दीपावली का पौराणिक और ऐतिहासिक महत्व
दीपावली से जुड़े अनेक रोचक तथ्य है, जो इतिहास के पन्नों में अपना विशेष स्थान बना चुके हैं। इस पर्व का अपना ऐतिहासिक और पौराणिक महत्व भी है, जिस कारण यह त्योहार किसी खास समूह का न होकर संपूर्ण राष्ट्र का हो गया है।
हिंदुओं के लिए दीवाली, सांस्कृतिक, धार्मिक और आध्यात्मिक महत्व (अर्थात् जागरूकता और भीतर के प्रकाश के जश्न) का त्यौहार है। हिंदू पौराणिक कथाओं के अनुसार यह माना जाता है कि ऐसा कुछ है जो शुद्ध, कभी ना खत्म होने वाला, अपरिवर्तनीय, भौतिक और बाहरी शरीर के साथ साथ दिमाग से भी परे है जिसे आत्मा कहते है। लोग पाप पर सत्य की विजय का आनंद लेने के लिए दिवाली मनाते हैं।
दीवाली के त्यौहार पर लोगों द्वारा पटाखे और रोशनी का प्रयोग करने से सम्बन्धित एक और कहानी और महत्व है। लोग पूरे वर्ष के लिए अच्छा स्वास्थ्य, धन, ज्ञान, शांति, समृद्धि प्राप्त करने के मिथक में पटाखों का प्रयोग करते है। पटाखों के उपयोग की एक और रस्म है, पृथ्वी पर पटाखों की उच्च श्रेणी की ध्वनि लोगों की असली खुशी का संकेत है। पटाखों से निकला धुआं बरसात के मौसम के बाद उत्पन्न हुये बहुत से कीडों को मारता है।
* त्रेतायुग में भगवान राम जब रावण को हराकर अयोध्या वापस लौटे, तब श्रीराम के आगमन पर दीप जलाकर उनका स्वागत किया गया और खुशियां मनाई गईं।
* यह भी कथा प्रचलित है जब श्रीकृष्ण ने आततायी नरकासुर जैसे दुष्ट का वध किया, तब ब्रजवासियों ने अपनी प्रसन्नता दीपों को जलाकर प्रकट की।
* राक्षसों का वध करने के लिए मां देवी ने महाकाली का रूप धारण किया। राक्षसों का वध करने के बाद भी जब महाकाली का क्रोध कम नहीं हुआ, तब भगवान शिव स्वयं उनके चरणों में लेट गए। भगवान शिव के शरीर के स्पर्श मात्र से ही देवी महाकाली का क्रोध समाप्त हो गया। इसी की याद में उनके शांत रूप लक्ष्मी की पूजा की शुरुआत हुई। इसी रात इनके रौद्र रूप काली की पूजा का ही विधान है।
* महाप्रतापी तथा दानवीर राजा बलि ने अपने बाहुबल से तीनों लोकों पर विजय प्राप्त कर ली, तब बलि से भयभीत देवताओं की प्रार्थना पर भगवान विष्णु ने वामन रूप धारण कर प्रतापी राजा बलि से तीन पग पृथ्वी दान के रूप में मांगी। महाप्रतापी राजा बलि ने भगवान विष्णु की चालाकी को समझते हुए भी याचक को निराश नहीं किया और तीन पग पृथ्वी दान में दे दी।
* विष्णु ने तीन पग में तीनों लोकों को नाप लिया। राजा बलि की दानशीलता से प्रभावित होकर भगवान विष्णु ने उन्हें पाताल लोक का राज्य दे दिया, साथ ही यह भी आश्वासन दिया कि उनकी याद में भू–लोकवासी प्रत्येक वर्ष दीपावली मनाएंगे।
* कार्तिक अमावस्या के दिन सिखों के छठे गुरु हरगोविंदसिंहजी बादशाह जहांगीर की कैद से मुक्त होकर अमृतसर वापस लौटे थे।
