भूमिका
धर्म मानव जीवन को नैतिक दिशा देने का माध्यम है, लेकिन इतिहास और वर्तमान दोनों में हम देखते हैं कि धर्म के नाम पर मतभेद, संघर्ष और टकराव भी हुए हैं। यह प्रश्न स्वाभाविक है कि जब सभी धर्म शांति, प्रेम और मानवता की बात करते हैं, तो धार्मिक मतभेद कैसे पैदा होते हैं? वास्तव में धार्मिक मतभेद धर्म से अधिक मानव सोच, सामाजिक परिस्थितियों और स्वार्थ से उत्पन्न होते हैं।
अलग-अलग व्याख्याएँ और मत
धार्मिक ग्रंथों की व्याख्या हर व्यक्ति, संप्रदाय या समूह अपने दृष्टिकोण से करता है। जब एक ही शास्त्र या धार्मिक शिक्षाओं को अलग-अलग ढंग से समझा जाता है, तब मतभेद जन्म लेते हैं। कई बार ये व्याख्याएँ समय, स्थान और परिस्थिति के अनुसार बदल जाती हैं, जिससे विचारों में टकराव होना स्वाभाविक है।
कट्टरता और असहिष्णुता
धार्मिक मतभेदों का एक बड़ा कारण कट्टरता है। जब कोई व्यक्ति या समूह यह मान लेता है कि केवल उसका धर्म या मत ही सत्य है और बाकी सभी गलत हैं, तो असहिष्णुता पैदा होती है। यह सोच संवाद के द्वार बंद कर देती है और मतभेद संघर्ष में बदल जाते हैं।
राजनीति और सत्ता का प्रभाव
इतिहास गवाह है कि धर्म का उपयोग कई बार राजनीति और सत्ता प्राप्ति के लिए किया गया है। राजनीतिक लाभ के लिए धार्मिक भावनाओं को भड़काया जाता है, जिससे समाज में विभाजन गहरा होता है। ऐसे मतभेद वास्तविक धार्मिक नहीं, बल्कि स्वार्थपूर्ण होते हैं, परंतु उनका असर पूरे समाज पर पड़ता है।
अज्ञानता और शिक्षा की कमी
धर्म के बारे में अधूरी या गलत जानकारी भी मतभेदों को जन्म देती है। जब लोग अपने धर्म की मूल शिक्षाओं को नहीं समझते और दूसरों के धर्म के बारे में जानने की कोशिश नहीं करते, तब भ्रांतियाँ फैलती हैं। धार्मिक शिक्षा का अभाव लोगों को अफवाहों और नकारात्मक प्रचार का शिकार बना देता है।
सांस्कृतिक और सामाजिक भिन्नताएँ
धर्म केवल आस्था नहीं, बल्कि संस्कृति और परंपराओं से भी जुड़ा होता है। अलग-अलग क्षेत्रों में एक ही धर्म की प्रथाएँ अलग हो सकती हैं। जब इन भिन्नताओं को स्वीकार करने के बजाय उन पर श्रेष्ठता का भाव थोपा जाता है, तब धार्मिक मतभेद गहराते हैं।
इतिहास की घटनाएँ और स्मृतियाँ
पुराने संघर्ष, युद्ध और अत्याचारों की स्मृतियाँ पीढ़ियों तक बनी रहती हैं। ये ऐतिहासिक अनुभव सामूहिक मानसिकता को प्रभावित करते हैं और नए मतभेदों को जन्म देते हैं। जब अतीत के घावों को भुलाने के बजाय उन्हें बार-बार उभारा जाता है, तब धार्मिक तनाव बना रहता है।
मीडिया और सोशल मीडिया की भूमिका
आज के डिजिटल युग में मीडिया और सोशल मीडिया धार्मिक मतभेदों को बढ़ाने या घटाने—दोनों में भूमिका निभाते हैं। भ्रामक खबरें, अधूरी जानकारी और उत्तेजक सामग्री लोगों की भावनाओं को भड़का सकती हैं, जिससे छोटे मतभेद बड़े विवाद बन जाते हैं।
धार्मिक मतभेदों का समाधान
धार्मिक मतभेदों को कम करने के लिए संवाद, शिक्षा और सहिष्णुता आवश्यक है। जब लोग अपने धर्म के साथ-साथ दूसरों के धर्म को भी समझने का प्रयास करते हैं, तब मतभेद स्वतः कम होने लगते हैं। सभी धर्मों का मूल संदेश मानवता और शांति है—इसे समझना और अपनाना ही समाधान है।
निष्कर्ष
धार्मिक मतभेद धर्म से नहीं, बल्कि मानव सोच, अज्ञानता, स्वार्थ और असहिष्णुता से पैदा होते हैं। यदि धर्म को उसके मूल स्वरूप—प्रेम, करुणा और नैतिकता—के रूप में समझा जाए, तो मतभेद संघर्ष नहीं, बल्कि संवाद का अवसर बन सकते हैं। एक सहिष्णु और जागरूक समाज ही धार्मिक मतभेदों को समाप्त कर सकता है।
~ रिलीजन वर्ल्ड ब्यूरो









