युवा पीढ़ी धर्म को बोझ क्यों समझती है?

युवा पीढ़ी धर्म को बोझ क्यों समझती है?

आज का युवा पहले से कहीं ज़्यादा पढ़ा-लिखा, जागरूक और तकनीक से जुड़ा हुआ है। उसके पास सवाल पूछने की आज़ादी है, विकल्पों की भरमार है और सोचने का एक आधुनिक तरीका है। ऐसे में यह सवाल बार-बार उठता है कि युवा पीढ़ी धर्म को आस्था की बजाय बोझ क्यों समझने लगी है? क्या सच में धर्म बदल गया है, या फिर उसे समझाने का तरीका गलत हो गया है?

धर्म को कर्मकांड तक सीमित कर देना

आज के समय में धर्म को अक्सर पूजा-पाठ, व्रत-उपवास, नियम-पाबंदियों और डर से जोड़ दिया गया है। जब युवा देखता है कि धर्म का मतलब सिर्फ़ “ये करो, वो मत करो” बनकर रह गया है, तो उसे यह स्वतंत्रता पर हमला लगता है।
असल में धर्म जीवन को सरल और सार्थक बनाने का मार्ग है, लेकिन जब उसे केवल कर्मकांड बना दिया जाता है, तो वह बोझ प्रतीत होता है।

सवाल पूछने पर रोक

युवा पीढ़ी तर्क करना चाहती है, समझना चाहती है। लेकिन कई बार धर्म के नाम पर कहा जाता है—
“इस पर सवाल मत करो, बस मान लो।”
यही बात युवाओं को धर्म से दूर कर देती है। आज का युवा अंधविश्वास नहीं, बल्कि कारण और अर्थ जानना चाहता है। जब धर्म प्रश्नों से डरने लगे, तो वह प्रासंगिक नहीं रह जाता।

पाखंड और दोहरापन

युवा पीढ़ी सोशल मीडिया और वास्तविक जीवन में यह साफ़ देखती है कि कई लोग धार्मिक दिखते तो हैं, लेकिन उनके कर्म धर्म के विपरीत होते हैं।
जब धर्म का उपयोग सत्ता, दिखावे या नफ़रत फैलाने के लिए किया जाता है, तो युवा उसे सच्चाई नहीं बल्कि ढोंग मानने लगता है। यह पाखंड धर्म की छवि को नुकसान पहुँचाता है।

आधुनिक जीवनशैली और समय की कमी

आज का युवा करियर, पढ़ाई, प्रतिस्पर्धा और मानसिक दबाव में जी रहा है। जब धर्म को समय-साध्य और जटिल बताया जाता है—
लंबी पूजा, कठिन नियम, कठोर अनुशासन—
तो वह उसे अपनी तेज़ रफ्तार ज़िंदगी में फिट नहीं कर पाता। परिणामस्वरूप धर्म उसे बोझ लगने लगता है, समाधान नहीं।

धर्म को डर से जोड़ना

कई बार धर्म को “पाप-पुण्य”, “नरक-स्वर्ग” और “दंड” से जोड़कर समझाया जाता है।
डर पर आधारित आस्था ज़्यादा देर तक नहीं टिकती। युवा प्रेम, करुणा और सकारात्मकता की भाषा समझता है। जब धर्म डर पैदा करता है, तो वह उससे दूरी बना लेता है।

शिक्षा और धर्म के बीच टकराव

आधुनिक शिक्षा वैज्ञानिक सोच सिखाती है, जबकि धर्म को कई बार विज्ञान के विरोधी रूप में पेश किया जाता है।
जब युवा को लगता है कि धर्म तर्क और विज्ञान से मेल नहीं खाता, तो वह उसे पुराना और अनुपयोगी समझने लगता है। जबकि सच्चाई यह है कि धर्म और विज्ञान विरोधी नहीं, पूरक हो सकते हैं।

पीढ़ियों के बीच संवाद की कमी

बुज़ुर्ग अक्सर यह मान लेते हैं कि युवा “बिगड़ गया है”, जबकि युवा सोचता है कि बड़े लोग “समय के साथ नहीं बदले।”
इस संवादहीनता के कारण धर्म का वास्तविक उद्देश्य—जीवन मूल्य, नैतिकता, आत्मिक शांति—युवा तक पहुँच ही नहीं पाता।

क्या धर्म सच में बोझ है?

नहीं। बोझ धर्म नहीं, बल्कि धर्म की गलत प्रस्तुति है।
अगर धर्म को समझदारी, करुणा, आत्मचिंतन और मानवता के रूप में प्रस्तुत किया जाए, तो युवा उसे अपनाने से पीछे नहीं हटेगा।
युवा आज भी अर्थ, शांति और उद्देश्य की तलाश में है—बस उसे सही भाषा और सही उदाहरण चाहिए।

निष्कर्ष

युवा पीढ़ी धर्म से दूर नहीं भाग रही, बल्कि अंधविश्वास, पाखंड और दबाव से दूर भाग रही है।
अगर धर्म को सवालों से डराए बिना, प्रेम और विवेक के साथ समझाया जाए, तो वह बोझ नहीं, बल्कि मार्गदर्शक बन सकता है।
समय की मांग है कि हम धर्म को बदले नहीं, बल्कि धर्म को समझाने का तरीका बदलें।

~ रिलीजन वर्ल्ड ब्यूरो

Post By Religion World