← Hinduism “ऊँ” ओ३म् : क्या है ओम का अर्थ, हिंदू धर्म में “ऊँ” का महत्व
“ऊँ” ओ३म् : क्या है ओम का अर्थ, हिंदू धर्म में “ऊँ” का महत्व
Visual Archive
“ऊँ” ओ३म् : क्या है ओम का अर्थ, हिंदू धर्म में “ऊँ” का महत्व
Hinduism
Table of Contents
Category: Hinduism
Read time: 12 min read
वर्तमान/आधुनिक विज्ञान जब प्रत्येक वस्तु, विचार और तत्व का मूल्यांकन करता है तो इस प्रक्रिया में धर्म के अनेक विश्वास और सिद्धांत धराशायी हो जाते हैं। विज्ञान भी सनातन सत्य को पकड़ने में अभी तक कामयाब नहीं हुआ है किंतु वेदांत में उल्लेखित जिस सनातन सत्य की महिमा का वर्णन किया गया है विज्ञान धीरे-धीरे उससे सहमत होता नजर आ रहा है।
हमारे ऋषि-मुनियों ने ध्यान और मोक्ष की गहरी अवस्था में ब्रह्म, ब्रह्मांड और आत्मा के रहस्य को जानकर उसे स्पष्ट तौर पर व्यक्त किया था। वेदों में ही सर्वप्रथम ब्रह्म और ब्रह्मांड के रहस्य पर से पर्दा हटाकर ‘मोक्ष’ की धारणा को प्रतिपादित कर उसके महत्व को समझाया गया था। मोक्ष के बगैर आत्मा की कोई गति नहीं इसीलिए ऋषियों ने मोक्ष के मार्ग को ही सनातन मार्ग माना है।
ओम का यह चिह्न ‘ॐ’ अद्भुत है। यह पुरे ब्रह्मांड को प्रदर्शित करती है। बहुत सारी आकाश गंगाएँ ऐसे ही फैली हुई है। ब्रह्म का मतलब होता है विस्तार, फैलाव और बढ़ना । ओंकार ध्वनि ‘ॐ’ को दुनिया में जितने भी मंत्र है उन सबका केंद्र कहा गया है। ॐ शब्द के उच्चारण मात्र से शरीर में एक सकारात्मक उर्जा आती है|हमारे शास्त्र में ओंकार ध्वनि के 100 से भी ज्यादा मतलब समझाई गयी है | कई बार ऐसे देखा गया है कि मंत्रों में ऐसे शब्दों का प्रयोग किया जाता है जिसका कोई अर्थ नहीं निकलता है ,लेकिन उससे निकली हुई ध्वनि शरीर के उपर अपना प्रभाव डालती हुई प्रतीत होती है।
ॐ को ओम लिखने की मजबूरी है अन्यथा तो यह ॐ ही है. अब आप ही सोचे इसे कैसे उच्चारित करें? ओम का यह चिन्ह ‘ॐ’ अद्भुत है. यह संपूर्ण ब्रह्मांड का प्रतीक है. बहुत-सी आकाश गंगाएँ इसी तरह फैली हुई है. ब्रह्म का अर्थ होता है विस्तार, फैलाव और फैलना. ओंकार ध्वनि के 100 से भी अधिक अर्थ दिए गए हैं. यह अनादि और अनंत तथा निर्वाण की अवस्था का प्रतीक है.
ओंकार ध्वनि ‘ॐ’ को दुनिया के सभी मंत्रों का सार कहा गया है. यह उच्चारण के साथ ही शरीर पर सकारात्मक प्रभाव छोड़ती है. भारतीय सभ्यता के प्रारंभ से ही ओंकार ध्वनि के महत्त्व से सभी परिचित रहे हैं. पांच अवयव- ‘अ’ से अकार, ‘उ’ से उकार एवं ‘म’ से मकार, ‘नाद’ और ‘बिंदु’ इन पांचों को मिलाकर ‘ओम’ एकाक्षरी मंत्र बनता है.
