श्रुतपंचमी यानि ज्ञानअमृत पर्व : क्या है इसका इतिहास और महत्त्व

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श्रुतपंचमी यानि ज्ञानअमृत पर्व : क्या है इसका इतिहास और महत्त्व

प्रतिवर्ष ज्येष्ठ शुक्ला पंचमी को जैन समाज में, श्रुतपंचमी पर्व मनाया जाता है। जैन मुनियों के अनुसार श्रुत पंचमी पर्व ज्ञान की आराधना का महान पर्व है, जो जैन भाई-बंधुओं को वीतरागी संतों की वाणी सुनने, आराधना करने और प्रभावना बांटने का संदेश देता है। इस दिन मां जिनवाणी की पूजा अर्चना करते हैं।

श्रुतपंचमी का इतिहास

प्रत्येक पर्व को मनाने के पीछे कोई इतिहास अवश्य होता है. ठीक इसी प्रकार इस पर्व को मनाने के पीछे भी एक इतिहास है,आइये जानते हैं इसके बारे में-

कहते हैं कि श्री वर्द्धमान जिनेन्द्र के मुख से श्री इन्द्रभूति (गौतम) गणधर ने श्रुत को धारण किया। उनसे सुधर्माचार्य ने और उनसे जम्बू नामक अंतिम केवली ने ग्रहण किया।भगवान महावीर के निर्वाण के बाद इनका कार्य 62 वर्ष है।

पश्चात 100 वर्ष में 1-विष्णु 2- नन्दिमित्र 3-अपराजित 4-गोवर्धन और 5-भद्रबाहु, ये पांच आर्चाय पूर्ण द्वादशांग के ज्ञाता श्रुतकेवली हुए।

तदनंतर ग्यारह अंग और दश पूर्वों के वेत्ता से ग्यारह आचार्य हुए- 1-विशाखाचार्य 2-प्रोष्ठिन 3-क्षत्रिय 4-जय 5-नाग 6-सिद्धार्थ 7-धृतिसेन 8-विजय 9-बुद्धिल 10-गंगदेव और 11-धर्म सेन। इनका काल 183 वर्ष है।

तत्पश्चात 1-नक्षत्र, 2-जयपाल, 3-पाण्डु, 4-ध्रुवसेन और 5-कंस ये पांच आर्चाय ग्यारह अंगों के धारक है। इनका काल 220 वर्ष है।

तदनन्तर 1– सुभद्र 2-यशोभद्र 3- यशोबाहु और 4- लोहार्य, ये चार आचार्य एकमात्र आचारंग के धारक हुए। इनका समय 11 वर्ष है। इसके पश्चात अंग और पूर्ववेत्तओं की परम्परा समाप्त हो गई और सभी अंगों और पूर्वों के एकदेश का ज्ञान आचार्य परम्परा से धरसेनाचार्य को प्राप्त हुए।

ये दूसरे अग्रायणी पूर्व के अंतर्गत चौथे महाकर्म प्रकृति प्राभृत के विशिष्ट ज्ञाता थे। श्रुतावतार की यह परम्परा धवला टीका के रचयिता आचार्य वीरसेन स्वामी के अनुसार है। नन्दिसंघ की जो प्राकृत पट्टावली उपलब्ध है उसके अनुसार भी श्रुतावतार का यही क्रम है। केवल आचार्य के कुछ नामों में अंतर है, फिर भी मोटे तौर पर उपयुक्त कालगणना के अनुसार भगवान महावीर के निर्वाण से 62 ,100,183, 220, 118:- 693 वर्षों के व्यतीत होने पर आचार्य धरसेन हुए, ऐसा स्पष्ट निष्कर्ष निकलता है। नन्दिसंघ की पट्टावली के अनुसार धरसेनाचायार्य का काल वीर निर्वाण से 614 वर्ष पश्चात जान पड़ता है।

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कैसे हुयी षट्खण्डामग की रचना

आचार्य धरसेन अष्टांग महानिमित्त के ज्ञाता थे। जिस प्रकार दीपक से दीपक जलाने की परम्परा चालू रहती है उसी प्रकार आचार्य धरसेन तक भगवान महावीर की देशना आंशिक रूप में पूर्ववत धाराप्रवाह रूप में चली आ रही थी। आचार्य धरसेन काठियावाड में स्थित गिरिनगर (गिरिनाम पर्वत) की चन्द्र गुफा में रहते थे। जब वे बहुत वृद्ध हो गए और अपना जीवन अत्यल्प अवशिष्ट देखा तब उन्हें यह चिंता हुई कि अवर्सार्पणी काल के प्रभाव से श्रुतज्ञान का दिन प्रतिदिन हृास होता जाता है। इस समय मुझे जो कुछ श्रुतप्राप्त है, उतना भी आज किसी को नहीं है, यदि मैं अपना श्रुत दूसरे को नहीं दे सका तो यह भी मेरे ही साथ समाप्त हो जायेगा। उस समय देशेन्द्र नामक देश में वेणाकतटीपुर में महामहिमा के अवसर पर विशाल मुनि समुदाय विराजमान था। श्री धरसेनाचार्य ने एक ब्रह्मचारी के हाथ वहां मुनियों के पास एक पत्र भेजा। उसमें लिखा था-

