भूमिका
धर्म को लेकर समाज में अक्सर दो तरह की धारणाएँ देखने को मिलती हैं। कुछ लोग मानते हैं कि धर्म डर पैदा करता है—ईश्वर का भय, पाप का डर और दंड की आशंका। वहीं दूसरी ओर बहुत से लोगों के लिए धर्म आशा, विश्वास और संबल का स्रोत है। ऐसे में प्रश्न उठता है— क्या धर्म वास्तव में डर सिखाता है या आशा देता है? इस प्रश्न का उत्तर धर्म की सही समझ और उसके उद्देश्य को जानने से मिलता है।
डर की धारणा कहाँ से आती है
धर्म में अनुशासन और मर्यादा पर ज़ोर दिया जाता है। जब इन बातों को केवल दंड और भय के माध्यम से समझाया जाता है, तब धर्म डर का रूप ले लेता है। बचपन में कई बार ईश्वर को दंड देने वाली शक्ति के रूप में प्रस्तुत किया जाता है—गलत किया तो सज़ा मिलेगी। इस प्रकार की शिक्षा व्यक्ति के मन में भय पैदा कर देती है। लेकिन यह धर्म का मूल स्वरूप नहीं, बल्कि उसकी अधूरी व्याख्या है।
धर्म का मूल उद्देश्य
धर्म का वास्तविक उद्देश्य मनुष्य को सही मार्ग दिखाना है, न कि उसे डराना। धर्म जीवन मूल्यों की शिक्षा देता है—सत्य, करुणा, प्रेम, क्षमा और सेवा। ये सभी गुण मन में सुरक्षा और शांति की भावना उत्पन्न करते हैं। यदि धर्म केवल डर सिखाता, तो वह मनुष्य को जोड़ने के बजाय तोड़ देता। वास्तव में धर्म मनुष्य को भीतर से मजबूत बनाता है।
आशा का स्रोत बनता धर्म
जब जीवन में अंधकार छा जाता है, तब धर्म आशा की किरण बनकर सामने आता है। दुख, असफलता, बीमारी या अकेलेपन के समय धर्म व्यक्ति को यह विश्वास दिलाता है कि हर स्थिति अस्थायी है। प्रार्थना और विश्वास के माध्यम से व्यक्ति को मानसिक सहारा मिलता है। यह आशा ही है जो व्यक्ति को कठिन परिस्थितियों में भी आगे बढ़ने की शक्ति देती है।
ईश्वर का भय या ईश्वर का प्रेम
कई धार्मिक परंपराओं में ईश्वर का भय नहीं, बल्कि ईश्वर का प्रेम सिखाया गया है। जब व्यक्ति ईश्वर को माता-पिता या मित्र के रूप में देखता है, तब डर अपने आप समाप्त हो जाता है। प्रेम आधारित धर्म व्यक्ति को स्वीकार करना सिखाता है, जबकि डर आधारित दृष्टिकोण उसे अपराधबोध में उलझा देता है। ईश्वर के प्रति प्रेम मन को हल्का और शांत बनाता है।
धर्म और मानसिक शांति
धर्म मनुष्य को यह सिखाता है कि वह केवल भौतिक शरीर नहीं, बल्कि एक चेतन आत्मा है। यह समझ जीवन के प्रति दृष्टिकोण बदल देती है। जब व्यक्ति स्वयं को किसी उच्च उद्देश्य से जुड़ा हुआ महसूस करता है, तब उसके भीतर आत्मविश्वास और आशा का जन्म होता है। यही मानसिक शांति का आधार है।
गलत व्याख्या से पैदा होता है डर
डर तब पैदा होता है, जब धर्म को सत्ता, नियंत्रण या स्वार्थ के लिए उपयोग किया जाता है। जब नियमों को बिना करुणा के थोपा जाता है, तब धर्म बोझ बन जाता है। सही धर्म वह है, जो प्रश्न पूछने की स्वतंत्रता देता है और समझ विकसित करता है। जहाँ समझ होती है, वहाँ डर नहीं रहता।
आधुनिक समय में धर्म की भूमिका
आज के समय में धर्म को नए दृष्टिकोण से समझने की आवश्यकता है। धर्म को डर से नहीं, बल्कि जागरूकता से जोड़ना होगा। जब धर्म जीवन जीने की कला बनता है, तब वह आशा, धैर्य और सकारात्मकता का स्रोत बन जाता है। यही धर्म समाज को जोड़ने और व्यक्ति को भीतर से शांत करने का कार्य करता है।
निष्कर्ष
धर्म का उद्देश्य डर पैदा करना नहीं, बल्कि आशा देना है। डर मनुष्य को बाँधता है, जबकि आशा उसे आगे बढ़ने की प्रेरणा देती है। जब धर्म को सही अर्थों में समझा जाता है, तब वह जीवन में विश्वास, प्रेम और मानसिक शांति लाता है। इसलिए यह कहना गलत नहीं होगा कि धर्म डर नहीं सिखाता, बल्कि आशा और प्रकाश का मार्ग दिखाता है।
~ रिलीजन वर्ल्ड ब्यूरो









