यज्ञ: Delhi NCR में SMOG की समस्या के लिए समाधान या समस्या?

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यज्ञ: Delhi NCR में SMOG की समस्या के लिए समाधान या समस्या?

दिल्ली एनसीआर में पिछले साल से चली आ रही स्मॉग की समस्या से अचानक ही लोगों में चेतना आ गयी है. स्मॉग यानि एक प्रकार का वायु प्रदुषण. स्मॉग के कारण दिल्ली एनसीआर में सांस लेना दूभर हो गया है. स्कूलों को बंद कर दिया गया है. और राज्य सरकारें एक दूसरे पर आरोप प्रत्यारोप का खेल खेल रही हैं. ऐसे में अखिल भारत हिन्दू महासभा के राष्ट्रीय अध्यक्ष स्वामी चक्रपाणि महाराज ने मोदी सरकार और केजरीवाल सरकार को दिल्ली एनसीआर को प्रदूषण मुक्त का अचूक समाधान बताया. उन्होंने कहा कि अगर राज्य और केंद्र सरकार यज्ञ, हवन करें तो वरुण देव और वायु देव प्रसन्न हो जायेंगे. लेकिन यह भी एक चर्चा का विषय बन गया गया है कि क्या वास्तव में हवन या यज्ञ पर्यवरण को प्रदुषण मुक्त (वायु प्रदुषण) मुक्त बना सकते हैं. तो चलिए आज इसी विषय पर प्रकाश डालते हैं.

क्या है हवन के पीछे का वैज्ञानिक कारण  

हवन / यज्ञ/ अग्निहोत्र मनुष्यों के साथ सदा से चला आया है. हिन्दू धर्म में सर्वोच्च स्थान पर विराजमान यह हवन आज प्रायः एक आम आदमी से दूर है. दुर्भाग्य से इसे केवल कुछ वर्ग, जाति और धर्म तक सीमित कर दिया गया है. कोई यज्ञ पर प्रश्न कर रहा है तो कोई मजाक. लेकिन यह जानना बेहद आवश्यक है कि हवन क्यों इतना पवित्र है, क्यों यज्ञ करना न सिर्फ हर इंसान का अधिकार है बल्कि कर्त्तव्य भी है.

हवन में डाली जाने वाली सामग्री (ध्यान रहे, यह सामग्री आयुर्वेद के अनुसार औषधि आदि गुणों से युक्त जड़ी बूटियों से बनी हो) अग्नि में पड़कर सर्वत्र व्याप्त हो जाती है. घर के हर कोने में फ़ैल कर रोग के कीटाणुओं का विनाश करती है. वैज्ञानिक शोध से पता चला है कि हवन से निकलने वाला धुआं हवा से फैलने वाली बीमारियों के कारक इन्फेक्शन करने वाले बैक्टीरिया (विषाणु) को नष्ट कर देता है.

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विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) के अनुसार दुनिया भर में साल भर में होने वाली 57 मिलियन मौत में से अकेली 15 मिलियन (25% से ज्यादा) मौत इन्ही इन्फेक्शन फैलाने वाले विषाणुओं से होती हैं! हवन करने से केवल ये बीमारियां ही नहीं, और भी बहुत सी बीमारी खत्म होती हैं, जैसे-

१. सर्दी/जुकाम/नजला

२. हर तरह का बुखार

३. मधुमेह (डायबिटीज/शुगर)

४. टीबी (क्षय रोग)

५. हर तरह का सिर दर्द

६. कमजोर हड्डियां

७. निम्न/उच्च रक्तचाप

८. अवसाद (डिप्रेशन)

आज यज्ञ को शक्तिवर्धक वस्तुएं जला देने वाला एक अन्धविश्वासी कर्मकाण्ड मात्र माना जाता है लेकिन वास्तविकता यह है कि वर्तमान विज्ञान उस स्थिति में आ गया है, जब यह बताया जा सके कि यज्ञ के जो भी लाभ वेद, उपनिषद्, शास्त्रों और पुराणों में बताये गये हैं, वह यथार्थ लाभों की तुलना में छोटे और थोड़े हैं. प्रजापति ब्रह्मा के इस कथन को – “यह यज्ञ तुम्हारी हर कामना को संतुष्ट करेगा. अब विज्ञान की कसौटी पर खरे उतर चुके हैं.

