क्या है आयुर्वेद और उसकी चिकित्सा प्रणाली
आयुर्वेद विश्व में विद्यमान वह साहित्य है, जिसके अध्ययन पश्चात हम अपने ही जीवन शैली का विश्लेषण कर सकते है.
आयुर्वेदयति बोधयति इति आयुर्वेदः.
अर्थात जो शास्त्र (विज्ञान) आयु (जीवन) का ज्ञान कराता है उसे आयुर्वेद कहते हैं.
स्वस्थ व्यक्ति एवं रोगी के लिए उत्तम मार्ग बताने वाला विज्ञान को आयुर्वेद कहते हैं. अर्थात जिस शास्त्र में आयु शाखा (उम्र का विभाजन), आयु विद्या, आयुसूत्र, आयु ज्ञान, आयु लक्षण (प्राण होने के चिन्ह), आयु तंत्र (शारीरिक रचना शारीरिक क्रियाएं) – इन सम्पूर्ण विषयों की जानकारी मिलती है वह आयुर्वेद है।
कौन है आयुर्वेद के रचयिता?
आयुर्वेद कोई ऐसा लेख नहीं है जो किसी एक ने लिखा था। यह एक ऐसा प्राचीन भारतीय चिकित्सा प्रणाली है जो सदियों से कई महापुरुष लिखते चले आ रहे हैं। इस शास्त्र के आदि आचार्य अश्वनी कुमार माने जाते हैं जिन्होने दक्ष प्रजापति के धड़ में बकरे का सिर जोड़ा था। अश्विनी कुमारों से इंद्र ने यह विद्या प्राप्त की। इंद्र ने धन्वंतरि को सिखाया। काशी के राजा दिवोदास धन्वंतरि के अवतार कहे गए हैं। उनसे जाकर सुश्रुत ने आयुर्वेद पढ़ा। अत्रि और भारद्वाज भी इस शास्त्र के प्रवर्तक माने जाते हैं। यदि देखा जाये तो आय़ुर्वेद के आचार्य— अश्विनी कुमार, धन्वंतरि, दिवोदास (काशिराज), नकुल, सहदेव, अर्कि, च्यवन, जनक, बुध, जावाल, जाजलि, पैल, करथ, अगस्त, अत्रि तथा उनके छः शिष्य (अग्निवेश, भेड़, जातूकर्ण, पराशर, सीरपाणि हारीत), सुश्रुत और चरक माने जाते हैं.
कब हुआ आयुर्वेद का विकास ?

आयुर्वेद का सही रूप में विकास संहिता दौर में शुरू हुआ जब चरक संहिता लिखा गया। यह आत्रेय और पुनर्वसु ने अपनी कक्षा में बात करते समय की प्रतिलिपि है। यह कहा जाता है चरक संहिता को 6 वे सदी ईसापूर्व में लिखा गया था, जिसमे माना जाता है 300-600 ईसापूर्व के मध्य इसमें सर्जरी के विषय में भी लिखा गया था।
प्राचीन आयुर्वेद चिकित्सा की शुरुवात देवी-देवताओं के ग्रंथों से हुआ था, और बाद में यह मानव चिकित्सा तक पहुंचा। सुश्रुत संहिता (Sushruta Samhita) में यह साफ़-साफ लिखा गया है कि धनवंतरी, ने किस प्रकार से वाराणसी के एक पौराणिक राजा के रूप में अवतार लिया और उसके बाद कुछ बुद्धिमान चिकित्सकों और खुद आचार्य सुश्रुत को भी दवाइयों के विषय में ज्ञान दिया।
आयुर्वेद के उपचार में ज्यादातर हर्बल चीजों का उपयोग होता है। ग्रंथों के अनुसार कुछ खनिज और धातु पदार्थ का भी उपयोग औषधि बनाने में किया जाता था। यहाँ तक की प्राचीन आयुर्वेद ग्रांटों से सर्जरी के कुछ तरीके भी सीखे गए हैं, जैसे नासिकासंधान (Rhinoplasty), पेरिनिअल लिथोटोमी (Perineal Lithotomy), घावों की सिलाई (Wounds Suturing), आदि।
वैसे तो आयुर्वेद के चिकित्सा को वैज्ञानिक तौर पे माना गया है पर इसे वैज्ञानिक तौर पर पालन ना किया जाने वाला चिकित्सा प्रणाली कहा जाता है। पर ऐसे भी बहित सारे शोधकर्ता हैं जो आयुर्वेदिक चिकित्सा को विज्ञानं से जुड़ा (Proto-Science) मानते हैं।
ज्ञानिकों का यह भी कहना है आयुर्वेद के ज्ञान का उपयोग सिन्धु सभ्यता में भी पाया गया है और साथ ही बौद्ध धर्म और जैन धर्म में भी इसके कुछ अवधारणाओं और प्रथाओं (Concepts and Practices) को देखा गया है।
क्या हैं शारीरक दोष ?
