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‘संत-मेला’ से ‘पशु-मेला’ कैसे बना सोनपुर मेला !

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‘संत-मेला’ से ‘पशु-मेला’ कैसे बना सोनपुर मेला !

‘संत-मेला’ से ‘पशु-मेला’ कैसे बना सोनपुर मेला !

कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष के एकादशी के दिन से तीन नदियों (शोण, गंगा और गंडक ) के संगम-तट पर, बिहार के सारण क्षेत्र के सोनपुर में एतेहासिक-पौराणिक सोनपुर पशु मेला का प्रारम्भ होता है | एक महीने तक चलने वाला यह मेला एशिया का सबसे बड़ा पशु मेला है | पशु मेला का नाम सुनते ही हमारे मन में छवि बनती है कि वहां तो पशुओं का बाज़ार लगता होगा | वहां अन्य मनुष्यों के लिए ज्यादा कुछ नहीं होता होगा | लेकिन मेला तो मेला ही होता है ! बदलते हुए दौर के साथ यह मेला भी मनोरंजन के साधनों से भरपूर मिलता है | इस मेले का इतिहास लगभग हजारो वर्ष पुराना है | राजस्थान पुष्कर में लगने वाले ऊंट-मेला की तरह सोनपुर विशेष रूप से हांथियों का मेला है | हांथियो का मेला होने के पीछे एक पौराणिक कथा और भगवान् की अनुपम लीला है |
सोनपुर का यह पशु-मेला ‘हरीहर-क्षेत्र मेला’ के नाम से भी जाना जाता है | स्थानीय लोग इसे ‘छत्तर मेला’ के नाम से भी जानते हैं | ‘हरिहर-क्षेत्र’ एक पौराणिक नाम है | सोनपुर मेला के पशु-मेला और विशेष रूप से हांथियो का मेला होने के पीछे एक पौराणिक कथा है | श्रीमदभागवत महापुराण के अष्टम-स्कन्द में गजेन्द्र-मोक्ष की कथा आती है | एक समय इन्द्र्धुम्न नाम के एक राजा को अगस्त्य मुनि ने हांथी(गज) बन जाने का श्राप दिया था, और हूहू नामक गन्धर्व देवल मुनि के श्राप से मगरमच्छ अर्थात ‘ग्राह’ बन गया था | कहते हैं एक समय गजेन्द्र अपने परिवार के संग हरिहर-क्षेत्र में गंगा के तट पर अपनी प्यास बुझाने गया | प्यास बुझाने के बाद गजेन्द्र अपने परिवार पत्नी बच्चों के साथ जल-क्रीडा करने लगा | उसी समय गजेन्द्र को इतना प्रसन्न देखकर इर्ष्या के वशीभूत ग्राह ने उसके पैर जल के भीतर जकड लिए | फिर गजेन्द्र और ग्राह के बीच युद्ध प्रारंभ हो गया पुराणों के कथानुसार यह युद्ध कई वर्षो तक चला |
गजेन्द्र का परिवार भरा-पूरा था | उसकी कई पत्निया थी और सैकड़ो बच्चे भी थे लेकिन जब गजेन्द्र को ग्राह ने पकड़ा तब उसकी सहायता के लिए कोई नहीं आया | एक-एक करके सब नदी के बाहर चले गए और गजेन्द्र को ग्राह से संघर्ष करते हुए देखते रहे | जब गजेन्द्र की पत्नियों को लगा कि अब गजेन्द्र की मृत्यु निश्चित है तब गजेन्द्र की पत्नियों और भाई भतीजों ने उस स्थान पर गजेन्द्र को बिलकुल अकेला छोड़ कर सघन-वन में प्रस्थान कर गए | तब गजेन्द्र के मन में वैराग्य और इश्वर-प्रेम प्रगट हो गया | गजेन्द्र ने संसार के रिश्ते-नातो का रहस्य समझ लिया | गजेन्द्र ने जान लिया कि इस संसार में भगवान् के अलावा दुसरा कोई सहाय नहीं है | गजेन्द्र समझ चुका था कि अब भगवान् ही मेरी रक्षा कर सकते हैं | गजेन्द्र का मन भगवान् के प्रति समर्पित हो गया | तब गजेन्द्र ने अपने सूंढ़ में कमल का पुष्प लेकर भगवान् श्री हरी को समर्पित करते हुए, आर्त भाव से विभोर हो कर भगवान् को पुकारने लगा | रक्षस्व माम प्रभो ! रक्षस्व माम ! कहते हुए आर्त क्रंदन करते हुए गजेन्द्र ने प्रभु को पुकारा |
तब भगवान् श्री हरी अपने भक्त की तीव्र एवं आर्त भाव को देख कर प्रभावित हुए बिना नहीं रह पाए और भक्त-वत्सल भगवान् अपने भक्त की रक्षा हेतु गरूंड पर सवार हो शंख, चक्र, गदा और पद्म धारण कर चतुर्भुज रूप में गज की रक्षा हेतु अवतरित हो जाते हैं | पुराणों के अनुसार यह भगवान् श्रीहरी का चौदहवा अवतार था | तब भगवान् ने अपने सुदर्शन चक्र से ग्राह का सर काट कर उसके धड से अलग कर दिया और शरणागत की रक्षा की | तब गजेन्द्र ने भगवान् की स्तुति की, और गजेन्द्र के द्वारा की गई यह स्तुति ‘गजेन्द्र-मोक्ष स्तोत्र ‘ के नाम से जाना जाता है | हिन्दू धर्म में इस स्तोत्र का पाठ बहुत महत्व रखता है |
एक अन्य मान्यता के अनुसार ‘गजेन्द्र’ और ‘ग्राह’ भगवान् विष्णु के द्वारपाल ‘जय’ और ‘विजय’ ही थे | और स्वयं भगवान् उन्हें मुक्त करने आये थे | साथ ही इस घटना से भगवान् ने गजेन्द्र का सांसारिक मोह भंग किया और ग्राह-वध से ग्राह को इर्ष्या मुक्त किया जो समूल पाप की जड़ है | कहते हैं ‘जय’ शिव भक्त थे और ‘विजय’ विष्णु भक्त अतः भगवान् विष्णु और भगवान् शिव के नाम पर उस क्षेत्र का नाम हरिहर-क्षेत्र पड़ गया | हरिहर-क्षेत्र के हरिहर मंदिर में भगवान् विष्णु और भगवान् शिव की पूजा एक ही मंदिर में एक साथ होती है,