इस विज्ञान को समझने के लिए पृथ्वी और ब्रह्माण्ड की जिन शक्तियों के अध्ययन की आवश्यकता है, वह है – (1) शब्द सामर्थ्य (मंत्र शक्ति), (2) अग्नि तत्त्व और उसका प्रकीर्णन, (3) पदार्थ परिवर्तन के मौलिक सिद्धांत, (4) सूर्य और उसकी सहस्राँशु शक्ति और अन्तिम, (5) भावना विज्ञान. इनमें से सम्पूर्ण या कुछ की आंशिक जानकारी से भी यज्ञ सम्बन्धी भारतीय दर्शन को अच्छी प्रकार समझा जा सकता है.

शब्द की सामर्थ्य की माप कैलीफोर्निया विश्व–विद्यालय के एक भूगर्भ तत्त्ववेत्ता डा. गैरी लेन ने की. उन्होंने स्फटिक के प्राकृतिक क्रिस्टल और स्फटिक की ही बहुत पतली पट्टिका के माध्यम से एक ऐसा यन्त्र बनाया जो ऐसी ध्वनियों के माध्यम से जो कानों को सुनाई भी नहीं देती. उन्होंने ऐसी शक्ति का निर्माण किया जिसके द्वारा शल्य-चिकित्सा कीटाणुओं का विनाश, मोटी–मोटी इस्पात की चादरों को काटना, धुलाई, कटाई आदि भारी से भारी काम और नाजुक से नाजुक कार्य भी सम्पन्न करने में बड़ी सहायता मिली. आज पाश्चात्य देशों में औद्योगिक क्षेत्रों में कर्णातीत ध्वनि के उपयोग ने क्राँति मचा दी है.

शब्द की दूसरी विशेषतः उसकी संवहनीयता है, वह ठोस माध्यम से भी चल सकता है और ईथर में तरंगों के रूप में सारे ब्रह्माण्ड का भ्रमण भी कर आता है, इन सब बातों का अर्थ होता है कि शब्द की शक्ति अपरिमेय होती हैं. पृथ्वी पर अनेक हलचलें शब्द के द्वारा ही होती है फिर भारतीय शब्द शास्त्र तो और भी वैज्ञानिक है. उनसे एक प्रकार की ऐसी ध्वनि उत्पन्न होती है, जो किसी भी स्थान पर व्यापक हलचल उत्पन्न कर सकती है.

गायत्री मंत्र की ध्वनि शक्ति इन सबसे विलक्षण है. गायत्री मंत्रों में जब मंत्रोच्चारण किया जाता है तो वह अपने सामान्य सिद्धान्त के अनुसार कुण्डलाकार गति से ऊपर की ओर ईथर में तरंगें बनाता हुआ बढ़ता है. यज्ञों में प्रज्वलित अग्नि के इलेक्ट्रान्स उन तरंगों को वहन कर लेते हैं और उनकी पहली प्रतिक्रिया तो उस क्षेत्र में ही फैलती है, अर्थात् यज्ञ में प्रयुक्त होने वाले घृत आदि पदार्थ स्थूल से गैस रूप में फैलते हैं. आग की गर्मी से उन औषधियों के इलेक्ट्रान्स अपने-अपने पथों पर इतनी तेजी से दौड़ने लगते हैं कि आपस में लड़खड़ा जाते हैं और छितर कर स्थूल पदार्थों से अलग होकर वायु मण्डल में फैल जाते हैं, यज्ञ के समय फैलने वाली धूम्र-सुवास उसी का एक स्थूल रूप है.

अग्निहोत्र और मंत्रोच्चारण के उससे भी सूक्ष्म-विज्ञान को समझने के लिये अयन-मण्डल (आयनोस्फियर) का अध्ययन आवश्यक है. धरती की सतह से 35 से 45 मील तक की ऊँचाई के ऊपर वायु मण्डली आग को अयन-मण्डल कहते हैं. अपनी पृथ्वी वायु के समुद्र में डूबी हुई है, आयनोस्फियर उसका सबसे अधिक ऊँचा और विशाल क्षेत्र हैं, लेकिन वहां हवा की कुल मात्रा वायु-मण्डल की तुलना में दो-सौवें भाग से भी कम है. यथार्थ में पृथ्वी पर प्राकृतिक परिवर्तनों और ब्रह्माण्ड के अदृश्य लोकों से संपर्क का मूल अध्याय यहीं से प्रारम्भ होता है. कुछ दिन तक अयन मण्डल वैज्ञानिकों के लिये एक पहेली थी, किन्तु छानबीन से पता चला है कि बहुत ऊँचाई पर हवा में ऐसे बहुत से गुण हैं जो धरती की हवा में नहीं होते.

