मैं अयोध्या हूँ …कोई मुझसे पूछे की मैं क्या चाहती हूँ…

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मैं अयोध्या हूँ … कोई मुझसे पूछे की मैं क्या चाहती हूँ…

मैं अयोध्या हूँ…….न जाने कितने युगों से मैं अपने आसपास के माहौल में बदलाव देख रही हूँ. मैंने एक ओर जहां त्रेतायुग में श्रीराम का जन्म देखा….उनकी अठखेलियाँ देखीं, श्री राम और सीता का विवाह देखा, उनका वन जाना देखा….रावण का वध कर अपना वनवास ख़त्म कर उनका वापस आना देखा…. मुझे याद हैं जब श्री राम के पुनःआगमन पर मैं कैसे रोशनियों से जगमगा रही थी. दूसरी ओर मैं कलयुग में भी सबको देख रही हूँ. कैसे लोग आपस में झगड़ रहे हैं. हिन्दू मुस्लिम का बैर चारो ओर नज़र आ रहा है. बाबरी मस्जिद या राम मंदिर के नाम पर दंगे भड़क रहे हैं. लेकिन मैं यानि अयोध्या क्या ऐसी ही रही है. मैं शुरू से ही धार्मिक व सांप्रदायिक सौहार्द की नगरी रही हूँ. मेरी नगरी में हिन्दू मुसलमान में मैंने कभी कोई बैर नहीं देखा. कोई मुसलमान दर्जी भगवान राम की मूर्तियों के लिए कपड़े सिले और हिंदू पुजारी किसी पुरानी मस्जिद के जीर्णोद्धार में मदद करे, यहां यह आम बात है.

हिंदू धर्म व जनमानस के गहरे तक रची बसी मैं (अयोध्या) बीते कुछ वर्षो में हिंदू-मुस्लिम के बीच बैरभाव और धार्मिक व राजनीतिक संघर्ष की शरणस्थली की पहचान बन गयी और पूरे देश में इसकी गूँज सुनाई देने लगी .

हिंदू कट्टरपंथियों द्वारा 16वीं सदी की बाबरी मस्जिद के विध्वंस को 6 दिसंबर को 25 साल पूरे हो रहे हैं लेकिन मेरी नगरी के निवासी (अयोध्यावासी) ह्रदय से दुखी हैं. यहाँ के लोगों का मानना है कि उनकी सदियों पुरानी सांस्कृतिक सहयोग की विरासत और एक दूसरे के धार्मिक कार्यो में खुलकर हिस्सा लेने की प्रवृत्ति और अयोध्या की धर्मनिरपेक्षता के रंग मंदिर-मस्जिद के राजनीतिक व कानूनी विवाद के बावजूद बरकरार हैं.

अयोध्या में सिर्फ मंदिर ही नहीं दरगाह भी है. वहां के लोगों का क्या कहना है आपक खुद उनसे सुन लीजिये. सैयद मोहम्मद इब्राहिम दरगाह के मोहम्मद चांद काजियाना कहते हैं, अयोध्यावासी हिंदू और मुसलमान दोनों का कहना है कि 1992 में वहां दंगा भड़काने वाले लोग बाहरी थे, स्थानीय लोग तो अपने धर्म व पंथ का ख्याल किए बगैर एक दूसरे की रक्षा में जुटे थे. शहर की कुल 60,000 आबादी में मुस्लिम छह फीसदी हैं लेकिन उन्होंने कभी हिन्दुओं से किसी भी प्रकार का भेदभाव अनुभव नहीं किया. कार सेवकों ने जब 6 दिसंबर 1992 को बाबरी मस्जिद को ढहाया था तो वहां के स्थानीय हिंदूओं ने दरगाह की रक्षा की थी.

आपको बता दूं कि सैयद मोहम्मद इब्राहिम दरगाह 900 साल पुरानी है और इस इस दरगाह में हिंदू श्रद्धालु भी उसी श्रद्धा से आते हैं जितनी श्रद्धा से मुस्लमान आते हैं. जब इस पर हमला हुआ तो हमारे हिंदू भाई इसे चारों ओर से घेरकर खड़े हो गए और उन्होंने इसकी रक्षा की थी.

अयोध्यावासी हिंदू और मुसलमान दोनों का कहना है कि 1992 में वहां दंगा भड़काने वाले लोग बाहरी थे, स्थानीय लोग तो अपने धर्म व पंथ का ख्याल किए बगैर एक दूसरे की रक्षा में जुटे थे. शहर की कुल 60,000 आबादी में मुस्लिम छह फीसदी हैं लेकिन उन्होंने कभी हिन्दुओं से किसी भी प्रकार का भेदभाव अनुभव नहीं किया. कार सेवकों ने जब 6 दिसंबर 1992 को बाबरी मस्जिद को ढहाया था तो वहां के स्थानीय हिंदूओं ने दरगाह की रक्षा की थी.

