जब भी जीवन में कोई असामान्य, अविश्वसनीय या तर्क से परे लगने वाली घटना घटती है, तो सबसे पहले हमारे मन में जो शब्द आता है, वह है—चमत्कार। कोई गंभीर बीमारी से अचानक ठीक हो जाए, कोई दुर्घटना में बाल-बाल बच जाए, या किसी साधु-संत से जुड़ी अलौकिक घटना सामने आए—लोग तुरंत उसे चमत्कार मान लेते हैं। लेकिन असली प्रश्न यही है कि क्या चमत्कार सच में होते हैं, या यह केवल हमारी आस्था और भावनाओं की उपज है?
धार्मिक दृष्टि से देखें तो लगभग हर धर्म में चमत्कारों का उल्लेख मिलता है। ईसा मसीह द्वारा बीमारों को ठीक करना, सूफी संतों की करामातें, हिंदू धर्म में देवी-देवताओं की लीलाएँ—इन सभी कथाओं ने सदियों से लोगों की आस्था को मज़बूत किया है। भक्त मानते हैं कि ईश्वर सर्वशक्तिमान है और उसकी कृपा से असंभव भी संभव हो सकता है। जब तर्क और साधन दोनों विफल हो जाते हैं, तब आस्था चमत्कार का सहारा बन जाती है।
वहीं दूसरी ओर, वैज्ञानिक दृष्टिकोण चमत्कार को अलग नज़र से देखता है। विज्ञान के अनुसार, इस संसार में होने वाली हर घटना का कोई न कोई कारण अवश्य होता है। जो घटना हमें चमत्कार प्रतीत होती है, वह अक्सर हमारी सीमित जानकारी या समझ का परिणाम होती है। कई तथाकथित चमत्कारों को बाद में चिकित्सा विज्ञान, मनोविज्ञान, प्लेसीबो इफेक्ट या प्राकृतिक नियमों के माध्यम से समझाया जा चुका है।
लेकिन क्या इसका अर्थ यह है कि हर चमत्कार केवल भ्रम है? इसका उत्तर इतना सरल नहीं है। स्वयं विज्ञान यह स्वीकार करता है कि आज भी बहुत कुछ ऐसा है, जिसे हम पूरी तरह समझ नहीं पाए हैं। इतिहास गवाह है कि जिन घटनाओं को कभी चमत्कार माना गया, वही आगे चलकर वैज्ञानिक खोज का आधार बनीं। बिजली, चुंबकत्व और रोगों के इलाज—ये सब कभी चमत्कार ही समझे जाते थे।
चमत्कारों में विश्वास रखने का सबसे बड़ा कारण है—आशा। जब इंसान हर रास्ते से निराश हो जाता है, जब डॉक्टर जवाब दे देते हैं और परिस्थितियाँ विपरीत हो जाती हैं, तब चमत्कार की उम्मीद ही उसे टूटने से बचाती है। कई बार यह विश्वास व्यक्ति को मानसिक रूप से इतना मजबूत बना देता है कि वह स्वयं ही कठिन परिस्थितियों से बाहर निकलने लगता है।
मनोविज्ञान भी मानता है कि सकारात्मक विश्वास शरीर और मन पर गहरा प्रभाव डालता है। यदि कोई व्यक्ति यह मान ले कि वह ठीक हो सकता है, तो उसकी उपचार प्रक्रिया तेज़ हो जाती है। ऐसे में सवाल उठता है—क्या यह चमत्कार है या मानव मन की शक्ति? शायद दोनों का मेल।
हालाँकि समस्या तब उत्पन्न होती है, जब चमत्कार के नाम पर अंधविश्वास और शोषण होने लगता है। झूठे बाबाओं द्वारा लोगों को गुमराह करना, बीमारी के इलाज के नाम पर चमत्कार का दावा करना, डर और लालच के माध्यम से आस्था का व्यापार करना—ये सभी आस्था के नाम पर किए गए अपराध हैं। ऐसे चमत्कार न केवल लोगों को धोखा देते हैं, बल्कि समाज को भी नुकसान पहुँचाते हैं।
इसलिए एक संतुलित दृष्टिकोण आवश्यक है। चमत्कारों को न तो आँख बंद करके स्वीकार करना चाहिए और न ही पूरी तरह खारिज करना चाहिए। जहाँ आस्था हो, वहाँ विवेक भी होना चाहिए। यदि कोई घटना हमें चमत्कार जैसी लगे, तो उसे समझने, परखने और उसके पीछे के कारण जानने की कोशिश करनी चाहिए।
धर्म और विज्ञान को विरोधी मानना भी उचित नहीं है। धर्म आस्था की बात करता है, जबकि विज्ञान खोज की। दोनों का उद्देश्य अंततः सत्य तक पहुँचना ही है। जब आस्था तर्क के साथ और तर्क संवेदना के साथ चलता है, तब ही हम सही निष्कर्ष पर पहुँच सकते हैं।
निष्कर्षतः, चमत्कार शायद प्रकृति, ईश्वर और मानव मन की उन संभावनाओं का नाम है, जिन्हें हम अभी पूरी तरह समझ नहीं पाए हैं। चमत्कार होते हैं या नहीं—इससे ज़्यादा महत्वपूर्ण यह है कि हम विश्वास और विवेक के बीच संतुलन बनाए रखें। क्योंकि अंधविश्वास नुकसान पहुँचा सकता है, लेकिन आशा के बिना जीवन भी अधूरा है।
~ रिलीजन वर्ल्ड ब्यूरो









