कारागार में योग और रामकथा – कैदियों में दिख रहा है बदलाव
दुनिया भर में कैदियों को सजा काटने के बाद समाज की मुख्य धारा में लाने के लिए तमाम सुधारात्मक कदम उठाए जाते हैं। भारत में सजा कम करने का प्रलोभन देकर कैदियों के सुधार में कई सामाजिक बदलाव करने का प्रयास किया गया है, जिससे कैदियों को सामाजिक जीवन में पुनः जुड़ने का मौका मिल सके। ऐसे में धर्म और आध्यात्म की भूमिका को भी अब गौर से देखा जाने लगा है। आपने भी गौर किया होगा कि जेलों में योग, प्रवचन और कथाओं की बातें अब सामने आने लगी हैं।
विचाराधीन कैदियों के मौलिक आधार
अगर भारतीय संविधान द्वारा दिए गए मौलिक अधिकारों की बात करें, तो विचाराधीन कैदियों को उनके दोषी सिद्ध होने से पहले तक निर्दोष माना जाता है। लेकिन जेल में बंद किए जाने के दौरान उन्हें अक्सर मानसिक और शारीरिक प्रताड़नाएं दी जाती हैं और लगभग अमानवीय-सी जीवन स्थितियों और जेल में होनेवाली हिंसा का सामना करना पड़ता है।
इनमें से कई अपने पारिवारिक, आस-पड़ोस और समुदाय के रिश्तों के साथ-साथ प्रायः अपनी आजीविका भी गंवा देते हैं। इससे भी ज़्यादा बड़ी बात ये है कि जेल में बिताया गया समय उनके माथे पर एक व्यक्तिगत इकाई के तौर पर ही नहीं, समुदाय के सदस्य के तौर पर भी सामाजिक कलंक लगा देता है. यहां तक कि उनके परिवार, सगे-संबंधियों और समुदाय को भी उनकी बिना किसी ग़लती के शर्मिंदगी और अपमान झेलना पड़ता है.
विचाराधीन कैदियों की क़ानूनी प्रतिनिधियों तक पहुंच काफी कम होती है. कई विचाराधीन कैदी काफी गरीब हैं, जो मामूली अपराधों के आरोपी हैं. अपने अधिकारों की जानकारी न होने और क़ानूनी सहायता तक पहुंच नहीं होने के कारण उन्हें लंबे समय तक जेलों में बंद रहना पड़ रहा है.
वित्तीय संसाधनों और मजबूत सपोर्ट सिस्टम के अभाव और जेल परिसर में वकीलों से संवाद करने की ज़्यादा क्षमता न होने के कारण क़ानून की अदालत में अपना बचाव करने की उनकी शक्ति कम हो जाती है. यह स्थिति सुप्रीम कोर्ट के उस ऐतिहासिक फैसले के बावजूद है, जिसमें सुप्रीम कोर्ट ने यह तजवीज दी थी कि संविधान का अनुच्छेद 21 बंदियों को प्राण एवं दैहिक स्वतंत्रता के मौलिक अधिकार के तहत निष्पक्ष और त्वरित सुनवाई का अधिकार देता है.