* कृष्ण ने अत्याचारी नरकासुर का वध दीपावली के एक दिन पहले चतुर्दशी को किया था।इसी खुशी में अगले दिन अमावस्या को गोकुलवासियों ने दीप जलाकर खुशियां मनाई थीं।
* 500 ईसा पूर्व की मोहनजोदड़ो सभ्यता के प्राप्त अवशेषों में मिट्टी की एक मूर्ति के अनुसार उस समय भी दीपावली मनाई जाती थी। उस मूर्ति में मातृ–देवी के दोनों ओर दीप जलते दिखाई देते हैं।
* बौद्ध धर्म के प्रवर्तक गौतम बुद्ध के समर्थकों एवं अनुयायियों ने 2500 वर्ष पूर्व गौतम बुद्ध के स्वागत में हजारों–लाखों दीप जलाकर दीपावली मनाई थी।
* सम्राट विक्रमादित्य का राज्याभिषेक दीपावली के दिन हुआ था इसलिए दीप जलाकर खुशियां मनाई थीं।
* ईसा पूर्व चौथी शताब्दी में रचित कौटिल्य अर्थशास्त्र के अनुसार कार्तिक अमावस्या के अवसर पर मंदिरों और घाटों (नदी के किनारे) पर बड़े पैमाने पर दीप जलाए जाते थे।
* अमृतसर के स्वर्ण मंदिर का निर्माण भी दीपावली के ही दिन शुरू हुआ था।
* जैन धर्म के चौबीसवें तीर्थंकर भगवान महावीर ने दीपावली के दिन ही बिहार के पावापुरी में अपना शरीर त्याग दिया। महावीर–निर्वाण संवत् इसके दूसरे दिन से शुरू होता है इसलिए अनेक प्रांतों में इसे वर्ष के आरंभ की शुरुआत मानते हैं।
* दीपोत्सव का वर्णन प्राचीन जैन ग्रंथों में मिलता है। कल्पसूत्र में कहा गया है कि महावीर–निर्वाण के साथ जो अंतरज्योति सदा के लिए बुझ गई है, आओ हम उसकी क्षतिपूर्ति के लिए बहिर्ज्योति के प्रतीक दीप जलाएं।
* पंजाब में जन्मे स्वामी रामतीर्थ का जन्म व महाप्रयाण दोनों दीपावली के दिन ही हुआ। इन्होंने दीपावली के दिन गंगातट पर स्नान करते समय ‘ओम‘ कहते हुए समाधि ले ली।
* महर्षि दयानन्द ने भारतीय संस्कृति के महान जननायक बनकर दीपावली के दिन अजमेर के निकट अवसान लिया। इन्होंने आर्य समाज की स्थापना की।
* दीन–ए–इलाही के प्रवर्तक मुगल सम्राट अकबर के शासनकाल में दौलतखाने के सामने 40 गज ऊँचे बाँस पर एक बड़ा आकाशदीप दीपावली के दिन लटकाया जाता था। बादशाह जहाँगीर भी दीपावली धूमधाम से मनाते थे।
* मुगल वंश के अंतिम सम्राट बहादुर शाह जफर दीपावली को त्योहार के रूप में मनाते थे और इस अवसर पर आयोजित कार्यक्रमों में भाग लेते थे।
* शाह आलम द्वितीय के समय में समूचे शाही महल को दीपों से सजाया जाता था एवं लाल किले में आयोजित कार्यक्रमों में हिन्दू–मुसलमान दोनों भाग लेते थे।
Editorial Review Note
Written by Religion World — Bhavya Srivastava is the founder of Religion World and a veteran journalist with over 18 years of experience across broadcast, print, and digital media. A founding member of the International Association of Religion Journalists (IARJ), he has spent much of his career reporting on and producing content about religion, faith, and spirituality. View full profile →.
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