यज्ञमय जीवन ही मनुष्य जीवन की सार्थकता : डॉ. प्रणव पण्ड्या

 In Hinduism, Spiritualism

यज्ञमय जीवन ही मनुष्य जीवन की सार्थकता – डॉ. प्रणव पण्ड्या

  • नवरात्र के तीसरे दिन शांतिकुंज में साधकों को संबोधन 
हरिद्वार 12 अक्टूबर। अखिल विश्व गायत्री परिवार प्रमुख डॉ. प्रणव पण्ड्या ने कहा कि नवरात्र साधना के साथ यज्ञमय जीवन बनाने की दिशा में काम करने से ही मनुष्य जीवन सार्थक होगा। यज्ञ- दान, संगतिकरण और देवपूजन का संयुक्त रूप है।
 
वे गायत्री तीर्थ शांतिकुंज में नवरात्र साधना करने आये साधकों को संबोधित कर रहे थे। अखिल विश्व गायत्री परिवार प्रमुख डॉ. पण्ड्या ने कहा कि गायत्री सद्बुद्धि की अधिष्ठात्री देवी और यज्ञ सत्कर्मों का पिता है। सद्भावनाओं एवं सत्प्रवृत्ति के विकास के लिए गायत्री माता और यज्ञ पिता का युग्म हर दृष्टि से सफल एवं समर्थ है। इसको ध्यान में रखते हुए देश भर में गृहे-गृहे यज्ञ व गृहे-गृहे गायत्री उपासना का क्रम प्रारंभ किया गया है। डॉ. पण्ड्या ने कहा कि जो वस्तु यज्ञ की अग्नि के संपर्क में आती है, उसे अग्नि देवता अपने में समाहित करके अपने समान ही बना लेती है। उसी प्रकार जो पिछड़े या बिछड़े व्यक्ति अपने संपर्क में आएँ, उन्हें सकारात्मक दिशा में चलने वाले बनाने का प्रयास करें। उन्होंने कहा कि नियमित रूप से जप करो, स्वाध्याय करो और निःस्वार्थ भाव से सेवा करो। निष्काम सेवा करने से जीवन यज्ञमय बनता है। मनुष्य अपनी शक्तियों, संपत्तियों का उपयोग परमार्थ के लिए जितना अधिक करेगा, उसका प्रतिफल भी वह उतना ही अधिक पायेगा।
 
डॉ. पण्ड्या ने कहा कि यज्ञ के द्वारा जो शक्तिशाली तत्त्व वायुमण्डल में फैलते हैं, उनसे हवा में घूमते कीटाणु नष्ट हो जाते हैं। साधारण रोगों सहित कई गंभीर बीमारी से बचने का यज्ञ एक सामूहिक उपाय है। दवाओं में सीमित व्यक्तियों को ही बीमारियों से बचाने की शक्ति है, पर यज्ञ की वायु दूर-दूर तक पहुँचती है और अन्य प्राणियों की भी सुरक्षा करती है। मनुष्य की ही नहीं, अन्य जीव जन्तुओं के आरोग्य की रक्षा भी यज्ञ से होती है। गायत्री परिवार के जनक युगऋषि पं. श्रीराम शर्मा आचार्य के सूत्रों को याद करते हुए उन्होंने कहा कि यज्ञीय प्रभाव से सुसंस्कृत हुई विवेकपूर्ण मनोभूमि का प्रतिफल जीवन के प्रत्येक क्षण को स्वर्ग जैसे आनन्द से भर देता है और कुबुद्धि, कुविचार, दुर्गुण एवं दुष्कर्मों से विकृत मनोभूमि में यज्ञ से सुधार होता है। उन्होंने कहा कि नवरात्र साधना के साथ यज्ञ का विशेष महत्त्व है। इन दिनों जप के साथ मनोयोगपूर्वक यज्ञ करना चाहिए।
 
इससे पूर्व युगगायकों ने ‘हे प्रभो! जीवन हमारा यज्ञमय कर दीजिए..’’ गीत से उपस्थित साधकों को उल्लसित किया। इस अवसर पर व्यवस्थापक श्री शिवप्रसाद मिश्र सहित देश-विदेश के नवरात्र साधना करने आये साधकोंं, शांतिकुंज, देवसंस्कृति विवि व ब्रह्मवर्चस शोध संस्थान के भाई-बहिन बड़ी संख्या में उपस्थित रहे।
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