इस साल स्वास्थ्य दिवस का थीम है नर्सों और मिडवाइव्स यानी दाइयों का योगदान। इस बार की थीम महत्वपूर्ण है और इस अवसर पर हम आपके जानकारी देंगी लेडी विद द लैंप के बारे में जिन्हें आधुनिक नर्सिंग आन्दोलन की जननी भी कहा जाता है.
फ्लोरेंस नाइटिंगेल एक अंग्रेजी सामाजिक सुधारक और सांख्यिकीविद और आधुनिक नर्सिंग की संस्थापक थी।उन्होंने तब शोहरत हासिल की जब क्रीमियन युद्ध के दौरान उन्होंने प्रशिक्षित नर्सो के मैनेजर होने की भूमिका निभाई, वहाँ वह घायल सैनिको की सहायता कर रही थी।
उन्होंने नर्सिंग को अत्यधिक अनुकूल प्रतिष्ठा दिलवाई और विक्टोरियन कल्चर की आइकॉन बनी, उनके कार्यो को देखते हुए विशेषतः उन्हें “दी लेडी विद दी लैंप” की उपाधि भी दी गयी है।
फ्लोरेंस नाइटिंगेल का प्रारंभिक जीवन

फ्लोरेंस ने अपनी बहिन और माता-पिता के साथ अनेक देशो की यात्रा की. उसने अपने लिए बहुत सारे लेख लिखे. एक दिन उसने लिखा, ” आज ईश्वर मुझसे बोला और मुझे अपनी सेवा में बुलाया. उन्होंने जीवन में कुछ उपयोगी कार्य करने का पक्का इरादा किया.
फ्लोरेंस दुसरे लोगो की मदद करना चाहती थी. वह एक नर्स बनना चाहती थी लेकिन उनके माता -पिता और उसकी बहिन उन्हें नर्स नहीं बनने देना चाहते थे.
उनके माता-पिता उसकी एक धनी आदमी से शादी करके उसे आराम की जिंदगी में स्थिर करने की आशा करते थे.
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मानवता की सेवा
उन दिनों में अच्छे परिवारों की महिलाएं नर्स नहीं बनती थी. उन्हें बहुत कम धन मिलता था. उनका किसी के द्वारा भी बहुत आदर नहीं होता था. उन दिनों में अस्पताल अच्छे नहीं थे. वे गंदे स्थान थे. बिस्तरों पर चादर नहीं बदली जाती थी और रोगियों को कभी भी साफ नहीं किया जाता था. अस्पताल में नर्सो को लकड़ी के कटघरे में रोगी के रोगी कक्ष से बाहर सोना पड़ता था.
फ्लोरेंस ने इन सब की परवाह नहीं की. उन्होंने चुपचाप नर्स बनने की योजना बना ली. उन्हें पहला मौका तब मिला जब उसकी दादी बीमार हो गई.
फ्लोरेंस उनके साथ ही रही और उनकी देखभाल की. धीरे-धीरे उन्होंने पास के गांव के गरीब लोगो की मदद करनी शुरू कर दी.
नर्सिंग की ट्रेनिंग

सैनिकों की मौत का आंकड़ा
सन 1854 में क्रीमियन लड़ाई शुरू हो गयी. सरकार ने फ्लोरेंस को एक संस्था ‘संटरी इन टर्की’ भेजा. वह चालीस नर्सो की टीम की इंचार्ज बनाई गई. संटरी में अस्पताल, लड़ाई में घायल सिपाहियों से भरा था. फ्लोरेंस ने अस्पताल की हालत सुधारने के लिए बहुत सख्त प्रयास किया.
उन्होंने अस्पताल की सफाई की और नया रसोईघर बनाया जो अच्छा खाना देता था. अपने ही धन से उन्होंने रोगियों के लिए नई चादरे और कपडे ख़रीदे. रोगियों की बाते सुनने में वह घंटो समय बिताती थी. उसने उन्हें खुश और आराम से रखने का भरसक प्रयत्न किया. रात्री में वह एक चिराग के साथ, एक बिस्तर से दुसरे बिस्तर पर जाती थी. इसी से उन का नाम ‘लेडी विद द लैम्प’ पड़ गया.
फ्लोरेंस ने इतना सख्त परिश्रम किया की वह बहुत बीमार हो गयी. लेकिन उसके इंग्लैंड जाने से इंकार कर दिया. सन 1860 में उसने नर्सो के लिए नाइटिंगेल स्कूल खोल दिया. उसके प्रयत्नों के फलस्वरूप सारे देश में नर्सो का आदर होने लगा.
भारत में साफ़ पानी की सप्लाई
फ्लोरेंस नाइटिंगेल भारत में भी ब्रिटिश सैनिकों की सेहत को बेहतर करने के मिशन से जुड़ी हुई थी. वो इसके लिए अपने तुर्की के बराक अस्पताल के तजुर्बे का इस्तेमाल कर रही थी.
साल 1880 का दशक आते-आते विज्ञान ने और भी तरक़्क़ी कर ली थी. तमाम डॉक्टरों की तरह फ्लोरेंस ने कीटाणुओं से बीमारी फैलने की बात पर यक़ीन करना शुरू किया था.
इसके बाद फ्लोरेंस का ज़ोर भारत में साफ़ पानी की सप्लाई बढ़ाने पर हो गया. वो उस वक़्त भी आंकड़े जुटा रही थी और इस दौरान फ्लोरेंस ने अकाल के शिकार लोगों की मदद के लिए मुहिम छेड़ दी.
फ्लोरेंस का मक़सद ज़्यादा से ज़्यादा लोगों की जान बचाना और उन्हें साफ़-सुथरा माहौल देना था. फ्लोरेंस को लगता था कि भारत में अकाल के हालात उसी तरह हैं, जैसे उसने तुर्की के स्कुतारी में देखे थे. फ्लोरेंस को भारत के हालात के बारे में 1906 तक रिपोर्ट भेजी जाती रही थी.
अपनी लोकप्रियता का बहुत चतुराई से फ़ायदा उठाकर फ्लोरेंस नाइटिंगेल ने सरकारों को लोगों की बेहतरी के लिए क़दम उठाने पर मजबूर किया. हेल्थ केयर सिस्टम में आज साफ़-सफ़ाई पर जो इतना ज़ोर दिया जाता है, वो ‘लेडी ऑफ़ द लैम्प’ की कोशिशों से ही मुमकिन हुआ.
लंबी उम्र और सेवा के लंबे करियर के बाद 1910 में फ्लोरेंस नाइटिंगेल का 90 साल की उम्र में देहांत हो गया. भारत भी फ्लोरेंस नाइटिंगेल का क़र्ज़दार है.
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