छठ महापर्व – महारहस्य
कार्तिक मास शुक्ल-पक्ष की षष्ठी तिथि को प्रत्येक वर्ष लाखो श्रध्लुओं के द्वारा मनाया जाने वाला यह त्यौहार ‘छठ महापर्व’ है | यह सूर्य उपासना का दिन है अतः इसे सूर्यषष्ठी महाव्रत के नाम से जाना जाता है | बिहार झारखंड, पूर्वी उत्तर प्रदेश, और नेपाल के तराई भागों में लोगो को इस पर्व को मनाते हुए पिछले सैकड़ो वर्षों से देखा जा रहा है, लेकिन इसकी प्रसिद्धि एवं इसका पालन भारत के अन्य क्षेत्रों में भी बड़ी तेज़ी से हो रहा है | विशेष कर पश्चिम बंगाल, असम, मध्यप्रदेश, उत्तर प्रदेश एवं दिल्ली में इसका प्रसार वर्तमान में नजर आता है |
छठ महापर्व में सूर्य देव की पूजा होती है | प्रकृति पूजा, ‘सर्वे भवन्तु सुखिनः’ एवं ‘सर्वव्यापी ईश्वर’ की मान्यता सनातन धर्म का अभिन्न अंग है | सूर्य प्राकृतिक रूप से जीता जागता देवता है | पौराणिक कथाओं के अनुसार यह वही दिन है जब त्रेतायुगावतारी भगवान् सूर्यवंशी श्री राम लंकापति रावण का वध कर के वापिस अयोध्या आये और षष्ठी तिथि को उन्होंने अपने कुलदेवता सूर्य की उपासना एवं पूजा सरयू नदी के जल में आधा खड़े होकर सूर्य देव को अर्घ्य देकर किया था | तब प्रभु ने माता सीता के साथ पहले संध्या के समय अस्ताचलगामी सूर्य की पूजा की और फिर प्रातः उदयमान सूर्य को अर्घ्य अर्पित करते हुए पूजन किया | अंग नरेश एवं पांडवों के ज्येष्ठ भ्राता राजा कर्ण ने भी इस व्रत का पालन किया था और इसी दिन देवराज इन्द्र को अपना कवच और कुंडल दान किया था | अंग प्रदेश वर्तमान में बिहार राज्य में स्थित भागलपुर का क्षेत्र ही माना जाता है | बिहार वासियों के द्वारा बहुत भव्य रूप में छठ पर्व को मनाने के पीछे भी यह कारण बनता है | भगवान् श्री कृष्ण के कहने पर देवी द्रौपदी ने भी छठ व्रत किया था | देवी कुंती और देवी माद्री ने भी छठ व्रत किया था | स्वयम भगवान् श्री कृष्ण ने अपनी पूण्यव्रता पत्नी जामवंतपुत्री जामवंती जी के साथ षष्ठी तिथि को विधि पूर्वक इस व्रत का पालन किया था | अस्तगामी एवं उदयमान सूर्य को अर्घ्य देकर संतान के दीर्घायु होने की प्रार्थना की जाती है | उपयुक्त तथ्य पौराणिक कथाओं पर ही आधारित है, परन्तु सूर्य देव हिन्दू समाज में वैदिक काल से सर्वत्र पूजे जाते हैं | वेदों में आदित्य, अर्क, मार्तण्ड और अरुण के नाम से सूर्य देव ही जाने जाते हैं | पंचदेव पूजन में भी सूर्य देव की पूजा होती है |
छठ महाव्रत के नियम और आध्यात्मिक महत्व की बात करें तो यह बहुत ही गहरे अर्थ को लिए हुए है | और इसका विशेष समबन्ध स्पष्ट रूप से मर्यादापुरुषोत्तम भगवान् राम से जुड़ा हुआ है | छठ व्रत चार दिन का होता है – नहाय-खाय, खरना, प्रथम अर्घ्य और द्वितीय अर्घ्य, इस प्रकार से इस चार दिन के व्रत में ३६ घंटे का निर्जला व्रत भी होता है, और बहुत कठिन भी होता है | छठ व्रत करने वालों की सहायता करना भी बहुत बड़ा पुण्य समझा जाता है | इस समय का किया गया दान भी बहुत महत्व रखता है और कुंडली में सूर्य से सम्बंधित समस्याओं का समाधान करता है |
छठ महापर्व की एक महत्वपूर्ण विशेषता यह है कि इस पर्व में प्रथम अस्तगामी सूर्य को अर्घ्य अर्पित किया जाता है और उदयमान सूर्य को बाद में प्रातः समय अर्घ्य अर्पित होता है | वैसे वैदिक सनातन धर्मावलम्बियों में प्रातः ही सूर्य को जल देने के नियम हैं, लेकिन छठ पूजा में प्रथम अस्तगामी सूर्य को अर्घ्य अर्पित होता है | कुछ मान्यताओं के अनुसार अस्तगामी सूर्य की पूजा नहीं होनी चाहिए लेकिन छठ महापर्व की ये विशेषता है कि इस पर्व के नियम में सर्व प्रथम अस्तगामी सूर्य की ही पूजा होती है | यह नियम भी बहुत बड़े रहस्य को लिये हुए है |
