ठेकुआ (घी, आटे से बना प्रसाद) बनाया जाता है। साथ ही फल, सब्जियों से पूजा की जाती है।

3. षष्ठी

इस दिन छठ पूजा का प्रसाद बनाते हैं। इस दिन ठेकुआ या टिकरी बनाते हैं। प्रसाद तथा फल से बाँस की टोकरी सजाई जाती है। टोकरी की पूजा कर व्रती सूर्य को अर्ध्य देने के लिए तालाब, नदी या घाट पर जाते हैं और स्नान कर डूबते सूर्य की पूजा करते हैं। छठ व्रती पूरे दिन निर्जला व्रत करते हैं और शाम के पूजन की तैयारियां करते हैं। इस दिन नदी, तालाब में खड़े होकर ढलते हुए सूर्य को अर्घ्य दिया जाता है। फिर पूजा के बाद अगली सुबह की पूजा की तैयारियां शुरू हो जाती हैं और लाखों लोग एक साथ नदियों में खड़े होकर सूर्य को अर्घ्य प्रदान करते हैं।

छठ का व्रत निर्जला व्रत है। इसे करनेवाले लोग इस व्रत में 36 घंटे तक बिना पानी पिए रहते हैं। बिहार और पूर्वी उत्तरप्रदेश में छठ आस्था व भक्ति के साथ मनाई जाती है।

4. सप्तमी

सप्तमी को प्रातः सूर्योदय के समय विधिवत पूजा कर प्रसाद वितरित करते हैं।

छठ पूजा का पौराणिक महत्व

एक मान्यता के अनुसार लंका विजय के बाद रामराज्य की स्थापना के दिन कार्तिक शुक्ल षष्ठी को भगवान राम और माता सीता ने उपवास किया और सूर्यदेव की आराधना की। सप्तमी को सूर्योदय के समय पुनः अनुष्ठान कर सूर्यदेव से आशीर्वाद प्राप्त किया था। ऐसी ही एक अन्य मान्यता के अनुसार छठ पर्व की शुरुआत महाभारत काल में हुई थी। सबसे पहले सूर्य पुत्र कर्ण ने सूर्य देव की पूजा शुरू की। कर्ण भगवान सूर्य का परम भक्त था। वह प्रतिदिन घंटों कमर तक पानी में ख़ड़े होकर सूर्य को अर्घ्य देता। सूर्य की कृपा से ही वह महान योद्धा बना था।आज भी छठ में अर्घ्य दान की यही पद्धति प्रचलित है। पण्डित दयानन्द शास्त्री ने बताया कि छठ पर्व को सूर्य षष्ठी व डाला छठ के नाम से भी जाना जाता है। यह पर्व वर्ष में दो बार आता है पहला चैत्र शुक्ल षष्ठी को और दूसरा कार्तिक शुक्ल षष्ठी को, हालांकि षष्ठी तिथि को मनाया जाने के कारण छठ पर्व कहते हैं लेकिन यह पर्व और इसकी पूजा सूर्य से जुड़े होने के कारण सूर्य की आराधना से ताल्लुक रखने के कारण इसे सूर्य षष्ठी कहते हैं।

लेखक – पं. दयानंद शास्त्री, उज्जैन

Editorial Review Note

Written by Religion World — Bhavya Srivastava is the founder of Religion World and a veteran journalist with over 18 years of experience across broadcast, print, and digital media. A founding member of the International Association of Religion Journalists (IARJ), he has spent much of his career reporting on and producing content about religion, faith, and spirituality. .

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November 12, 2018 4 min read
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