उत्तरी और दक्षिणी ध्रुव प्रकाश, प्रचण्ड चुम्बकीय आँधी, बेतार तरंगों के परावर्तन जैसी घटनायें आयनोस्फियर से ही आरम्भ होती हैं. सूर्य और चन्द्रमा आदि की अनेक नियमित प्रक्रियाओं के फलस्वरूप पृथ्वी के आकर्षण वृत्त में परिवर्तन होते हैं.

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हां यह भी जान लेना आवश्यक है कि हवा में मिश्रित गैसें छोटे-छोटे अणुओं से बनी होती हैं. एक घन सेंटीमीटर हवा में नाइट्रोजन, आक्सीजन और दूसरी गैसों के 27000,000,000,000,000,000 (27 हज़ार क्वाड्रीलयन) कण होते हैं. यह अणु भी छोटे कणों में विभक्त होते हैं इन्हें परमाणु कहते हैं, परमाणु भी विभक्त हो सकते हैं. क्योंकि वे भी इलेक्ट्रान, न्यूट्रान और प्रोटान नामक और भी छोटे कणों से बने हैं, इन्हें शक्ति तरंगें ही कहना चाहिये. परमाणु बहुत स्थायी होता है, क्योंकि इलेक्ट्रान और परमाणु का न्यूक्लियस आपस में आकर्षक विद्युत शक्ति द्वारा एक दूसरे से जुड़े रहते हैं. नाभिक धन विद्युत आवेशकारी और इलेक्ट्रानिक सेल ऋण-विद्युत आवेशकारी होता है. इन्हीं विद्युत आवेशकारी अणु या परमाणुओं का नाम अयन है. इसे एक प्रकार का वैसा ही शक्ति प्रवाह कहना चाहिये, जिस तरह तालाब के पानी में तरंगें उठतीं और पानी में गति पैदा करती हैं. यह सूक्ष्म अयन मण्डल भी उसी प्रकार एक ओर तो पृथ्वी की जलवायु पर गैसीय स्थिति के अनुरूप अच्छे, खराब परिवर्तन करता है, दूसरी ओर पृथ्वी के शब्द प्रवाह को कालातीत बनाकर आकाश की ओर फेंकता रहता है.

अणुओं और परमाणुओं के साथ इतनी मजबूती से जुड़े रहने के बाद भी इलेक्ट्रान कभी-कभी उनसे टूटकर अलग हो जाते हैं, पहले वैज्ञानिक इस पर आश्चर्य-चकित थे पर अब वे जान गये हैं कि आयनोस्फियर में यह किया सूर्य के विकिरण (रेडियेशन) से होती हैं. तात्पर्य यह कि सूर्य इस अयन को चुप नहीं रहने देता कुछ न कुछ परिवर्तन कराता ही रहता है परिवर्तन की स्थिति अच्छी-बुरी गैसों के अनुरूप होती हैं, इसलिये यज्ञ से जो प्राण-प्रवाह उत्पन्न होता है, वह स्थूल दृष्टि से प्रकृति और जन-स्वास्थ्य पर बड़ा अनुकूल प्रभाव डालता है.

आज जो परमाणविक विस्फोट हो रहें हैं, उनसे तो अयन-मण्डल ऐसी खराब गैसों की धूलि रेडियो-एक्टीविटी से भर गया है कि आने वाले समय में अनेकों नई बीमारियाँ पैदा होंगी और अकाल धनावृद्धि के विद्रूप उपस्थित होंगे. इस धूलि की जिन्दगी बड़ी लम्बी होती है. दूसरी ओर हर जीवित पदार्थ में कार्बन की मात्रा अधिक होती है. जिससे किरण-सक्रिय धूलि बड़ी आसानी से उस पर अपना प्रभाव प्रारम्भ कर देती है. हर एक मेगाटन वाले परमाणविक अस्त्र से 20 पौण्ड कार्बन 14 की उपलब्धि होती है.