आइंसटाइन भी यही कह कर गए हैं कि ब्राह्मांड फैल रहा है. आइंसटाइन से पूर्व भगवान महावीर ने कहा था. महावीर से पूर्व वेदों में इसका उल्लेख मिलता है. महावीर ने वेदों को पढ़कर नहीं कहा, उन्होंने तो ध्यान की अतल गहराइयों में उतर कर देखा तब कहा.
ॐ को ओम कहा जाता है. उसमें भी बोलते वक्त ‘ओ’ पर ज्यादा जोर होता है. इसे प्रणव मंत्र भी कहते हैं. . इस मंत्र का प्रारंभ है अंत नहीं. यह ब्रह्मांड की अनाहत ध्वनि है. अनाहत अर्थात किसी भी प्रकार की टकराहट या दो चीजों या हाथों के संयोग के उत्पन्न ध्वनि नहीं. इसे अनहद भी कहते हैं. संपूर्ण ब्रह्मांड में यह अनवरत जारी है.
तपस्वी और ध्यानियों ने जब ध्यान की गहरी अवस्था में सुना की कोई एक ऐसी ध्वनि है जो लगातार सुनाई देती रहती है शरीर के भीतर भी और बाहर भी. हर कहीं, वही ध्वनि निरंतर जारी है और उसे सुनते रहने से मन और आत्मा शांती महसूस करती है तो उन्होंने उस ध्वनि को नाम दिया ओम.
ॐ शब्द तीन ध्वनियों से बना हुआ है- अ, उ, म इन तीनों ध्वनियों का अर्थ उपनिषद में भी आता है. यह ब्रह्मा, विष्णु और महेश का प्रतीक भी है और यह भू: लोक, भूव: लोक और स्वर्ग लोग का प्रतीक है.
तंत्र योग में एकाक्षर मंत्रों का भी विशेष महत्व है. देवनागरी लिपि के प्रत्येक शब्द में अनुस्वार लगाकर उन्हें मंत्र का स्वरूप दिया गया है. उदाहरण के तौर पर कं, खं, गं, घं आदि. इसी तरह श्रीं, क्लीं, ह्रीं, हूं, फट् आदि भी एकाक्षरी मंत्रों में गिने जाते हैं.
सभी मंत्रों का उच्चारण जीभ, होंठ, तालू, दाँत, कंठ और फेफड़ों से निकलने वाली वायु के सम्मिलित प्रभाव से संभव होता है. इससे निकलने वाली ध्वनि शरीर के सभी चक्रों और हारमोन स्राव करने वाली ग्रंथियों से टकराती है. इन ग्रंथिंयों के स्राव को नियंत्रित करके बीमारियों को दूर भगाया जा सकता है.
प्रातः उठकर पवित्र होकर ओंकार ध्वनि का उच्चारण करें. ॐ का उच्चारण पद्मासन, अर्धपद्मासन, सुखासन, वज्रासन में बैठकर कर सकते हैं. इसका उच्चारण 5, 7, 10, 21 बार अपने समयानुसार कर सकते हैं. ॐ जोर से बोल सकते हैं, धीरे-धीरे बोल सकते हैं. ॐ जप माला से भी कर सकते हैं.
इससे शरीर और मन को एकाग्र करने में मदद मिलेगी. दिल की धड़कन और रक्तसंचार व्यवस्थित होगा. इससे मानसिक बीमारियाँ दूर होती हैं. काम करने की शक्ति बढ़ जाती है. इसका उच्चारण करने वाला और इसे सुनने वाला दोनों ही लाभांवित होते हैं. इसके उच्चारण में पवित्रता का ध्यान रखा जाता है.
