क्या धार्मिक पहचान समाज को बांटती है?

क्या धार्मिक पहचान समाज को बांटती है?

मानवाधिकार के संदर्भ में एक विश्लेषण

धार्मिक पहचान मानव समाज का एक महत्वपूर्ण हिस्सा रही है। धर्म न केवल व्यक्ति की आस्था और नैतिक मूल्यों को दिशा देता है, बल्कि उसकी सांस्कृतिक और सामाजिक पहचान भी निर्मित करता है। लेकिन आधुनिक समाज में यह प्रश्न बार-बार उठता है कि क्या धार्मिक पहचान समाज को जोड़ती है या उसे बांटने का कार्य करती है? यह सवाल विशेष रूप से तब महत्वपूर्ण हो जाता है जब हम इसे मानवाधिकारों के दृष्टिकोण से देखते हैं।

धार्मिक पहचान का सामाजिक महत्व

धर्म व्यक्ति को जीवन का उद्देश्य, नैतिक दिशा और सामुदायिक भावना प्रदान करता है। इतिहास गवाह है कि धार्मिक संस्थाओं ने शिक्षा, सेवा, करुणा और सामाजिक न्याय को बढ़ावा दिया है। कई समाजों में धर्म ने लोगों को एकजुट कर सामाजिक सहयोग और भाईचारे की भावना को मजबूत किया है। इस दृष्टि से देखा जाए तो धार्मिक पहचान समाज को जोड़ने की शक्ति रखती है।

जब धार्मिक पहचान विभाजन का कारण बनती है

समस्या तब उत्पन्न होती है जब धार्मिक पहचान को श्रेष्ठता, राजनीति या सत्ता के साधन के रूप में प्रयोग किया जाता है। जब एक धर्म को दूसरे से ऊपर रखने की मानसिकता जन्म लेती है, तब भेदभाव, असहिष्णुता और हिंसा का रास्ता खुलता है। इतिहास में अनेक दंगे, युद्ध और नरसंहार धार्मिक पहचान के नाम पर हुए हैं, जिनमें निर्दोष लोगों के मानवाधिकारों का गंभीर उल्लंघन हुआ।

मानवाधिकार और धार्मिक स्वतंत्रता

संयुक्त राष्ट्र की मानवाधिकारों की सार्वभौमिक घोषणा (UDHR) के अनुसार, प्रत्येक व्यक्ति को धर्म की स्वतंत्रता का अधिकार है। इसका अर्थ है कि हर व्यक्ति को अपना धर्म मानने, न मानने या बदलने की आज़ादी है। लेकिन जब किसी समाज में धार्मिक पहचान के आधार पर भेदभाव होता है, तब यह अधिकार केवल कागज़ों तक सीमित रह जाता है। धार्मिक अल्पसंख्यकों के अधिकार, समान अवसर और सुरक्षा अक्सर खतरे में पड़ जाते हैं।

राजनीति और धार्मिक पहचान

धार्मिक पहचान का सबसे खतरनाक रूप तब सामने आता है जब उसे राजनीतिक लाभ के लिए इस्तेमाल किया जाता है। वोट बैंक की राजनीति, नफरत फैलाने वाले भाषण और “हम बनाम वे” की सोच समाज को गहराई से बांट देती है। इसका सीधा असर लोकतंत्र और मानवाधिकारों पर पड़ता है। अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता, समानता और गरिमा जैसे मूल अधिकार कमजोर होने लगते हैं।

मीडिया और सामाजिक नेटवर्क की भूमिका

आज के डिजिटल युग में मीडिया और सोशल मीडिया धार्मिक पहचान को या तो जोड़ने का माध्यम बन सकते हैं या फिर विभाजन का हथियार। झूठी खबरें, अफवाहें और नफरत भरे संदेश समाज में तनाव बढ़ाते हैं। मानवाधिकारों की रक्षा के लिए जिम्मेदार पत्रकारिता और डिजिटल साक्षरता अत्यंत आवश्यक है।

समाधान: समावेशी दृष्टिकोण की आवश्यकता

धार्मिक पहचान अपने आप में समस्या नहीं है, समस्या है असहिष्णुता और दूसरों को नकारने की सोच। समाधान शिक्षा, संवाद और संवैधानिक मूल्यों में निहित है। जब समाज धर्म को व्यक्तिगत आस्था के रूप में स्वीकार करता है और मानवाधिकारों को सर्वोपरि मानता है, तब विविधता शक्ति बन जाती है, कमजोरी नहीं।

निष्कर्ष

अंततः यह कहा जा सकता है कि धार्मिक पहचान समाज को बांटती नहीं है, बल्कि उसे बांटने का काम मानव द्वारा किया जाता है। यदि मानवाधिकारों, समानता और सह-अस्तित्व के सिद्धांतों को ईमानदारी से अपनाया जाए, तो धार्मिक विविधता समाज को और अधिक समृद्ध बना सकती है। एक न्यायपूर्ण और शांतिपूर्ण समाज के लिए आवश्यक है कि हम धर्म से पहले मानव को महत्व दें।

~ रिलीजन वर्ल्ड ब्यूरो

Post By Religion World