1961 तक के विस्फोटों का हिसाब लगाकर ही डा. लाइनस पालिंग ने बताया था कि भविष्य में 4 लाख विकलांग या मृत बच्चे जन्म लेंगे. कार्बन-14 के अतिरिक्त स्ट्राटियम 90 आयोडीन 131 और कैसियम 137 जैसी कैन्सर, लूकेमियाँ, रक्त मंदता और पेचिस पैदा करने वाली गैसें पैदा होती हैं, उन्हें केवल प्राण-संयुक्त या अधिक शक्ति वाला यज्ञीय-विकिरण ही रोक सकता है और कोई नहीं. यज्ञ से हुई प्राण-वर्षा में ही वह शक्ति है, जो इन दुष्प्रभावों को रोक सके, इसलिये वर्तमान युग में तो यज्ञों की अनिवार्यता असंदिग्ध ही है.

प्रकृति के रूप में यज्ञ पहुंची गैस और कर्णातीत ध्वनि से अयन और ब्रह्माण्डीय शक्तियों के भीतर भारी हलचल उत्पन्न होती है और उस हलचल के फल-स्वरूप ही पृथ्वी पर अनेक नये तत्त्वों का आकर्षण, वर्षा आदि की व्यवस्था होती है, मौसम में सुहावनापन और वातावरण में शक्तिवर्धक प्राण की बहुलता होती है, यह सब उसके स्थूल प्रभाव और प्रतिक्रियाएं ही हैं.

यजुर्वेद में कहा है-ब्रह्म सूर्य सम ज्योतिः”-23. 42.
वह सूर्य ब्रह्म तत्त्व ही है, उन्हीं की शक्ति और बाहरी महिमा से जीवन का विकास हो रहा है. पृथ्वी में आंधी तक सूर्य की इच्छा से आती है, इसे सूर्य की तापीय व्यवस्था कहें या प्राण-प्रक्रिया पर लिखित है कि यज्ञ और मन्त्र की कर्णातीत शक्ति उन प्राण या ऊष्मा में खलबली मचा कर अधिक मात्रा में जीवन तत्त्वों का विस्फोट अवश्य कर अधिक मात्रा में जीवन तत्त्वों का विस्फोट अवश्य करा लेती है. जहां भी यज्ञ होते हैं वहां प्रकृति बहुत अनुकूल रहती है इसमें किंचित् मात्र भी सन्देह नहीं. स्मरण रहे पृथ्वी सूर्य से ही सर्वाधिक प्रभावित है.

मन्त्र का भावना विज्ञान उससे भी विलक्षण शक्ति वाला है. गीता में भगवान् कृष्ण ने कहा है कि संसार में किसी भी वस्तु का अभाव नहीं है, भले ही हम उसे न जानते हों. परमात्मा की सृष्टि में वह सब कुछ है, जिसके बारे में हम जानते भी नहीं हैं, उसे जानने और देखने के लिये अणु-आँखें सूक्ष्म-दृष्टि को जागृत करना आवश्यक है. अर्थात् जीव छोटे से छोटा होकर ही विश्व की अनन्तता और उसके भीतर की आणविक हलचलों का ज्ञान प्राप्त कर सकता है. यह ज्ञान इतना संघर्ष है कि संसार के किसी भी भूभाग में विलक्षण हलचल उत्पन्न कर सकता है.

यज्ञों के माध्यम से प्रकट होने वाली भावना-शक्ति सामान्य भावों की अपेक्षा शब्द-शक्ति और अग्नि-तत्त्व से प्रेरित होने के कारण तमाम ब्रह्माण्ड में फैलकर अपने अनुरूप शक्तियों को खींच लाती है. हम समझ नहीं पाते कि अदृश्य सहायता या इच्छा पूर्ति कैसे हुई पर यह नई भावनाओं द्वारा एक प्रकार के तत्त्वों के अणुओं के आकर्षण की ही वैज्ञानिक पद्धति है, उसमें रहस्य जैसी कोई भी बात नहीं है.