ओम – सुबह उठकर ॐकार ध्वनि का उच्चारण करने से शरीर और मन को एकाग्र करने में सहायता मिलती है ,दिल की धड़कन और रक्त-चाप सुचारू होता है | ओम नमो – ओम के साथ नमो शब्द के जुड़ने से मन में बिनम्रता महसूस होती हैं। इससे सकारात्मक उर्जा का संचार होता है | ॐ शब्द तीन ध्वनियों से बना हुआ है – अ, उ, म । पहला शब्द है ‘अ’ जो कंठ से निकलता है। दूसरा है ‘उ’ जो हृदय को प्रभावित करता है। तीसरा शब्द ‘म्’ है जो नाभि में कम्पन करता है। इस सर्वव्यापक पवित्र ध्वनि के गुंजन का हमारे शरीर की नस नाडिय़ों पर बहुत गहरा प्रभाव पड़ता है | यह ब्रह्मा, विष्णु और महेश का प्रतीक भी है और यह भू: लोक,और स्वर्ग लोग का प्रतीक भी माना जाता है।
ओ३म् की ध्वनि का सभी सम्प्रदायों में महत्त्व है। ॐ हिन्दू धर्म का प्रतीक चिह्न ही नहीं बल्कि हिन्दू परम्परा का सबसे पवित्र शब्द है। हमारे सभी वेदमंत्रों का उच्चारण भी ओ३म् से ही प्रारंभ होता है, जो ईश्र्वरीय शक्ति की पहचान है। परमात्मा का निज नाम ओ३म् है। अंग्रेज़ी में भी ईश्र्वर के लिए सर्वव्यापक शब्द का प्रयोग होता है, यही सृष्टि का आधार है। यह सिर्फ़ आस्था नहीं, इसका वैज्ञानिक आधार भी है। प्रतिदिन ॐ का उच्चारण न सिर्फ़ ऊर्जा शक्ति का संचार करता है, शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता को बढाकर कई असाध्य बीमारियों से दूर रखने में मदद करता है। आध्यात्म में ॐ का विशेष महत्त्व है, वेद शास्त्रों में भी ॐ के कई चमत्कारिक प्रभावों का उल्लेख मिलता है। आज के आधुनिक युग में वैज्ञानिकों ने भी शोध के मध्यम से ॐ के चमत्कारिक प्रभाव की पुष्टी की है। पाश्चात्य देशों में भारतीय वेद पुराण और हज़ारों वर्ष पुरानी भारतीय संस्कृति और परम्परा काफ़ी चर्चाओं और विचार विमर्श का केन्द्र रहे हैं दूसरी ओर वर्तमान की वैज्ञानिक उपलब्धियों का प्रेरणा स्रोत भारतीय शास्त्र और वेद ही रहे हैं, हलाकि स्पष्ट रूप से इसे स्वीकार करने से भी वैज्ञानिक बचते रहे हैं। योगियों में यह विश्वास है कि इसके अंदर मनुष्य की सामान्य चेतना को परिवर्तित करने की शक्ति है। यह मंत्र मनुष्य की बुद्धि व देह में परिवर्तन लाता है। ॐ से शरीर, मन, मस्तिष्क में परिवर्तन होता है और वह स्वस्थ हो जाता है। ॐ के उच्चारण से फेफड़ों में, हृदय में स्वस्थता आती है। शरीर, मन और मस्तिष्क स्वस्थ और तनावरहित हो जाता है। ॐ के उच्चारण से वातावरण शुद्ध हो जाता है।
ॐ शब्द को हिन्दू धर्म का प्रतीक चिह्न ही नहीं अपितु इसे हिन्दू परम्परा का सबसे पवित्र शब्द शब्द मन जाता है।