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जेलों में योग और कथावाचन जैसे कार्यक्रमों से बदलाव का प्रयास
समय और समाज की बदलती लय को देखते हुए इस पहल की कानून के लिहाज से समीक्षा का लब्बोलुआव इसके सकारात्मक और नकारात्मक पहलुओं को उजागर करती है। एक तरफ दंड के सुधारात्मक पहलू को देखते हुए इस पहल की बेहतरी से इंकार नहीं किया जा सकता है वहीं भारतीय व्यवस्था में व्याप्त भ्रष्टाचार इसकी कामयाबी पर संदेह पैदा करने पर मजबूर भी करती है।
क्या है योग और रामकथा जैसे कार्यक्रमों का मकसद
योग के लगातार बढते विश्वव्यापी महत्व को देखते हुए महाराष्ट्र की जेलों में कैदियों को सजा कम कराने का विकल्प मुहैया कराने के लिए यह पहल शुरू की गई है। इसके लिए राज्य के जेल महकमे ने इस योजना को लागू करने के निर्देश जारी कर दिए हैं। इसके तहत कैदी योग सीखकर लिखित और शारीरिक परीक्षा पास कर लेते हैं तो उनकी तीन महीने तक की सजा माफ कर दी जाएगी। इसका मकसद कैदियों के उग्र व्यवहार को संतुलित एवं संयमित कर उन्हें जेल से रिहा होने से पहले समाज की मुख्य धारा में शामिल होने लायक बनाना है।
राज्य की प्रमुख जेल यरवदा सहित अन्य जेलों में इस बाबत लिखित परीक्षा शुरू कर दी गयी थी। इस योजना का मकसद कैदियों को मानसिक तनाव से मुक्ति दिलाने के लिए सजा कम कराने के नाम पर योग से जोड़ना है।
दरअसल कैदियों के स्वभाव में बदलाव के लिए जेलों में चलाए जा रहे मनोवैज्ञानिक कार्यक्रमों में योग की पहले से ही अहम भूमिका रही है. साथ ही जेलों में कैदियों को कम से कम समय तक रखने के सुप्रीम कोर्ट के तमाम फैसलों के मद्देनजर योग में पारंगत होना कैदियों की सजा कम करने का बेहतर आधार हो सकता है. दंड प्रक्रिया संहिता और जेल मेन्युअल के तमाम नियम राज्य सरकारों को ऐसे फैसले करने की छूट देते हैं.
नई दिल्ली में देश की सबसे प्रमुख तिहाड़ जेल में कैदी कल्याण के लिए सक्रिय सामाजिक संगठन ”प्रयास” की शोध रिपोर्ट के मुताबिक योग कक्षाओं में नियमित तौर पर भाग लेने वाले कैदियों के व्यवहार में सामान्य कैदियों की तुलना में खासा बदलाव आया है. साथ ही मानसिक स्थिरता के इस दौर में कैदियों ने अपनी नैसर्गिक प्रतिभा निखारने में भी कामयाबी हासिल की है. इसमें संगीत, कला और खेल के क्षेत्र में कैदियों ने अपनी प्रतिभा को न सिर्फ पहचाना बल्कि निखारा भी।
तिहाड़ जेल में कैदियों को योग सिखा रहे योगी आशुतोष जी से रिलीजन वर्ल्ड ने बात की. योगी आशुतोष जी के अनुसार योग के माध्यम से कैदियों की सोच और विचारधारा में परिवर्तन लाने का प्रयास किया जाता है. योग और ध्यान के माध्यम से उन्हें मानसिक तौर पर तैयार किया जाता है जिससे वेह पुनः किसी आपराधिक कार्यों में लिप्त न हों.
अयोध्या में राम कथा का वाचन करने वाली राज राजेश्वरी देवी जी ने भी कैदियों के स्वाभाव में बदलाव का एक प्रयास किया। राज राजेश्वरी देवी जहाँ पहले अयोध्या में ही कथा वाचन करती थीं वहीँ अब उन्होंने अबतक सात- आठ जेलों में जाकर रामकथा का वाचन किया। जिसका उन्हें सकारात्मक परिणाम देखने को मिला। राजेश्वरी जी ने जब रिलीजन वर्ल्ड से बात की तो उन्होंने बताया कि वे अब तक अयोध्या, नैनी जेल(प्रयागराज), प्रतापगढ़, गोंडा, बलरामपुर, अलीगढ की जेलों में रामकथा करी है और वहां इस दौरान कभी भी ऐसा महसूस नहीं हुआ कि वो जेल में कथा कर रहे हैं वहां सभी में भक्तिभाव महसूस किया।
राज राजेश्वरी जी बताती हैं कि जब भी वो कथा करती हैं तो वहां के कैदी चाहे वो हिन्दू हों या मुस्लिम या फिर किसी अन्य धर्म के वे सभी भक्तिभाव से अपने कार्य जैसे भंडारा कराना, प्रसाद बाँटना या उसे बनाना करते हैं. यहाँ तक कि वो संकल्प भी लेते हैं कि सजा समाप्त होने के बाद वे नए सिरे से जीवन जीने का प्रयास करेंगे और किसी भी गलत कार्य में शामिल नहीं होने। राजेश्वरी जी कहती हैं कि हमें ऐसा महसूस होता है कि यदि रामकथा के माध्यम से उनकी मानसिक सोच बदलती है तो समाज को भी उन्हें स्वीकारने में पहल करनी चाहिए.