भावना वस्तुतः कर्णातीत ध्वनि की और भी सूक्ष्म स्वरूप है, क्योंकि हम जो कुछ सोचते हैं, वह आत्मा या चेतन सत्ता द्वारा एक प्रकार का बोलना ही हैं, इसलिये होना ही चाहिये, यज्ञ तो एक प्रकार से उस यन्त्र की तरह है, जो अभीष्ट इच्छा के गन्तव्य तक उस शक्ति को पहुँचाने और वहां से आवश्यक परिस्थितियाँ खींच लाने में मदद करता हैं.

हविष्यान्न का प्रतिफल अन्न आदि के उत्पादन, अयन-मण्डल में शक्ति तत्त्वों के विकास और जलवायु की अनुकूलता के रूप में दिखाई देता है तो यज्ञ कर्ताओं की श्रद्धा भक्ति भावनात्मक स्तर पर मनोवाँछित सफलतायें प्रदान करने वाली होती हैं. स्थूल की प्रतिक्रिया स्थूल तो सूक्ष्म की प्रतिक्रिया सूक्ष्म भी हाथों-हाथ देखने को मिलती है. यद्यपि यह दोनों ही बातें मिली-जुली हैं, इसलिये भावना को विज्ञान और विज्ञान को भावना के माध्यम से जागृत और प्राप्त किया जा सकता है.

एक समय था जब अभीष्ट प्राकृतिक आवश्यकताओं, सामाजिक परिवर्तनों और व्यक्ति की निजी इच्छाओं के लिये प्रयुक्त होने वाले यज्ञों की बहुतायत से लोगों को जानकारी थी पर उस विद्या का लोप हो गया लगता है, प्रयोग और परीक्षण के तौर पर ही उन रहस्यों की पुनः जानकारी की जा सकती हैं. सूर्य की अदृश्य किरणों के और अयन-मण्डल के सम्बन्ध में और अधिक जानकारियाँ मिलेंगी तब लोग यज्ञ की सूक्ष्म प्रतिक्रियाओं को और भी अच्छी तरह समझ सकेंगे. अभी प्राकृतिक परिवर्तन में उसे सहायक के रूप में समझा जा सका तो इतना ही काफी होगा.

विधि विधान से किए गए यज्ञ हवन व्यक्ति को प्राणशक्ति से भरपूर कर देते हैं. इस बात का प्रमाण अग्नि के सान्निध्य में होने वाले सात्विक प्रभाव से समझा देखा जा सकता है. पहला प्रभाव तो यह कि कायदे से किए गए यज्ञ हवन में जो धुंआ उठता है, उससे किसी को परेशानी नहीं होती. आमतौर पर धुंए का प्रभाव खांसी होने और दम घुटने के रूप में दिखाई देती है.

बंगलूर के वैदिक रिसर्च इंस्टीट्यूट के प्रयोगों के अनुसार हवन के लिए बैठने पर न खांसी होती है न दम घुटता है और न ही आंच लगती है. इंस्टीट्यूट की पत्रिका अग्निधर्मा के अनुसार ऐसा नहीं है कि हवन में प्रयोग की जानी वाली समिधाएं (लकड़ियां) और हवन सामग्री के कारण ऐसा होता है.

बिना मंत्रों के बेतरतीब ढंग से जलाई गई वही सामग्री स्वास्थ्य पर बुरा असर डालती है, जबकि विधि विधान और मंत्रों से किए गए हवन शुभ परिणाम प्रस्तुत करते हैं. वैदिक वांग्मय का आरंभ अग्नि शब्द से होता है. ऋग्वेद की पहली ऋचा के पहले मंत्र का पहला शब्द है अग्नि.

योगी अश्विनी के अनुसार यह शब्द और मंत्र ब्रह्मांड की सूक्ष्म शक्तियों और हवनकर्ता को जोड़ता है. अग्नि में ऊपर उठाने की क्षमता है. यही एक ऐसा तत्व है जो गुरुत्व शक्ति के नियम का अतिक्रम करते हुए ऊपर की ओर जाता है.

अग्नि व्यक्ति के विचारों को शुद्ध रखती और उसका आत्मिक उत्थान करती है. इन दिनों होने वाले हवन में तो चारों तरफ धुंआ भर जाता है. उसमें बैठना भी दूभर हो जाता है. जबकि हवन से वातावरण शांत और निर्मल हो जाना चाहिए.

उसमें किसी भी व्यक्ति को खांसी और बेचैनी नहीं होती. यहां तक कि आहुतियां दिए जाते समय यज्ञशाला में पशु पक्षी भी निस्संकोच आ कर बैठ जाते हैं और अच्छा महसूस करते हैं.