जो कि अपने आप में एकलौता उदाहरण है | पुरे देश में ऐसा दुसरा मंदिर नहीं है |

|| भगवान् – श्री हरिहर ||
हरिहर-क्षेत्र में भगवान् की इस लीला के कारण सर्व प्रथम कार्तिक पूर्णिमा के अवसर पर वहां ऋषि मुनियों की शास्त्रार्थ सभाएं लगने लगी | फिर भक्त- गजेन्द्र को सम्मान देने हेतु लोग वहां हांथी लेकर आने लगे और धीरे धीरे इस उत्सव ने हांथी-मेला का रूप धारण किया | मौर्य वंश के प्रथम भारत-सम्राट चन्द्रगुप्त मौर्य ने सोनपुर मेला से ही 100 हांथी खरीद कर सिकंदर के सेनापति सेल्यूकस (जो कि चन्द्रगुप्त मौर्य के ससुर भी थे) को दिया था | फिर कालांतर में यहाँ आदि गुरु शंकराचार्य भी वेदांत प्रचार हेतु आये | एकबार चैतन्य महा प्रभु अपनी टोली के साथ नाचते गाते हुए अपने शिष्य ‘सनातन’ को ढूंढते हुए यहाँ आये | गुरु नानक देव, तुलसी, कबीर सब इस धरती पर ज्ञान का उपदेश करने और इस पवित्र भूमि का दर्शन करने आते रहे | धीरे धीरे हांथी के अलावा यहाँ अन्य पशु पक्षी भी लाये जाने लगे और फिर धीरे धीरे यहाँ से पशु-पक्षियों का व्यापार भी शुरू हो गया | और ‘सोनपुर संत मेला’ धीरे धीरे ‘सोनपुर पशु-मेला’ के नाम से पुकारा जाने लगा | लेकिन ज्ञानियों एवं शास्त्रज्ञों के लिए तो यह संत-मेला ही है | पुराणों के अनुसार हरिहर क्षेत्र का महत्व प्रयाग और गया-धाम से भी ज्यादा बताया गया है | कार्तिक पूर्णिमा के दिन यहाँ गंगा स्नान करने का विशेष महत्व है |
(लेखक – मनीष देव )
साभार – http://divyasrijansamaaj.blogspot.in/

Editorial Review Note

Written by Religion World — Bhavya Srivastava is the founder of Religion World and a veteran journalist with over 18 years of experience across broadcast, print, and digital media. A founding member of the International Association of Religion Journalists (IARJ), he has spent much of his career reporting on and producing content about religion, faith, and spirituality. .

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November 4, 2017 6 min read
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