‘‘स्वस्ति श्रीमत इत्यूर्जयन्त तटनिकट चन्द्रगुहा- 
वासाद धरसेनगणी वेणाकतट समुदितयतीन।। 
अभिवन्द्य कार्यमेवं निगदत्यस्माकमायुरवशिष्टम्। 
स्वल्प तस्मादस्मच्छुतस्य शास्त्र व्युच्छित्तिः।। 
न स्यात्तथा तथा द्वौ यतीश्वरौ ग्रहण धारण समर्थों। 
निशितप्रज्ञौ यूयं प्रसपयत..।।’’

‘स्वस्ति श्रीमान् ऊर्जयंत तट के निकट स्थित चन्द्रगुहावास से धरसेनाचार्य वेणाक तट पर स्थित मुनिसमूहों को वंदना करके इस प्रकार से कार्य को कहते हैं कि हमारी आयु अब अल्‘प ही अवशिष्ट रही है। इसलिए हमारे श्रुतज्ञानरूप शास्त्र का व्युच्छेद जिस प्रकार से न हो जावे उसी तरह से आप लोग तीक्ष्ण बुद्धि वाले श्रुत को ग्रहण और धारण करणे में समर्थ दो यतीश्वरों को मेरे पास भेजो।’’

मुनि संघ ने आचार्य धरसेन के श्रुतरक्षा सम्बंधी अभिप्राय को जानकर दो मुनियों को गिरिनगर भेजा।

श्री धरसेनाचार्य ने मुनियों की परीक्षा ली

श्री धरसेनाचार्य ने उनकी परीक्षा ली। एक को अधिक अक्षरों वाला और दूसरे को हीन अक्षरों वाला विद्यामंत्र देकर दो उपवास सहित उसे साधने को कहा। ये दोनों गुरू के द्वारा दी गई विद्या को लेकर और उनकी आज्ञा से भी नेमिनाथ तीर्थकर की सिद्धभूमि पर जाकर नियमपूर्वक अपनी अपनी विद्या की साधना करने लगे । जब उनकी सिद्या सिद्ध हो गई  तब वहां पर उनके सामने दो देवियां आई। उनमें से एक देवी के एक ही आंख थी और दूसरी देवी के दांत बड़े-बड़े थे।

मुनियों ने जब सामने देवों को देखा तो जान लिया कि मंत्रों में कोई त्रुटि है, क्योंकि देव विकृतांग्र नहीं होते हैं। तब ब्याकरण की दृष्टि से उन्होंने मंत्र पर विचार किया। जिसके सामने एक आंख वाली देवी आई थी उन उन्होंने अपने मंत्र में एक वर्ण कम पाया तथा जिसके सामने लम्बे दांतों वाली देवी आई थी उन्होंने अपने मंत्र में एक वर्ण अधिक पाया।

दोनों ने अपने-अपने मंत्रों को शुद्ध कर पुनः अनुष्ठान किया, जिसके फलस्वरूप देवियां अपने यथार्थ स्वरूप में प्रकट हुई तथा बोली कि हे नाथ! आज्ञा दीजिए! हम आपका क्या कार्य करें? दोनों मुनियों ने कहा-देवियों! हमारा कुछ भी कर्य नहीं है। हमने तेा केवल गुरूदेव की आज्ञा से ही विद्यामंत्र की आराधना की है। ये सुनकर वे देवियां अपने स्थान को चली गई।

मुनियों की इसी कुशलता से गुरू ने जान लिया कि सिद्धांत का अध्ययन करने के लिए वे योग्य पात्र है। आचार्य श्री ने उन्हें सिद्धांत का अध्ययन कराया। वह अध्ययन अषाढ शुक्ल एकादशी के दिन पूर्ण हुआ। इस दिन देवों ने दोनों मुनियों की पूजा की। एक मुनिराज को ‘पुष्पदन्त’ तथा दूसरे मुनिराज को ‘भूतबलि’ नाम से घोषित किया।

