धर्म और आधुनिक जीवन में टकराव क्यों दिखता है?

धर्म और आधुनिक जीवन में टकराव क्यों दिखता है?

धर्म और आधुनिक जीवन में टकराव क्यों दिखता है?

आज का मनुष्य एक अजीब द्वंद्व में जी रहा है। एक ओर तेज़ी से बदलती तकनीक, आधुनिक सोच, करियर, भौतिक सुख और वैश्विक संस्कृति है, तो दूसरी ओर सदियों पुरानी धार्मिक मान्यताएँ, परंपराएँ और नैतिक मूल्य। ऐसे में अक्सर यह सवाल उठता है कि धर्म और आधुनिक जीवन के बीच टकराव क्यों दिखाई देता है? क्या यह टकराव वास्तविक है या केवल हमारी सोच का भ्रम?

धर्म का मूल उद्देश्य क्या है?

धर्म का मूल उद्देश्य कभी भी समाज को जकड़ना नहीं रहा। हर धर्म का सार यही रहा है कि मनुष्य को सही और गलत की पहचान कराई जाए, नैतिकता सिखाई जाए और जीवन को संतुलित बनाया जाए। धर्म ने समाज को जोड़ने, अनुशासन देने और आत्मिक शांति प्रदान करने का कार्य किया है।

लेकिन समस्या तब शुरू होती है जब धर्म को केवल कर्मकांड, नियमों और बाहरी दिखावे तक सीमित कर दिया जाता है। जब धर्म का आत्मिक पक्ष कमजोर और उसका कठोर स्वरूप सामने आता है, तब आधुनिक सोच से उसका टकराव स्वाभाविक हो जाता है।

आधुनिक जीवन की प्राथमिकताएँ

आधुनिक जीवन की सबसे बड़ी विशेषता है — तेज़ी। तेज़ फैसले, तेज़ परिणाम और तुरंत संतुष्टि। आज का व्यक्ति प्रश्न पूछना चाहता है, तर्क चाहता है और हर चीज़ का वैज्ञानिक प्रमाण ढूंढता है। वहीं धर्म अक्सर आस्था, विश्वास और परंपरा पर आधारित होता है।

यहीं से टकराव की शुरुआत होती है। आधुनिक मनुष्य जब किसी धार्मिक परंपरा का कारण पूछता है और उसे तर्कपूर्ण उत्तर नहीं मिलता, तो वह धर्म को पिछड़ा या अप्रासंगिक मानने लगता है।

परंपरा बनाम परिवर्तन

धर्म स्थिरता का प्रतीक है, जबकि आधुनिक जीवन परिवर्तन का। परंपराएँ समय के साथ बनीं और उन्होंने समाज को एक पहचान दी। लेकिन जब वही परंपराएँ समय के अनुसार खुद को नहीं ढाल पातीं, तो वे बोझ लगने लगती हैं।

उदाहरण के लिए, स्त्री-पुरुष समानता, जाति व्यवस्था, व्यक्तिगत स्वतंत्रता जैसे विषयों पर आधुनिक सोच तेज़ी से आगे बढ़ी है, जबकि कई धार्मिक व्याख्याएँ आज भी पुराने सामाजिक ढाँचे से जुड़ी दिखाई देती हैं। यही अंतर टकराव को और गहरा करता है।

धर्म की व्याख्या में समस्या

असल टकराव धर्म और आधुनिकता के बीच नहीं, बल्कि धर्म की संकीर्ण व्याख्या और आधुनिक सोच के बीच है। हर युग में धर्म की नई व्याख्या होती रही है। लेकिन जब कुछ लोग धर्म को सत्ता, नियंत्रण या डर के माध्यम के रूप में इस्तेमाल करते हैं, तब वह आधुनिक मूल्यों से टकराने लगता है।

धर्म यदि करुणा, सह-अस्तित्व और मानवता की बात करे, तो वह आधुनिक जीवन से कभी टकराएगा नहीं।

सोशल मीडिया और गलत धारणाएँ

आज सोशल मीडिया ने इस टकराव को और बढ़ा दिया है। अधूरी जानकारी, भड़काऊ वीडियो और कट्टर विचारधाराएँ धर्म को कठोर रूप में प्रस्तुत करती हैं। दूसरी ओर, आधुनिकता के नाम पर धर्म का मज़ाक उड़ाया जाता है।

इससे दोनों पक्षों में असहिष्णुता बढ़ती है और संवाद की जगह विवाद ले लेता है।

क्या समाधान संभव है?

बिल्कुल। समाधान टकराव में नहीं, संवाद और समझ में है। धर्म को समय के अनुसार समझना होगा और आधुनिक जीवन को मूल्यों से जोड़ना होगा।

आधुनिक जीवन बिना नैतिकता के खोखला है और धर्म बिना समय के संदर्भ के जड़। जब दोनों एक-दूसरे को समझेंगे, तब टकराव अपने आप कम होगा।

धर्म हमें इंसान बनना सिखाता है और आधुनिक जीवन हमें आगे बढ़ना। यदि दोनों का संतुलन बने, तो समाज अधिक शांत, न्यायपूर्ण और संवेदनशील हो सकता है।

धर्म और आधुनिक जीवन के बीच जो टकराव दिखाई देता है, वह असल में सोच और व्याख्या का टकराव है। धर्म स्थायी मूल्यों की बात करता है और आधुनिकता बदलते साधनों की। जब दोनों को संतुलित रूप में अपनाया जाए, तो टकराव नहीं, बल्कि सहयोग का रास्ता निकलता है।

~ रिलीजन वर्ल्ड ब्यूरो

Post By Religion World