आयुर्वेद के अनुसार मनुष्य के शरीर में तीन जैविक-तत्व(Bioelements) होते हैं जिन्हें दोष(Dosha) या त्रिदोष(Tri Dosha) कहा गया है। शरीर के भीतर इन तीन तत्वों का उतार-चढ़ाव लगा रहता है।
आयुर्वेद के पाठ में सही तरीके से लिखा हुआ है कि शरीर का स्वास्थ्य इन तीन दोषों पर निर्भर करता है ,जो हैं….
वात (वायु तत्व) – यह सूखा, सर्दी, प्रकाश, और चलने के गुणों की विशेषता है। शरीर में सभी चालन वात की वजह से है. दर्द होना भी वात की विशेषता है। वात के कारण पेट फूलना, गठिया, आर्थराइटिस जैसे बीमारियाँ, आदि होती हैं. 5 प्रकार के वात दोष –
1- प्राण वात
2- समान वात
3- उदान वात
4- अपान वात
5- व्यान वात
पित्त (अग्नि तत्व ) – यह पेट/आमाशय में बाइल(Bile) के निकलने के गुणों की विशेषता है और इसमें देखा जाता है किस प्रकार Bile लीवर, स्प्लीन, ह्रदय, आँखों में और त्वचा में सही मायने में पहुँचता है। इसमें उर्जा की शक्ति को देखा जाता है जिसमें खाद्य का पाचन और मेटाबोलिज्म सम्मिलित है।
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क्या है 5 प्रकार के पित्त दोष –
1- साधक पित्त
2- भ्राजक पित्त
3- रंजक पित्त
4- लोचक पित्त
5- पाचक पित्त
कफ (पानी तत्व) – यह सर्दी, कोमलता, कठोरता, सुस्ती, स्नेहन, और पोषक तत्वों के वाहक की विशेषता है. 5 प्रकार के कफ दोष –
1- क्लेदन कफ
2- अवलम्बन कफ
3- श्लेष्मन कफ
4- रसन कफ
5- स्नेहन कफ
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आयुर्वेद के आठ अंग
इन आयुर्वेद चिकित्सा के आठ अंग को महान संस्कृत “महाभारत” में पढ़ा गया है और इनका नाम संस्कृत में चिकित्सयम अष्टन्गायम है. आयुर्वेद के आठ अंग हैं –
काया चिकित्सा: साधारण दवाई, या शारीर के लिए औषधि
कुमार सल्यतंत्र : सर्जरी चिकित्सा
सलाक्यतंत्र: कान, आँख, नाक, मुहँ के लिए चिकित्सा (ENT)
भूतविद्या: भुत-प्रेत से जुडी चिकित्सा, दिमाग से जुड़ा चिकित्सा
अगदतंत्र: विष ज्ञान
रसायनतंत्र: विटामिन और ज़रूरी पोषण तत्व से जुड़ा चिकित्सा
वाजीकरणतत्र: कामोत्तेजक, वीर्य और यौन सुख से जुड़ा चिकित्सा
आयुर्वेद के पंचकर्म

पंच का अर्थ है ‘पांच’ और कर्म का अर्थ है ‘चिकित्सा’. ये वो कर्मा हैं जिनकी मदद से आयुर्वेद में शारीर से विषैले तत्वों को बाहर निकाला जाता है.
वमन– मुख के माध्यम से उलटी करवाना
विरेचन– अस्थमा, सोरायसिस, डायबिटीज से जुड़े क्लिनिकल परीक्षण
नास्य-दवाई को नाक के माध्यम से शरीर में पहुँचाना
निरूह बस्ति –जिसमें एक काढ़ा बनाने का कार्य मिश्रण किया जाता है।
अनुवसानवस्ति-जिसमें तेल और वसा प्रशासित रहे हैं।
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