जब भी धर्म की बात होती है, अधिकतर लोगों के मन में सबसे पहले पूजा-पाठ, मंदिर, मस्जिद, व्रत, उपवास और धार्मिक अनुष्ठान की छवि उभर आती है। बहुत-से लोग मानते हैं कि अगर कोई व्यक्ति पूजा करता है, नियम निभाता है, तो वह धार्मिक है; और अगर नहीं करता, तो वह धर्म से दूर है। लेकिन सवाल यह है कि क्या धर्म वास्तव में सिर्फ पूजा-पाठ तक ही सीमित है?
सच यह है कि धर्म का अर्थ पूजा-पाठ से कहीं अधिक व्यापक और गहरा है।
धर्म का मूल उद्देश्य
धर्म शब्द की उत्पत्ति “धृ” धातु से हुई है, जिसका अर्थ है—जो धारण किया जाए, जो जीवन को संभाले।
धर्म का असली उद्देश्य इंसान को बेहतर मानव बनाना है—उसके विचार, व्यवहार और कर्म को सही दिशा देना। पूजा-पाठ धर्म का एक साधन हो सकता है, लेकिन वह उसका अंतिम लक्ष्य नहीं है।
पूजा-पाठ: साधन या लक्ष्य?
पूजा-पाठ का उद्देश्य ईश्वर से जुड़ाव, आत्मशुद्धि और मन की एकाग्रता है।
लेकिन जब पूजा केवल रस्म बन जाए और उसके पीछे की भावना खो जाए, तब वह अर्थहीन हो जाती है।
अगर कोई व्यक्ति पूजा करता है, लेकिन उसके व्यवहार में करुणा, सत्य और ईमानदारी नहीं है, तो उसकी धार्मिकता अधूरी रह जाती है।
धर्म और नैतिक मूल्य
धर्म हमें सिखाता है—
सत्य बोलना,
दया करना,
अन्याय का विरोध करना,
और ज़रूरतमंद की सहायता करना।
ये सभी मूल्य पूजा-पाठ से ज़्यादा दैनिक जीवन के आचरण से जुड़े हैं।
वास्तविक धर्म वह है जो इंसान को अच्छा पिता, ईमानदार नागरिक, संवेदनशील मित्र और ज़िम्मेदार समाज-सदस्य बनाए।
कर्म ही धर्म की कसौटी
लगभग सभी धार्मिक परंपराएँ इस बात पर ज़ोर देती हैं कि कर्म ही धर्म का आधार है।
गीता कहती है—कर्म करो,
इस्लाम में नेक अमल पर बल है,
ईसाई धर्म प्रेम और सेवा सिखाता है,
सिख धर्म सेवा और समानता पर ज़ोर देता है।
इन सभी में पूजा से अधिक महत्व आचरण और कर्म को दिया गया है।
धर्म और समाज
अगर धर्म केवल व्यक्तिगत पूजा तक सीमित होता, तो समाज में न्याय, समानता और करुणा की बातें न होतीं।
धर्म समाज को जोड़ने, अन्याय के ख़िलाफ़ आवाज़ उठाने और मानव गरिमा की रक्षा करने का माध्यम भी है।
जब धर्म केवल पूजा-स्थलों तक सिमट जाता है, तब वह समाज की समस्याओं से कट जाता है।
आधुनिक जीवन में धर्म की भूमिका
आज का इंसान तनाव, अकेलेपन और नैतिक भ्रम से जूझ रहा है।
ऐसे में धर्म का काम केवल पूजा-पाठ सिखाना नहीं, बल्कि जीवन जीने की समझ देना है।
धर्म हमें सिखाता है कि सफलता के साथ विनम्र कैसे रहें, असफलता में संतुलन कैसे बनाए रखें और शक्ति मिलने पर अहंकार से कैसे बचें।
पूजा के बिना धर्म संभव है?
यह सवाल कई लोग पूछते हैं।
उत्तर यह है कि पूजा-पाठ व्यक्ति की आस्था पर निर्भर करता है, लेकिन धार्मिक मूल्य हर इंसान के जीवन में हो सकते हैं।
अगर कोई व्यक्ति ईमानदार है, करुणामय है और दूसरों के अधिकारों का सम्मान करता है, तो वह धर्म के मूल सिद्धांतों का पालन कर रहा है—भले ही वह नियमित पूजा करता हो या नहीं।
निष्कर्ष
तो क्या धर्म सिर्फ पूजा-पाठ तक सीमित है?
नहीं।
पूजा-पाठ धर्म का एक भाग है, संपूर्ण धर्म नहीं। धर्म का वास्तविक स्वरूप हमारे कर्म, व्यवहार, सोच और समाज के प्रति हमारी ज़िम्मेदारी में दिखाई देता है।
अगर पूजा हमें बेहतर इंसान बनाए, तो वह सार्थक है। लेकिन अगर पूजा के बावजूद हम संवेदनहीन, असत्यवादी और अहंकारी बने रहें, तो हमें अपने धर्म को फिर से समझने की ज़रूरत है।
~ रिलीजन वर्ल्ड ब्यूरो









