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क्या है लाफिंग बुद्धा के पीछे की कहानी

महिलाएं अक्सर अपने घर की इंटीरियर डिजाइनिंग के दौरान वास्तु का काफी ध्यान रखती है. ऐसे में आप अक्सर महत्मा बुद्धा, लाफिंग बुद्धा, फेंगशुई की अन्य वास्तु जैसे विंड चाईम वगरह से घर की आतंरिक साज सज्जा करती भी होंगी. पुरुषों ने भी अपने घर में, अपने आसपास, ऑफिस में और दुकानों में लाफिंग बुद्धा की तस्वीर या मूर्ति ज़रूर देखी होगी या लगा भी राखी होंगी.लेकिन क्या आप यह नहीं जानना चाहेंगे कि लाफिंग बुद्धा नाम क्यों पड़ा. क्या हैं लाफिंग बुद्धा नाम के पीछे का रहस्य. लाफिंग बुद्धा का महात्मा बुद्ध से कोई भी सम्बन्ध नहीं है. महात्मा बुद्ध को हम एक ऐतिहासिक या आध्यात्मिक चरित्र के रूप में जानते हैं, कहीं तो उन्हें भगवान राम का अवतार भी माना जाता है लेकिन वास्तविकता कुछ और ही है.

क्या है बुद्ध का वास्तविक अर्थ

बुद्ध की व्यक्ति विशेष का नाम नहीं बल्कि एक अवस्था का नाम है. बुद्ध का वास्तविक अर्थ ज्ञान की प्राप्ति होना है. जिसको ज्ञान प्राप्त हो गया वो ही बुद्ध कहलाने लगा. बुद्ध की अवस्था को हम और आप भी प्राप्त कर सकते हैं बस जागने की देर है.

क्या है बुद्ध का वास्तविक अर्थ

कौन थे लाफिंग बुद्धा

विश्व में महात्मा बुद्ध के बहुत से शिष्य थे उन्हीं में से जापान में एक बुद्ध हुए जिनका नाम था होतेई. कहते हैं जैसे ही होतई को आत्मज्ञान की प्राप्ति हुयी वह हंसने लगे और आजीवन हंसते रहे. अब उनका एक मात्र उद्देश्य था लोगों को हँसाना. वो एक गांव से दूसरे गांव जाते और लोगों को हंसाते. लोगों को भी उनकी उपस्थिति में आनंद आता था. कभी कभी तो लोग उनकी हंसी देखर विस्मित हो जाते. जापान में लोग उन्हें हंसता हुआ बुद्ध(लाफिंग बुद्धा) कहने लगे. उन्हें कोई फर्क नहीं पड़ता की वो कहां खड़े हैं, वे बीच बाजार मे खड़े होकर जोर जोर से हंसते. धीरे धीरे वो लाफिंग बुद्धा के नाम से पूरे जापान में प्रसिद्ध हो गए. लोग होतेई के प्रतीक्षा करते, हालांकि उनके पास देने के लिये कोई प्रवचन ये उपदेश नही था लेकिन फिर भी लोग वहां एकत्रित होते और पूरी भीड़ उनके साथ हंसती.

कौन थे लाफिंग बुद्धा

क्या था होतेई के हंसने का कारण

उनके हंसने के कारण सब प्रसन्न थे लेकिन फिर भी कई लोग थे जो उनसे कुछ और जानने का प्रयास करना चाहते थे. उस समय होतेई बोले, “मेरे पास बताने के लिए कुछ बचा ही नहीं है. तुम लोग बेकार में ही रोते रहते हो. तुम लोगों को एक मूर्ख की आवश्यकता है जिस पर तुम सब हंस सको. यही मेरा सन्देश है कि तुम लोग जी भर के हंसो. तुम्हारा यों रोना और शोर मचाना व्यक्तिगत समस्या है. पूरी सृष्टि हंस रही है चन्द्रमा, तारे, पक्षी, फूल, पौधे सब हंस रहे है और तुम रोए चले जा रहे हो. अपनी आंखे खोलो– जागो और हंसो यही मेरा संदेश है और कुछ नही.” (ओशो: अष्टावक्र: महागीता)

उनका सन्यासी की तरह घूमना जारी रहा और ऐसा कहा जाता है की उन्होने पूरे जापान को हँसाया. लोग उनके सान्निध्य मे रहकर हँसना सीख गए. कहते हैं यही होतेई का ध्यान था, यही उनकी समाधि थी. धीरे धीरे लोगो को समझ मे आया की वो बिना किसी कारण भी हंस सकते है और इसके द्वारा शांति का अनुभव किया जा सकता है. ये एक अलग पर बहुत ही कारीगर ध्यान का मार्ग था.

श्वेता सिंह

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