योग ने भी इसमें बहुत ज्यादा सहयोग दिया है. साल 2017 मध्यप्रदेश की राजधानी भोपाल सेंट्रल जेल में 60 ऐसे कैदियों को योग टीचर बनाया गया, जिनका छह महीने की ट्रेनिंग में अच्छा प्रदर्शन रहा था. छह महीने की ट्रेनिंग में सिलेक्ट होने के बाद आठ दिन की स्पेशल योग ट्रेनिंग लेकर कैदियों को योग टीचर की उपाधि दी गई. इन योग टीचरों में सबसे ज्यादा हत्या के मामले में उम्रकैद की सजा काट रहे कैदी शामिल थे.
भारत-तिब्बत सीमा पुलिस के डीआईजी राजकिशोर, स्वास्थ्य विभाग के अफसर डॉक्टर लोकेंद्र सिंह, इंटरनेशनल योग टीचर तारिक खान समेत उनकी टीम ने कैदियों को योग की शिक्षा दी. छह महीने तक चली ट्रेनिंग में 1200 कैदियों ने हिस्सा लिया था, लेकिन इन कैदियों में से केवल 60 कैदियों को सिलेक्ट किया गया. इन्हीं सिलेक्ट कैदियों को आठ दिन की स्पेशल ट्रेनिंग देकर योग टीचर बनाया गया. कैदियों की परीक्षा भी ली गई. सामाजिक संस्थान की परीक्षा में पास होने के बाद ही 60 कैदियों को योग टीचर का प्रमाण पत्र दिया गया.
योगी आशुतोष जी बताते हैं कैदियों को समाज में एक स्थान दिलाना उन्हें मुख्यधारा में लाना बहुत ही आवश्यक है. इसके लिए हम उन्हें जेल में ही योग प्रशिक्षण देते हैं. इस समय तिहाड़ की 16 जेल और हरियाणा की 19 जेल से योग शिक्षक प्रशिक्षित करके तैयार किये गए हैं. पिछले साल तिहाड़ से 1000 योग शिक्षक प्रसिक्षित हुए और इस साल भी इतनी ही संख्या के योग शिक्षकों को तैयार करना है हरियाणा जेल में पिछले साल 60 योग शिक्षक तैयार हुए और इस वर्ष 600 योग शिक्षक तैयार करने का लक्ष्य है . हमारा लक्ष्य इन जेल में प्रशिक्षित हुए योग शिक्षकों को रोज़गार दिलाना और समाज में उन्हें स्थापित करना है.
सेंट्रल जेल के 60 कैदी बने योग टीचर अब दूसरे कैदियों को ट्रेनिंग दे रहे हैं. ट्रेनिंग की शुरूआत योग शिक्षकों ने अपनी ही सेंट्रल जेल से शुरू की. सेंट्रल जेल के बाद जेल मुख्यालय से अनुमति मिलने के बाद ये कैदी दूसरी जेलों में भी योग की ट्रेनिंग देंगे. मध्यप्रदेश की जेलों के इतिहास में ये पहला मौका था, जब इतनी बड़ी संख्या में कैदियों को योग टीचर बनने का मौका दिया गया.
कैदियों को आठ दिन की स्पेशल ट्रेनिंग देकर योग टीचर बनाया गया. कैदियों की परीक्षा भी ली गई. सामाजिक संस्थान की परीक्षा में पास होने के बाद ही 60 कैदियों को योग टीचर का प्रमाण पत्र दिया गया.
सेंट्रल जेल के 60 कैदी बने योग टीचर अब दूसरे कैदियों को ट्रेनिंग दे रहे हैं. ट्रेनिंग की शुरूआत योग शिक्षकों ने अपनी ही सेंट्रल जेल से शुरू की. सेंट्रल जेल के बाद जेल मुख्यालय से अनुमति मिलने के बाद ये कैदी दूसरी जेलों में भी योग की ट्रेनिंग देंगे. मध्यप्रदेश की जेलों के इतिहास में ये पहला मौका था, जब इतनी बड़ी संख्या में कैदियों को योग टीचर बनने का मौका दिया गया.
