जानिये रहस्य आध्यात्म और रचनात्मकता का : Secret of Spirituality & Creativity
अक्सर लोगों के दिमाग में एक बहस चलती रहती है कि जो व्यक्ति रचनात्मकता से लबरेज़ है उसमें आध्यात्मिकता का कोई गुण नहीं होगा, या जो व्यक्ति आध्यात्मिक है वो रचनात्मक नहीं हो सकता (Spirituality & Creativity)। लेकिन हम आपको बता दें यह आपका भ्रम है क्यूंकि आध्यात्मिकता और रचनात्मकता एक दुसरे के बिना अधूरे हैं या हम कह सकते हैं कि दोनों एक दुसरे को साथ लेकर चलते हैं।
आध्यात्मिकता और रचनात्मकता एक दुसरे के बिना अधूरे हैं
व्यक्ति के भीतर रचनात्मकता दिमाग से नहीं, दिल से आती है ठीक उसी तरह जैसे आध्यात्म से जुड़ने के लिए दिमाग नहीं मन की आवश्यकता होती है, तो आइए जानते हैं कि कैसे रचनात्मकता और अध्यात्म एक दूसरे के बिना अधूरे हैं…
“रचनात्मकता की जड़ हमारे दिमाग में नहीं बल्कि हमारे हृदय में होती है”
हमरी सोच रचनात्मक कैसे होती है ?
सबसे पहले जानते हैं कि हमारी सोच रचनात्मक कैसे होती है। हमारी हर सोच और हर विचार के दो पहलू होते हैं। एक जो हमेशा से ही रचनात्मक होता है, और दूसरा वो जो हमेशा तर्क और नियम पर निर्भर करता है। जैसा कि मैंने पहले बताया कि रचनात्मकता की जड़ हमारे दिमाग में नहीं बल्कि हमारे हृदय में होती है, हमारी आत्मा में होती है, और इस रचनात्मकता को जो प्रोत्साहन मिलता है वो हमारी आत्मा में बसे आध्यात्म से मिलता है। हमारी आंतरिक शक्ति को हमारा आध्यात्म जागृत करता है, इसलिए विचारों में रचनात्मकता उत्पन्न होती है।
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रचनात्मकता असीमित होती है…
अक्सर लोग असमंजस में पड़ जाते है कि रचनात्मकता की परिभाषा क्या है। कई लोग कला यानि आर्ट और रचनात्मकता यानि क्रिएटिविटी को लेकर भ्रमित रहते हैं। देखिये यदि कोई अच्छा चित्रकार है या कोई बहुत अच्छा गायक है या कोई नृत्यांगना है यह उसकी कला है और यदि वो उसे कुछ अलग ढंग से पेश करता है तो यह उसकी कला में उसके द्वारा की गयी रचनात्मकता है।
“अपने क्षेत्र में महारत हासिल किये हुये इंजीनियर हो या डॉक्टर सब रचनात्मक है”
लेकिन मेरी नज़र में रचनात्मकता सिर्फ यहीं तक सीमित नहीं हैं। अपने क्षेत्र में महारत हासिल किये हुये इंजीनियर हो या डॉक्टर सब रचनात्मक है। क्यूंकि अगर वो रचनात्मक नहीं होते तो हम नई तकनीकों से हमें कैसे रूबरू कराते। आज के युग का सबसे बड़ा उद्धरण है स्मार्ट फ़ोन। सोचिये लैंडलाइन के ज़रिये बात करने वाले हम स्मार्ट फ़ोन से फेस तो फेस बात कर सकते हैं. मीलों की दूरी दूरी नहीं लगती, यह सब रचनात्मकता ही है. इस लिहाज से स्टीव जाब्स से लेकर बिल गेट्स सभी रचनात्मक लोग थे। इसलिए रचनात्मकता किसी भी रुप में हो सकती है और ये कला से सदैव भिन्न होती है।
“आप जब पढ़ेंगे की आपने क्या लिखा है तो आप अपने अंदर की रचनात्मकता को निखरता पाएंगे “
कैसे खोजे आध्यात्म से रचनात्मकता का रास्ता
अगर आपको पढने का का शौक है तो आप उन किताबों या कविताओं पर अपनी अभिव्यक्ति शुरू कर दें वो भी लिख कर। यह आवश्यक नहीं की आप आध्यात्म या धर्म से संबंधित किताब ही पढ़ें, लेकिन जो भी पढ़ें उसे दिल से समझें और जो भी मन में आए उसे रोज सुबह शब्दों का आकार दें। आप जब पढ़ेंगे की आपने क्या लिखा है तो आप अपने अंदर की रचनात्मकता को निखरता पाएंगे। अध्यात्म से आपके विचार खुद ही रचनात्मक हो जाते हैं।
इसी के साथ ही अपनी रचनात्मकता को अध्यात्म से जोड़ने के लिए स्वयं प्रयास करें. अपनी प्रार्थना खुद लिखें, अपने प्रभु के प्रति सम्मानजनक शब्दों का निर्माण खुद करें और अपनी इस रचनात्मकता को दुनिया के साथ साझा करें।
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श्वेता सिंह
religionworldin@gmail.com
Editorial Review Note
Written by Religion World — Bhavya Srivastava is the founder of Religion World and a veteran journalist with over 18 years of experience across broadcast, print, and digital media. A founding member of the International Association of Religion Journalists (IARJ), he has spent much of his career reporting on and producing content about religion, faith, and spirituality. View full profile →.
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