अनन्तर श्री धरसेनाचार्य ने वचनों द्वारा योग्य उपदेश देकर दूसरे ही दिन वहां से कुरीश्वर देश की ओर विहार करा दिया। वे उसी दिन वहां से चल दिए और अकलेश्वर (गुजरात) में आकर उन्होंने वर्षाकाल बिताया। वर्षाकाल व्यतीत कर पुष्पदन्त आचार्य तो अपने भानजे जिनपालित के साथ वनवास देश को चले गए और भूतबलि भट्टारक द्रविड देश को चले गए।

पुष्पदन्त मुनिराज अपने भानजे को पढाने के लिए महाकर्म प्रकृति प्रभृत का छह खण्डों में उपसंहार करना चाहते थे अतः उन्होंने बीस अधिकार गर्भित सत्प्ररूपणा सूत्रों को बनाकर शिष्यों को पढाया और भूतबलि मुनि का अभिप्राय जानने के लिए जिपालित को यह ग्रन्थ देकर उनके पास भेज दिया। इस रचना को और पुष्पदन्त मुनि के खटखण्डागम रचना के अभिप्राय को जानकर एवं उनकी आयु भी अल्प है ऐसा समझकर श्री भूतबलि आचार्य ने ‘‘द्रव्यप्ररूपणा’’ आदि अधिकारों को बनाया।

इस तरह पूर्व के सूत्रों सहित छह हजार श्लोक प्रमाण में इन्होंने पांच खण्ड बनाये। छह खण्डों के नाम हैं-जीवस्थान, क्षुद्रक बंध, बंधस्वामित्व, वेदना खण्डा, वर्गणाखण्ड, और महाबंध। भूतबलि आचार्य ने इन षटखण्डागम सूत्रों को पुस्तक बद्ध किया और ज्येष्ठ सुदीपंचमी के दिन चतुर्विध संघ सहित कृतिकर्मपूर्वक महापूजा की। इसी दिन से इस पंचमी का ‘श्रुतपंचमी’ नाम प्रसिद्ध हो गया। तब से लेकर लोग श्रुतपंचमी के दिन श्रुत की पूजा करते आ रहे हैं।

श्रुतपंचमी का महत्त्व

जैन समाज में इस दिन का विशेष महत्व है। इसी दिन पहली बार जैन धर्मग्रंथ लिखा गया था। भगवान महावीर ने जो ज्ञान दिया, उसे श्रुत परंपरा के अंतर्गत अनेक आचार्यों ने जीवित रखा। गुजरात के गिरनार पर्वत की चन्द्र गुफा में धरसेनाचार्य ने पुष्पदंत एवं भूतबलि मुनियों को सैद्धांतिक देशना दी जिसे सुनने के बाद मुनियों ने एक ग्रंथ रचकर ज्येष्ठ शुक्ल पंचमी को प्रस्तुत किया।

सकी सबसे बड़ी विशेषता यह रही कि इस दिन से श्रुत परंपरा को लिपिबद्ध परंपरा के रूप में प्रारंभ किया गया। उस ग्रंथ को ‘षटखंडागम’ के नाम से जाना जाता है। इस दिन से श्रुत  परंपरा को लिपिबद्ध परंपरा के रूप में प्रारंभ किया गया था इसीलिए यह दिवस श्रुत पंचमी के नाम से जाना जाता है। इसका एक अन्य नाम ‘प्राकृत भाषा दिवस’ भी है।
श्रुत पंचमी के दिन जैन धर्मावलंबी मंदिरों में प्राकृत, संस्कृत, प्राचीन भाषाओं में हस्तलिखित प्राचीन मूल शास्त्रों को शास्त्र भंडार से बाहर निकालकर, शास्त्र-भंडारों की साफ-सफाई करके, प्राचीनतम शास्त्रों की सुरक्षा की दृष्टि से उन्हें नए वस्त्रों में लपेटकर सुरक्षित किया जाता है तथा इन ग्रंथों को भगवान की वेदी के समीप विराजमान करके उनकी पूजा-अर्चना करते हैं, क्योंकि इसी दिन जैन शास्त्र लिखकर उनकी पूजा की गई थी, क्योंकि उससे पहले जैन ज्ञान मौखिक रूप में आचार्य परंपरा से चल रहा था। इस दिन जैन धर्मावलंबी पीले वस्त्र धारण करके जिनवाणी की शोभा यात्रा निकालकर पर्व को मनाते हैं, साथ ही अप्रकाशित दुर्लभ ग्रंथों/  शास्त्रों को प्रकाशित करने के उद्देश्य से समाज के लोग यथाशक्ति दान देकर इस परंपरा का निर्वहन करते हैं।
चित्र साभार- जैन इनसाइक्लोपीडिया 
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