धर्म और ज्योतिष में मतभेद क्यों हैं?

धर्म और ज्योतिष में मतभेद क्यों हैं?

धर्म और ज्योतिष में मतभेद क्यों हैं?

धर्म और ज्योतिष—दोनों ही मानव जीवन को दिशा देने का प्रयास करते हैं, फिर भी इनके बीच अक्सर विरोध और मतभेद देखने को मिलते हैं। कई लोग धर्म को सर्वोपरि मानते हैं, जबकि कुछ ज्योतिष को जीवन का मार्गदर्शक समझते हैं। ऐसे में प्रश्न उठता है कि जब उद्देश्य समान है, तो मतभेद क्यों हैं?

धर्म की मूल अवधारणा

धर्म का आधार ईश्वर, आत्मा, नैतिकता और कर्म पर टिका होता है। अधिकांश धर्म यह मानते हैं कि मनुष्य का भविष्य उसके कर्मों और ईश्वर की कृपा पर निर्भर करता है, न कि ग्रहों की चाल पर।

ज्योतिष का दृष्टिकोण

ज्योतिष यह मानता है कि ग्रहों और नक्षत्रों की स्थिति मानव जीवन की घटनाओं को प्रभावित करती है। यह भविष्य को तय नहीं करता, बल्कि संभावनाओं की ओर संकेत करता है।

टकराव का मुख्य कारण

धर्म और ज्योतिष के बीच टकराव का सबसे बड़ा कारण है—
भाग्य बनाम स्वतंत्र इच्छा
धर्म कहता है कि मनुष्य अपने कर्म से सब बदल सकता है।
ज्योतिष कहता है कि कुछ घटनाएं पूर्वनिर्धारित होती हैं।

धार्मिक ग्रंथों का नजरिया

हिंदू धर्म में ज्योतिष को वेदांग का दर्जा मिला है, लेकिन इस्लाम और ईसाई धर्म में ज्योतिष को संदेह की दृष्टि से देखा गया।
यही भिन्नता मतभेद को जन्म देती है।

आधुनिक समाज और सोच

आज का समाज वैज्ञानिक सोच को महत्व देता है। इसलिए धर्म और ज्योतिष दोनों को आस्था और विश्वास के रूप में देखा जाने लगा है, न कि अंतिम सत्य के रूप में।

धर्म और ज्योतिष का संघर्ष वास्तविक नहीं, बल्कि दृष्टिकोण का अंतर है। जब दोनों को संतुलन के साथ समझा जाए, तो टकराव नहीं, बल्कि मार्गदर्शन मिलता है।

~ रिलीजन वर्ल्ड ब्यूरो

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