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मैं (अयोध्या) फैजाबाद जिले के अंतर्गत आती हूँ और मेरे यहाँ करीब 30 फ़ीसद आबादी मुस्लिम है. स्थानीय लोगों से एक अघोषित सा समझौता किया है कि वे राजनीतिज्ञों और बाहरी लोगों की ओर से बैरभाव फैलाने वाले भाषण से आंदोलित नहीं होंगे.

यह वो नगरी है जहां मुसलमान देवी देवताओं के वस्त्रों की सिलाई करते हैं और रामलीला में भाग लेते हैं. इसी प्रकार हिंदू मस्जिदों के जीर्णोद्धार में हाथ बंटाते हैं और जरूरत पड़ने पर उनकी मदद करते हैं.

मेरे यहाँ के एक और निवासी बर्फी महाराज, जो  हैं तो हिन्दू सामाजिक कार्यकर्त्ता. लेकिन उनका मानना है बाबरी मस्जिद को विश्वहिंदू परिषद के लोगों ने गिराया और उसमें स्थानीय निवासियों की कोई भूमिका नहीं थी. वे कहते हैं, “हम लोग न तो नफरत पैदा करने वाले भाषणों से प्रभावित थे और न ही विध्वंस अभियान में शामिल थे. वीएचपी की ओर मस्जिद को ढहाने के लिए यहां बाहरी लोगों को लाया गया था. राम जो धर्मनिरपेक्षता की शिक्षा के लिए चर्चित हैं, उनकी जन्मस्थली के लोग कैसे ऐसा पापकर्म कर सकते हैं?”

मेरी नगरी धार्मिक सद्भाव की मिसाल है. हनुमानगढ़ी के पास एक मस्जिद का जीर्णोद्धार हिंदू महंत ने करवाया था और अस्थायी मंदिर में स्थापित राम की मूर्ति के कपड़ों की सिलाई मुसलमान दर्जी करते थे.

सादिक अली अब तक हिंदू देवताओं के सात से आठ सेट कपड़ों की सिलाई की है. बाबरी मस्जिद-राममंदिर मामले की बातचीत में भागीदार सादिक ने कहा कि मस्जिद तोड़ा जाना दुर्भाग्यपूर्ण था लेकिन उन्हें विवादित भूमि पर राम मंदिर के निर्माण को लेकर कोई आपत्ति नहीं है.

हनुमानगढ़ी के पास एक मस्जिद का जीर्णोद्धार हिंदू महंत ने करवाया था और अस्थायी मंदिर में स्थापित राम की मूर्ति के कपड़ों की सिलाई मुसलमान दर्जी करते थे.

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मेरी नगरी के मुसलमानों को भी भगवन राम पर भरोसा है वे स्वयं कहते हैं कि “हमें राम में विश्वास है और हनुमानगढ़ी में नमाज अदा कर चुके हैं. अगर हिंदू अपने अराध्य भगवान राम का बड़ा मंदिर चाहते हैं तो हमें कोई दिक्कत नहीं है. हमें पास में मस्जिद के लिए सिर्फ भूमि का एक टुकड़ा चाहिए.”

मोहम्मद सलीम खड़ाऊ बनाते हैं जिसका उपयोग परंपरागत रूप से साधु-संत करते हैं. उन्होंने कहा कि उन्होंने कभी दोनों समुदायों के लोगों के बीच यहां तनाव नहीं देखा है. वे सभी एक दूसरे पर अपनी जरूरतों के लिए निर्भर हैं.

राम मंदिर और बाबरी मस्जिद विवाद के दौरान कई ऐतिहासिक दस्तावेज और पुरातात्विक साक्ष्य दिखाए गए. भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण के पूर्व क्षेत्रीय निदेशक केके मुहम्मद ने मलयालम में लिखी अपनी आत्मकथा-‘न्यांन एन्ना भारतियन’ यानी ‘मैं एक भारतीय’ में अयोध्या उत्खनन की चर्चा की है. जनवरी, 2016 में आई इस किताब को लिखने वाले मुहम्मद का गहरा नाता 1976-77 में अयोध्या में हुए उत्खनन और अध्ययन से रहा है.