जेल महकमों को योग एवं आध्यात्मिक कार्यक्रमों के महत्व पर इतना भरोसा है तो फिर इस पहल को सघन व्यापक अभियान की तरह शुरू कर देना चाहिए जिससे इन कैदियों की नैसर्गिक प्रतिभा अपराध की तरफ मुडने के बजाय सही दिशा में ले जाई जा सके. इस तरह के प्रयासों से अपराध की रोकथाम भी हो सकेगी और सामाजिक विसंगतियों के कारण अपराधी बनने की दिशा और दशा में बदलाव आ सकेगा।
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भारत में कितनी जेलें
जेलों का प्रबंधन और प्रशासन विशेष रूप से राज्य सरकारों के अधिकार क्षेत्र में आता है, और यह जेल अधिनियम,1894 और संबंधित राज्य सरकारों के जेल नियमावली द्वारा शासित है. इस प्रकार, मौजूदा जेल कानूनों, नियमों और विनियमों को बदलने के लिए राज्यों की प्राथमिक भूमिका, जिम्मेदारी और अधिकार है.
भारत में जेलों के प्रकार
भारत में जेलों के 8 प्रकार है; केंद्रीय जेल, जिला जेल, उप जेल, महिला जेल, खुली जेल, बोर्स्टल-शाला, विशेष जेल और अन्य जेल. दो साल से अधिक सज़ा मिलने पर गुनहगार को केंद्रीय जेल में रखा जाता है. जिन गुनहगारों का बर्ताव अच्छा रहा हो उन्हे खुली जेल में रखा जाता है जहां वे खेती इत्यादि कार्य कर सकते हैं.
नेशनल क्राइम रिकॉर्ड ब्यूरो (एनसीआरबी) के प्रिजन स्टैटिस्टिक्स इंडिया, 2015 रिपोर्ट के मुताबिक, भारत की कई जेलें, कैदियों की संख्या के लिहाज से छोटी पड़ रही हैं. भारतीय जेलों में क्षमता से 14 फीसदी ज़्यादा कैदी रह रहे हैं. इस मामले में छत्तीसगढ़ और दिल्ली देश में सबसे आगे हैं, जहां की जेलों में क्षमता से दोगेुने से ज़्यादा कैदी हैं.
मेघालय की जेलों में क्षमता से 77.9 फ़ीसदी ज़्यादा, उत्तर प्रदेश में 68.8 फ़ीसदी और मध्य प्रदेश में 39.8 फ़ीसदी ज़्यादा कैदी हैं. शुद्ध संख्या के हिसाब से उत्तर प्रदेश में विचाराधीन कैदियों की संख्या सबसे ज़्यादा (62,669) थी. इसके बाद बिहार (23,424) और महाराष्ट्र (21,667) का स्थान था. बिहार में कुल कैदियों के 82 फीसदी विचाराधीन कैदी थे, जो सभी राज्यों में सबसे ज़्यादा था.
भारतीय जेलों में बंद 67 फीसदी लोग विचाराधीन कैदी हैं. यानी वैसे कैदी, जिन्हें मुकदमे, जांच या पूछताछ के दौरान हवालात में बंद रखा गया है, न कि कोर्ट द्वारा किसी मुकदमे में दोषी क़रार दिए जाने की वजह से.
अंतरराष्ट्रीय मानकों के हिसाब से भारत की जेलों में ट्रायल या सज़ा का इंतजार कर रहे लोगों का फ़ीसदी काफी ज़्यादा है. उदाहरण के लिए इंग्लैंड में यह 11फ़ीसदी है, अमेरिका में 20 फ़ीसदी और फ्रांस में 29 फ़ीसदी है.
2014 में देश के 36 राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों में से शुद्ध आंकड़ों के लिहाज से उत्तर प्रदेश सबसे ऊपर है जहां विचाराधीन कैदियों की संख्या सबसे ज़्यादा (18,214) थी.
Editorial Review Note
Written by Religion World — Bhavya Srivastava is the founder of Religion World and a veteran journalist with over 18 years of experience across broadcast, print, and digital media. A founding member of the International Association of Religion Journalists (IARJ), he has spent much of his career reporting on and producing content about religion, faith, and spirituality. View full profile →.
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