हिन्दू धर्म के सभी वेद मंत्रों का उच्चारण भी ॐ से ही प्रारंभ किया जाता रहा है | ॐ नाम में हिन्दू ,मुस्लिम या इसाई जैसी कोई भी बात नहीं है। यह सोचना कि ॐ किसी एक खास धर्म का चिन्ह है,यह बिलकुल भी गलत है, बल्कि ॐ शब्द तो उसी समय से चला आ रहा है जब कोई धर्म इस दुनिया में था ही नही उस समय सिर्फ एक ही धर्म था और वो थी मानवता । यह तो अच्छाई, शक्ति, ईश्वर भक्ति और आदर का प्रतीक मन जाता है। उदाहरण के तैर पर अगर हिन्दू अपने सब मन्त्रों और भजनों में ॐ शब्द को शामिल करते हैं , तो इसाई धर्म में भी इसी सी मिलते जुलते एक शब्द आमेन का प्रयोग धार्मिक दृष्टी से किया जाता है । मुस्लिम इसको आमीन कहते है तथा इस शब्द को यद् करते है , बौद्ध इसे “ओं मणिपद्मेहूं” कह कर प्रयोग करते हैं। सिख समुदाय भी “इक ओंकार” अर्थात एक ॐ का गुण गाता है। यह अंग्रेज़ी का शब्द omni, जिसका अर्थ अनंत और कभी ख़त्म न होने वाले तत्त्वों पर लगाया जाता हैं | इन बातो और तथ्यों से यह सिद्ध होता है कि ॐ किसी धर्म , मज़हब या सम्प्रदाय का नही बल्कि पूरी इंसानियत का है। ठीक उसी प्रकार से जैसे कि हवा पानी रौशिनी समस्त मानव जाति के लिए हैं न कि केवल किसी एक सम्प्रदाय समुदाय और धर्म के लिए है के लिए ||
मंत्रों का उच्चारण जीभ, होंठ, तालू, दाँत, कंठ और फेफड़ों से निकलने वाली वायु के सम्मिलित प्रभाव से संभव होता है। इससे निकलने वाली ध्वनि शरीर के सभी चक्रों और हारमोन स्राव करने वाली ग्रंथियों से टकराती है। इन ग्रंथिंयों के स्राव को नियंत्रित करके बीमारियों को दूर भगाया जा सकता है।
=======
जानिए ॐ शब्द के लाभ :
इससे शरीर और मन को एकाग्र करने में मदद मिलेगी।
दिल की धड़कन और रक्तसंचार व्यवस्थित होगा।
इससे मानसिक बीमारियाँ दूर होती हैं।
काम करने की शक्ति बढ़ जाती है।
इसका उच्चारण करने वाला और इसे सुनने वाला दोनों ही लाभांवित होते हैं।
इसके उच्चारण में पवित्रता का ध्यान रखा जाता है।
——–
ॐ के उच्चारण से शरीर में आवेगों का उतार-चढ़ाव :
प्रिय तथा अप्रिय शब्दों से निकलने वाली ध्वनि से मस्तिष्क में उत्पन्न काम, क्रोध, मोह, भय लोभ आदि की भावना से दिल की धड़कन तेज हो जाती है जिससे रक्त में विषाक्त पदार्थ पैदा होने लगते हैं। इसी तरह प्रिय और मंगलमय शब्दों ध्वनि मस्तिष्क, हृदय और रक्त पर अमृत की तरह लाभ करती है।
प्रातः उठकर पवित्र होकर ओंकार ध्वनि का उच्चारण करें।
ॐ का उच्चारण पद्मासन, अर्धपद्मासन, सुखासन, वज्रासन में बैठकर कर सकते हैं।
आप ॐ शब्द को जोर से बोल सकते हैं,या फिर धीरे-धीरे भी बोल सकते हैं।
ॐ जप माला से भी कर सकते हैं या बिना माला के भी ।
========
गायत्री मंत्र का प्रारम्भ ओम् से होता है. माण्डूक्योपनिषद् में ओंकार अर्थात् ओम् के महत्व तथा अर्थ दोनों पर प्रकाश डाला गया है. ओम् स्वयं में एक मंत्र है जिसे प्रणव भी कहते हैं. यह अ, उ, म् इन तीन अक्षरों को मिला कर बना है. अ से ब्रह्म का विराट रूप, उ से हिरण्यगर्भ या तैजस रूप, म् से ईश्वर या प्राज्ञ रूप का बोध होता है. यह ब्रह्माण्ड ही ब्रह्म का शरीर या विराट रूप है. अपनी लीला को पूर्ण रूप में व्यक्त करने के कारण वह विराट या विश्व या वैश्वानर कहलाता है. जो आप स्वयंप्रकाश और सूर्यादि लोकों का प्रकाश करने वाला है, इससे परमेश्वर का नाम हिरण्यगर्भ या तैजस है. जिसका सत्य विचारशील ज्ञान और अनन्त ऐश्वर्य है, उससे उस परमात्मा का नाम ईश्वर है और सब चराचर जगत् के व्यवहार को यथावत् जानने के कारण वह ईश्वर ही प्राज्ञ कहलाता है. गायत्री मंत्र का शेष भाग ‛भूर्भुव: स्व:. तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि. धियो यो न: प्रचोदयात्.’ यजुर्वेद के छत्तीसवें अध्याय से लिया गया है जिसमें सविता के साथ सूर्य की अलग से वन्दना है. सविता का मूल शब्द सवितृ है जिसका अर्थ सूर्य के साथ प्रेरक ईश्वर भी होता है. जैसे हरि का अर्थ बन्दर और ईश्वर होता है और सन्दर्भानुसार ही हम उसका अर्थ ग्रहण करते हैं. उसी प्रकार चूँकि यह मंत्र बुद्धि को प्रेरित करने की प्रार्थना करता है अत: सविता का अर्थ प्रेरित करने की क्षमता वाले ईश्वर से ही करना चाहिए.
गायत्री मंत्र में भू: शब्द पदार्थ और ऊर्जा के अर्थ में, भुव: शब्द अन्तरिक्ष के अर्थ में तथा स्व: शब्द आत्मा के अर्थ में प्रयुक्त हुआ है. शुद्ध स्वरूप और पवित्र करने वाला चेतन ब्रह्म स्वरूप ईश्वर को ही भर्ग कहा जाता है. इस प्रकार गायत्री मंत्र का अर्थ हुआ ‒ पदार्थ और ऊर्जा (भू:), अन्तरिक्ष (भुव:) और आत्मा (स्व:) में विचरण करने वाला सर्वशक्तिमान ईश्वर (ओम्) है. उस प्रेरक (सवितु:) पूज्यतम (वरेण्यं) शुद्ध स्वरूप (भर्ग:) देव का (देवस्य) हमारा मन अथवा हमारी बुद्धि धारण करे (धीमहि). वह जगदीश्वर (य:) हमारी (न:) बुद्धि (धिय:) को अच्छे कामों में प्रवृत्त करे (प्रचोदयात्). इस प्रकार गायत्री मंत्र ब्रह्म के स्वरूप, ईश्वर की महिमा का वर्णन करते हुए प्रार्थना मंत्र का स्वरूप ले लेता है।
रिलीजन वर्ल्ड देश की एकमात्र सभी धर्मों की पूरी जानकारी देने वाली वेबसाइट है। रिलीजन वर्ल्ड सदैव सभी धर्मों की सूचनाओं को निष्पक्षता से पेश करेगा। आप सभी तरह की सूचना, खबर, जानकारी, राय, सुझाव हमें इस ईमेल पर भेज सकते हैं –religionworldin@gmail.com – या इस नंबर पर वाट्सएप कर सकते हैं – 9717000666 – आप हमें ट्विटर , फेसबुक और यूट्यूब चैनल पर भी फॉलो कर सकते हैं। Twitter, Facebook and Youtube.
Editorial Review Note
Written by Religion World — Bhavya Srivastava is the founder of Religion World and a veteran journalist with over 18 years of experience across broadcast, print, and digital media. A founding member of the International Association of Religion Journalists (IARJ), he has spent much of his career reporting on and producing content about religion, faith, and spirituality.View full profile →.
Religion World provides information on all religions and presents it impartially. You can send us information, news, updates, opinions, and suggestions at
religionworldin@gmail.com. You can also follow us on
X (Twitter),
Facebook, and
YouTube.
Leave a Reply