वह प्रोफेसर बीबी लाल की अगुआई वाले उस पुरातत्व दल के सदस्य थे जिसने दो महीने वहां उत्खनन किया था. इस दल को वहां पहले अस्तित्व में रहे मंदिर के अवशेष दिखे और उनसे यह स्पष्ट हुआ कि बाबरी मस्जिद का निर्माण मंदिर की अवशेष सामग्री से ही हुआ था. केके मुहम्मद ने लिखा है, ‘हमने देखा कि बाबरी मस्जिद की दीवारों पर मंदिर के स्तंभ थे. ये स्तंभ काले पत्थरों से बने थे. स्तंभों के निचले भाग पर पूर्णकलशम जैसी आकृतियां मिलीं, जो 11वीं और 12वीं सदी के मंदिरों में नजर आती थीं. वहां ऐसे एकाध नहीं, बल्कि 1992 में मस्जिद विध्वंस के पहले तक 14 स्तंभ मौजूद थे. चूंकि उस जगह पुलिस की सख्त पहरेदारी थी, लिहाजा हर किसी को जाने की आजादी नहीं थी, लेकिन शोध समूह का हिस्सा होने के नाते हमें कोई मनाही नहीं थी. यही वजह है कि हमारे लिए उन स्तंभों का सूक्ष्म अवलोकन करना संभव हुआ. केके मुहम्मद के अनुसार, ‘मस्जिद के पीछे और किनारे वाले हिस्सों में एक चबूतरा भी मिला जो काले बसाल्ट पत्थरों का बना था. इन साक्ष्यों के आधार पर दिसंबर, 1990 में उन्होंने स्पष्ट रूप से कहा कि वहां असल में एक मंदिर ही था. तब तक यह ज्वलंत मुद्दा बन गया था, फिर भी तमाम उदारवादी मुसलमानों ने बाबरी मस्जिद को हिंदुओं को सौंपने पर रजामंदी जताई, लेकिन उनमें सार्वजनिक रूप से ऐसा कहने की हिम्मत नहीं थी. मुहम्मद कहते हैं कि अगर तब बात आगे बढ़ती तो अयोध्या विवाद का पटाक्षेप हो सकता था. मुश्किल यह हुई कि इस विवाद में वामपंथी इतिहासकार कूद पड़े और उन्होंने उन मुसलमानों के पक्ष में दलीलें पेश कीं जो विवादित स्थल को हिंदुओं को सौंपने के हक में नहीं थे.

 मस्जिद के पीछे और किनारे वाले हिस्सों में एक चबूतरा भी मिला जो काले बसाल्ट पत्थरों का बना था. इन साक्ष्यों के आधार पर दिसंबर, 1990 में उन्होंने स्पष्ट रूप से कहा कि वहां असल में एक मंदिर ही था. तब तक यह ज्वलंत मुद्दा बन गया था, फिर भी तमाम उदारवादी मुसलमानों ने बाबरी मस्जिद को हिंदुओं को सौंपने पर रजामंदी जताई, लेकिन उनमें सार्वजनिक रूप से ऐसा कहने की हिम्मत नहीं थी. मुहम्मद कहते हैं कि अगर तब बात आगे बढ़ती तो अयोध्या विवाद का पटाक्षेप हो सकता था. मुश्किल यह हुई कि इस विवाद में वामपंथी इतिहासकार कूद पड़े और उन्होंने उन मुसलमानों के पक्ष में दलीलें पेश कीं जो विवादित स्थल को हिंदुओं को सौंपने के हक में नहीं थे.

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उपन्यासकार स्वर्गीय कमलेश्वर के सन् 2000 में प्रकाशित बहुचर्चित उपन्यास ‘कितने पाकिस्तान’ की चर्चा करना समीचीन होगा,  जिसमें तथ्यों के हवाला देते हुए बताया गया है कि अयोध्या में न कभी बाबरी मस्जिद नाम की मस्जिद थी और न ही राम मंदिर.

कहने का मतलब अयोध्या में जिस विवादित रामजन्मभूमि-बाबरी मस्जिद को लेकर सन् 1949 से देश में विवाद और दंगे-फ़साद हो रहे हैं, जिसके चलते लाखों हिंदू और मुसलमान आज भी एक दूसरे के दुश्मन बने हुए हैं, वहां न बाबरी मस्जिद थी और न ही राम मंदिर. क़िताब का सारांश यह है कि भारत में हिंदू और मुसलमानों में विवाद की बीज अंग्रेज़ों ने एक साज़िश के तहत बोया था, जिसकी परिणति सन् 1947 में देश के विभाजन के रूप में हुई थी.

कमलेश्वर ने इस उपन्यास पर काम रामजन्मभूमि आंदोलन शुरू होने के बाद किया था और 10-12 साल के रिसर्च, स्टडी और ऐतिहासिक तथ्यों की छनबीन के बाद ‘कितने पाकिस्तान’ को लिखा है. 