सूर्य का अस्त होना जीवन में दुःख, व्याधि और अपयश का प्रतीक माना जाता है, और उदयमान सूर्य सौभाग्य और यश का प्रतीक माना जाता है | परन्तु फिर भी छठ महापर्व में अस्तगामी सूर्य की पूजा सर्व प्रथम की जाती है |
किसी कवी ने बड़ा सुन्दर लिखा है –
“है चक्रवत विधि की गति ऊपर कभी निचे कभी,
सुख दुःख न रहते सम कभी आते कभी जाते कभी “
मनुष्य को जीवन में आने वाले दुखों से कभी घबराना नहीं चाहिए | क्योंकि काल चक्र का पहिया हमेशा घूमता रहता है | और छठ महापर्व का यह विधान सुख और दुःख दोनों को सामान रूप से समझने की प्रेरणा देता है | जब जीवन में दुःख, व्याधि या अपयश मिले तो भी उसे भगवान् की कृपा ही समझना चाहिए और जब सुख व् यश प्राप्त हो तब भी उनकी कृपा ही है | भगवान् के सच्चे भक्त जीवन के हर अनुभव में उनकी कृपा ही देखते हैं | अतः भगवान् श्री कृष्ण अर्जुन को समझाते हुए कहते हैं –
सुखदुःखे समे कृत्वा लाभालाभौ जयाजयौ ।
ततो युद्धाय युज्यस्व नैवं पापमवाप्स्यसि ॥३८॥
अर्थात हे ! अर्जुन तू सुख-दुःख, लाभ-हानि, जय-पराजय को समान समझता हुआ बिना व्यथित हुए युद्ध कर | वैसे भी इस संसार में सबकुछ परिवर्तनशील ही है | योग-आध्यात्म की वह अवस्था जहां एक साधक-भक्त स्वयं का साक्षात्कार सुख दुःख के परे कर लेता है | यही अनुभूति ही वास्तविक ब्रह्मज्ञान है, यही भावातीत का अनुभव है, यही तुरिया और फिर तुरीयातीत ब्रह्म ज्ञान है | ऐसी अवस्था में साधक जीवन में मिलने वाले सुख एवं दुःख से व्यथित नहीं होता | हठ-योग शास्त्र के अनुसार हमारे शरीर में सात शक्ति केंद्र होते हैं – और इनमें छठा शक्ति केंद्र आज्ञा चक्र और ज्ञान चक्र के नाम से भी जाना जाता है | इस चक्र के जागृति से ही भावातीत जगत का द्वार खुलता है और योगी दिव्य अनुभूतियों को प्राप्त करता है | लेकिन जब तक वह स्वयं जीवन में इसका अनुभव कर सुख दुःख के भाव से मुक्त ना हो जाए तब तक ब्रह्म की अनुभूति उसे नहीं होती |
अतः छठी मैया इस छठे चक्र आज्ञा चक्र की जागृति को ही प्रेरित और सांकेतिक करती हैं | आज्ञा चक्र की जागृति होने पर ही आत्म-स्वरुप दिव्य सूर्य के दर्शन होते हैं | साधक साधना करते हुए आध्यात्मिक विकास को प्राप्त होता है और फिर उसका जीवन सुख दुःख, लाभ हानि, जय पराजय के मोह से मुक्त हो परमानंद की अनुभूति करता है | छठ महापर्व के नियम-विधान, प्रकृति की पूजा एवं सम्मान के साथ चेतना के आध्यात्मिक विकास की प्रेरणा भी देती है, और सुख-दुःख, लाभ-हानि, जय-पराजय एवं यश-अपयश में सर्वदा समभाव रखने की शिक्षा प्रदान करता है |
(लेखक- मनीष देव)
http://divyasrijansamaaj.blogspot.in/
Editorial Review Note
Written by Religion World — Bhavya Srivastava is the founder of Religion World and a veteran journalist with over 18 years of experience across broadcast, print, and digital media. A founding member of the International Association of Religion Journalists (IARJ), he has spent much of his career reporting on and producing content about religion, faith, and spirituality. View full profile →.
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