क्या हर धर्म में समय की गणना अलग है?
समय केवल घड़ी की सुई या कैलेंडर के पन्नों तक सीमित नहीं है। हर सभ्यता और हर धर्म ने समय को अपनी आस्था, परंपरा और जीवन-दर्शन के अनुसार समझा और मापा है। यही कारण है कि दुनिया के अलग-अलग धर्मों में समय की गणना एक जैसी नहीं है। कहीं चंद्रमा को आधार माना गया, तो कहीं सूर्य को, और कहीं दोनों का संतुलन बनाया गया। प्रश्न यह है कि क्या वाकई हर धर्म में समय की गणना अलग है? आइए इसे विस्तार से समझते हैं।
समय की धार्मिक अवधारणा क्यों अलग होती है?
धर्म केवल पूजा-पद्धति नहीं, बल्कि जीवन जीने का तरीका है। समय की गणना उसी जीवन-दर्शन से जुड़ी होती है।
कृषि आधारित समाजों में मौसम और सूर्य महत्वपूर्ण रहे
आध्यात्मिक परंपराओं में चंद्रमा का प्रभाव अधिक माना गया
कुछ धर्मों में समय को रेखीय (सीधा) माना गया, तो कुछ में चक्रीय (घूमता हुआ)
हिंदू धर्म में समय की गणना
हिंदू धर्म में समय को चक्रीय माना गया है। यहां समय सिर्फ साल या महीने तक सीमित नहीं, बल्कि युगों में बंटा है।
विक्रम संवत और शक संवत प्रचलित हैं
चंद्र-सौर पंचांग का उपयोग होता है
तिथि, नक्षत्र, योग और करण के आधार पर दिन तय होते हैं
चार युग – सतयुग, त्रेता, द्वापर और कलियुग
हिंदू परंपरा में समय अनंत है, न उसका आरंभ है, न अंत।
इस्लाम में समय की गणना
इस्लाम में समय की गणना पूरी तरह चंद्र कैलेंडर पर आधारित है।
हिजरी कैलेंडर का उपयोग
महीने 29 या 30 दिन के होते हैं
नया महीना चांद देखने से शुरू होता है
रमज़ान, ईद, हज जैसे पर्व इसी पर निर्भर
इस्लामी कैलेंडर सूर्य से मेल नहीं खाता, इसलिए त्योहार हर साल लगभग 10–11 दिन पहले आ जाते हैं।
ईसाई धर्म में समय की गणना
ईसाई धर्म में ग्रेगोरियन कैलेंडर प्रचलित है, जो आज वैश्विक रूप से अपनाया गया है।
सूर्य आधारित कैलेंडर
365 दिन का वर्ष, लीप ईयर में 366
ईसा मसीह के जन्म को आधार (AD/BC या CE/BCE)
हालांकि ईसाई त्योहारों जैसे ईस्टर की तिथि चंद्रमा की स्थिति से तय होती है।
यहूदी धर्म में समय की गणना
यहूदी धर्म में चंद्र-सौर कैलेंडर अपनाया गया है।
महीने चंद्रमा पर आधारित
वर्ष सूर्य के अनुसार समायोजित
हर कुछ वर्षों में अतिरिक्त महीना जोड़ा जाता है
धार्मिक पर्व ऋतु से जुड़े रहते हैं
यह संतुलन यह सुनिश्चित करता है कि पर्व सही मौसम में ही आएं।
बौद्ध और जैन धर्म में समय की अवधारणा
बौद्ध और जैन धर्मों में भी चंद्र कैलेंडर का प्रभाव दिखता है।
पूर्णिमा और अमावस्या का विशेष महत्व
व्रत और उपवास तिथियों पर आधारित
समय को कर्म और पुनर्जन्म से जोड़ा गया है
इन धर्मों में समय आत्मिक यात्रा का माध्यम है।
क्या आधुनिक दुनिया में सब एक कैलेंडर मानते हैं?
व्यवहारिक जीवन में आज अधिकांश देश ग्रेगोरियन कैलेंडर का उपयोग करते हैं, लेकिन धार्मिक जीवन में हर धर्म अपना पारंपरिक कैलेंडर आज भी मानता है।
यही कारण है कि अलग-अलग धर्मों के नए साल, त्योहार और पर्व अलग तिथियों पर आते हैं।
तो उत्तर स्पष्ट है—
हाँ, हर धर्म में समय की गणना अलग है, क्योंकि हर धर्म की सोच, जीवन-दृष्टि और आस्था अलग है। समय की यह विविधता हमें सिखाती है कि दुनिया को देखने के कई दृष्टिकोण हो सकते हैं, और यही विविधता मानव सभ्यता को सुंदर बनाती है।