अटलबिहारी वाजपेयी के नेतृत्व वाली एनडीए सरकार के कार्यकाल में क़िताब को साहित्य अकादमी पुरस्कार दिया गया था. उस समय एचआरडी मिनिस्टर हिंदुत्व और राम मंदिर आंदोलन के पैरोकार डॉ. मुरली मनोहर जोशी थे. ज़ाहिर है अगर कमलेश्वर के निष्कर्ष से सरकार को किसी भी तरह की आपत्ति होती, तो कम से कम क़िताब को सरकारी पुरस्कार नहीं दिया जाता. अमूमन यह माना जाता है कि कोई सरकार किसी क़िताब को पुरस्कृत तब करती है जब वह सरकार क़िताब में लिखी हर बात से सहमत होती है. फिर आज इस मसले पर इतना बड़ा विवाद क्यों खड़ा कर दिया गया है यह सोचने का विषय है.

यहाँ यह कहना भी गलत नहीं होगा कि कुछ इतिहासकारों और पुरातत्वविदों की वजह से अयोध्या में इतना हंगामा बरपा. हाँ इस राजनीतिक रोटियां भी सेंकी गयी. मुसलमानों का एक वर्ग  राम मंदिर के पक्ष में तो दूसरा वर्ग विरोध में खड़ा हो गया. मेरे यहाँ के स्थानियों को इन राजनीतिक उहापोह से कोई सरोकार तो नहीं रहा लेकिन मन में एक हलकी लकीर तो खिंच ही गयी.

स्थानीय लोगों से बातचीत में यह बार-बार उभर कर सामने आया कि लोग चुनावी लाभ के लिए माहौल को बिगाड़ने का आरोप नेताओं पर लगाते हैं और उनकी निंदा करते हैं. मुस्लिम वेलफेयर सोसाइटी, अयोध्या के अध्यक्ष बाबू खान कहते हैं, मंदिर-मस्जिद विवाद से यहां का विकास रुका हुआ है. यहां कोई लड़ना नहीं चाहता, बाहरी आकर हिन्दू-मुस्लिम को लड़ाने की कोशिश करते हैं.”

मंदिर-मस्जिद विवाद से यहां का विकास रुका हुआ है. यहां कोई लड़ना नहीं चाहता, बाहरी आकर हिन्दू-मुस्लिम को लड़ाने की कोशिश करते हैं.”- मुस्लिम वेलफेयर सोसाइटी, अयोध्या के अध्यक्ष बाबू खान 

मैं अयोध्या नगरी इस बात का दावा कर सकती हूँ कि राजनीतिक पार्टियाँ जितना समय राममंदिर और बाबरी मस्जिद के मुद्दे को दे रही है उतना अगर यहाँ के विकास को देती तो आज यहाँ का माहौल कुछ और ही होता. हनुमानगढ़ी पर पूजा सामग्री की दुकान लगाने वालों में हिन्दू भी है मुस्लमान भी. और यहाँ सबके मन में एक ही बात है राम मंदिर या बाबरी मस्जिद बनने से अयोध्या में विकास नहीं होगा. यहाँ प्रसाद की दुकान रखने वाले रामचंदर का कहना है, “हर पार्टी चाहती है कि राम मंदिर का मुद्दा बस बना रहे. मंदिर कोई बनावाना ही नहीं चाहता. एक बार मसला हल हो गया तो वोट बैंक खत्म हो जाएगा,”

यहां के युवाओं का कहना है “अगर अयोध्या में बाहर के लोग न आएं तो कमाई नहीं होती. सबसे ज्यादा कमाई मेलों में होती है. नेताओं ने राम मंदिर का मुद्दा बनाकर अयोध्या का विकास नहीं किया.

अयोध्या के लोगों से आज जिसे मंदिर-मस्जिद मसला कहा जा रहा है, उस पर शायद ही कभी बात की गई. उनका कहना था कि नेताओं और बाहरी लोगों ने शहर की नकारात्मक तस्वीर पेश की है और राम के नाम व मंदिर का इस्तेमाल किया है.

मैं अयोध्या कभी खुशगवार रहने वाली आज थोड़ी सहमी हुयी ज़रूर हूँ लेकिन यह जानकर बेहद खुश हूँ कि मेरे निवासी आज भी एक दुसरे से जुड़े हैं और एक दुसरे का सहयोग कर रहे हैं. यहाँ सब हिन्दू या मुस्लमान बनकर नहीं बल्कि धर्मनिरपेक्ष होकर एक दुसरे का साथ दे रहे हैं.

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