801 ईस्वी में तैमूर के शासनकाल में बना था पहला ताजिया

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801 ईस्वी में तैमूर के शासनकाल में बना था पहला ताजिया

मुहर्रम कोई त्योहार नहीं है, यह सिर्फ इस्लामी कैलेंडर हिजरी का पहला महीना है। दुनियाभर में फैले इस्लाम धर्म में मुहर्रम की 9 और 10 तारीख को मुसलमान रोजे रखते हैं और मस्जिदों- रों में इबादत की जाती है। मुहर्रम के दौरान पूरी दुनिया इबादत और रोजे के साथ भोजन-पानी का दान भी किया जाता है। भारत में मुहर्रम के अनूठे रंग हैं, इसे इमाम हुसैन की याद में मनाया जाता है। मुहर्रम को जिस शिद्दत से मुसलमान मानते हैं, हिंदू भी उतनी ही आस्था रखते हैं। चौकी स्नान से लेकर मुहर्रम की 10वी तारीख को कर्बला स्थल तक हिन्दू भाईचारे और सद्भाव के साथ पूरी आस्था में सराबोर होकर मुहर्रम के प्रतीकों को कंधा देते हैं।

हजरत हुसैन को यजीद सेना ने किया था शहीद

हजरत हुसैन को यजीद सेना ने किया था शहीद

10 मुहर्रम 61 हिजरी यानी 10 अक्टूबर सन् 680 को हजरत हुसैन को यज़ीद की सेना ने उस वक़्त शहीद कर दिया, जब वे नमाज़ के दौरान सजदे में सिर झुकाए हुए थे। पैगाम ए इंसानियत को नकारते हुए बादशाह यजीद ने इस जंग में 72 लोगों को बेरहमी से मार दिया था, जिनमें मासूम बच्चे भी शामिल थे। हजरत हुसैन और उनके परिजनों, साथियों को बेरहमी से मारने के पहले यजीद की सेना ने बहुत यातनाएं दी। कहा जाता है कि तपते रेगिस्तान में पानी की एक बूंद भी इस्लाम धर्म के पैगंबर के नवासे को नसीब नहीं हुई थी।

801 ईस्वी में बना पहला ताजिया (मुहर्रम)

तैमूर लंग बादशाह

धार्मिक मामलों के जानकार नईम कुरेशी के अनुसार भारत में ताज़ियादारी यानी ताजिए की झांकियां निकलना एक शुद्ध भारतीय परंपरा है। इसकी शुरुआत तैमूर लंग बादशाह ने की थी। तैमूर लंग शिया संप्रदाय से था और मुहर्रम माह में हर साल इराक जाता था। एक बार जब वह नहीं जा सका तो उसे खुश करने के लिए दरबारियों ने उस जमाने के कलाकारों को इकट्ठा कर उन्हें इराक के कर्बला में बने इमाम हुसैन के रोज़े की प्रतिकृति बनाने का आदेश दिया। बांस किमचियों की मदद से ताजिया तैयार किया गया और फूलों से सजाकर पहली बार 801 ईस्वी में तैमूर लंग के महल परिसर में रखा गया था। तुगलक-तैमूर वंश के बाद मुगलों ने भी इस परंपरा को जारी रखा। मुगल बादशाह हुमायूं ने सन् 962 में बैरम खां से 46 तौला के जमुर्रद (एक तरह की हरित मणी) यानी पन्ने का बना ताजिया मंगवाया था। तभी से ये परंपरा देश में चली आ रही है, और लोग इसे आगे बढ़ा रहे हैं।

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क़ुरान और हदीस में मुहर्रम का महत्व

क़ुरान और हदीस में मुहर्रम का महत्वक़ुरान के पारा नंबर 10 में सूरह तोबा की आयत नंबर 36 के अनुसार इस्लामिक कैलेंडर के बारह महीनों में मुहर्रम का बड़ा महत्व है। माना जाता है कि इस पवित्र महीने में कई महत्वपूर्ण घटनाएं हुई। हजरत आदम दुनिया में आए, हज़रत नूह की कश्ती को दरिया के तूफ़ान में किनारा मिला, हज़रत मूसा और उनकी कौम को फिरऔन (तात्कालिन मिस्त्र का बादशाह) और उसके लश्कर से छुटकारा मिला और फिरऔन नील नदी में समां गया।

आशूरा का रोजा, गुनाहों से निजात 

मुहर्रम पैगंबर मोहम्मद साहब

हदीस मिशकात शरीफ के अनुसार पैगंबर मोहम्मद साहब ने कहा है कि गुनाहों से छुटकारा पाने के लिए दस मुहर्रम यौमे आशूरा पर यानी मुहर्रम महीने की दसवीं तारीख को रोजा रखना चाहिए। वहीं हदीस तिरमिज़ी शरीफ़ के अनुसार रमजान के रोजों के बाद मुहर्रम की दस तारीख का रोजा बहुत ही खास माना गया है। इस दिन रखे गए रोजे का भी खास महत्व होता है।

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