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हवन के ज़रिये होता है वर्षा का आगमन 

अक्सर आपने देखा सुना होगा जब बारिश नहीं होती तो ऋषि मुनि या साधू संत हवन करते हैं या यज्ञ करने की सलाह देते हैं. पुराणों में भी हवन से वृष्टि सहायता मिलने का उल्लेख पाया जाता है. इसका आशय यह है कि हवन द्वारा वायु में कुछ ऐसे परिवर्तन होना चाहिये जो वृष्टि में सहायक सिद्ध हों. भौतिक विज्ञान ने यह सिद्ध किया है कि किसी स्थान पर वृष्टि हो सकने के लिए अनेक साधनों की आवश्यकता होती है. बादल बनने के लिए निम्नलिखित शर्ते आवश्यक है-

  • हवा में नमी का होना
  • हवा में रेणु कणों का होना
  • यदि हवा में रेणु कण न हो तो अल्ट्रा वायोलेट रेज ,एक्सरेज या रेडियम इमेनेशन गुजार कर कृत्रिम रेणु कण स्वयम बना लिए जाए जो रेणु कणों का काम करे.
  • हवा को इतना ठंडा कर दिया जाए कि उस में विद्यमान जलवाष्प स्वयम द्रवीकृत हो जाए.
  • हवा में नमी की राशि
  • वायु मंडल का ताप परिमाण
  • वायु के फैलने की गुंजाइश
  • नमी के लिए रेणु कणों के गुण ,आकार और संख्या

हवन गैस से वर्षा होने में कारण ज़हा एक सीमा तक हवन से उत्पन्न वे जले कार्बन के जर्रे है ,वहा उनसे भी अधिक घी के आद्रता चूसक ज़र्रे है. घी की परत वाले छोटे छोटे जर्रे नमी खीच सकते है.और एक बार नमी जमने से उन पर नमी जमती ही चली जाती है. कोयले के कई जर्रे जो घी की परत से ढक जाते है ऋणबिद्युतविष्ट देखे गये है, जो स्वभावतय पानी को खीचते है.इस तरह साधारणतय छोटे हवन बादल बनाने और ऋतू के अनुसार वर्षा में साहयक होते है. किसी विशेष समय वर्षा लाने के लिए हवन को बड़ी मात्रा पर और विशेष विशेष पदार्थो ( जिनसे आद्रता चूसने वाले गैस या जर्रे बने ) करना आवश्यक है.बहुत बड़े हवन ही उर्ध्व गति के वायु को पैदा करके वर्षा लाने का काम कर सकते है. हवन में तेल घी जैसे आद्रता चूसने वाले पदार्थ होने के कारण बादल न होने पर भी नमी को खीच कर, बादल बना कर वर्षा कर सकते है.जिनसे वर्षा रुक सके या बादल हट सके. इनमे ऐसे पदार्थ डाले जा सकते है जिससे बहुत मात्रा में ठोस कण बने और आद्रता को खीचने के स्थान पर उससे वाष्प बनाने का काम करे.

हवन निःसंदेह एक लोकोपयोगी कार्य है और इसका प्रभाव मानव जीवन के लिये हितकर ही होता है. 

यज्ञ के द्वारा जो शक्तिशाली तत्व वायुमण्डल में फैलाये जाते हैं, उनसे हवा मेंघूमते असंख्यों रोग कीटाणु सहज ही नष्ट होते हैं. डी.डी.टी., फिनायल आदिछिड़कने, बीमारियों से बचाव करने वाली दवाएँ या सुइयाँ लेने से भी कहीं अधिककारगर उपाय यज्ञ करना है. साधारण रोगों एवं महामारियों से बचने का यज्ञ एकसामूहिक उपाय है. दवाओं में सीमित स्थान एवं सीमित व्यक्तियों को ही बीमारियोंसे बचाने की शक्ति है; पर यज्ञ की वायु तो सर्वत्र ही पहुँचती है और प्रयतन न करनेवाले प्राणियों की भी सुरक्षा करती है. मनुष्य की ही नहीं, पशु-पक्षियों, कीटाणुओंएवं वृक्ष-वनस्पतियों के आरोग्य की भी यज्ञ से रक्षा होती है.

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