एक महीने की रामकथा – विश्व पर्यावरण दिवस पर प्रकृति पर गंभीर चिंतन

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एक महीने की रामकथा – विश्व पर्यावरण दिवस पर प्रकृति पर गंभीर चिंतन

  • पर्यावरण संवर्धन और मानव अस्तित्व एक दूसरे के पूरक हैं परन्तु विकास की दौड़ में मानव ने पर्यावरण को एक अपूर्णिय क्षति पहुंचाई है !
  • भारतीय संस्कृति भी हमें वन और वृक्ष के साथ आत्मीयता और आध्यात्मिक का पाठ पढ़ाती है ! अतः हर मनुष्य का कर्तव्य है कि वह न सिर्फ पर्यावरण की क्षति को रोके बल्कि उसे संवर्धन में हर संभव प्रयास करें
  • पेड़ लगाएं, पानी बचाएँ, पॉलीथीन का उपयोग न करें और पर्यावरण को प्रदूषण से बचाएँ !

विश्व पर्यावरण दिवस पर भारत ने वायु प्रदूषण थीम रखी है। ताकि वायु प्रदूषण के कारण जो साँसें कम हो रही है उसे पेड़ लगाकर सुरक्षित किया जा सकता है। स्वामी चिदानन्द सरस्वती जी महाराज ने कहा कि भारत के हर व्यक्ति को वायुप्रदूषण के कारण कम होती सांसों के बारे में विचार करना होगा तभी हम भावी पीढ़ियों को स्वच्छ वातावरण दे सकते है। उन्होने कहा कि लोग अपने पूर्वजों के नाम का मन्दिरों में पत्थर लगवाते है ऐसे अनेक पत्थर अनेेेक मन्दियों में लगे है कौन देखता है इनको। अब पत्थर नहीं पेड़ लगाने का समय आ गया है। एक पेड़ लगेेगा तो जीवन भर प्राणवायु आक्सीजन देते रहेगा।

परमार्थ निकेतन में चल रही रामकथा के 21 वे दिन में संत श्री मुरलीधर जी महाराज जी ने कहा अगले दिन जब भगवान राम, भरत, आदि पूरा परिवार, महाराज जनक और सभासद, आदि बैठे होते हैं तो भगवान राम अपने अनुज भ्राता भरत से वन आगमन का कारण पूछते हैं. तब राजकुमार भरत अपनी मंशा उनके सामने उजागर करते हैं कि वे उनका वन में ही राज्याभिषेक करके उन्हें वापस अयोध्या ले जाने के लिए आए हैं और अयोध्या की राज्य काज संबंधी जिम्मेदारी उन्हें ही उठानी हैं, वे ऐसा कहते हैं. महाराज जनक भी राजकुमार भरत के इस विचार का समर्थन करते हैं. परन्तु श्री राम ऐसा करने से मना कर देते हैं, वे अयोध्या लौटने को सहमत नहीं होते क्योंकि वे अपने पिता को दिए वचन के कारण बंधे हुए हैं. राजकुमार भरत, माताएँ और अन्य सभी लोग भगवान राम को इसके लिए मनाते हैं, परन्तु वचन बद्ध होने के कारण भगवान श्री राम ऐसा करने से मना कर देते हैं. तब राजकुमार भरत बड़े ही दुखी मन से अयोध्या वापस लौटने के लिए प्रस्थान करने की तैयारी करते हैं, परन्तु प्रस्थान से पूर्व वे अपने भैया राम से कहते हैं कि “अयोध्या पर केवल श्री राम का ही अधिकार हैं और केवल वनवास के 14 वर्षों की समय अवधि तक ही मैं [भरत] उनके राज्य का कार्यभार संभालूँगा और इस कार्य भार को सँभालने के लिए आप [श्री राम] मुझे आपकी चरण – पादुकाएं मुझे दे दीजिये, मैं इन्हें ही सिंहासन पर रखकर, आपको महाराज मानकर, आपके प्रतिनिधि के रूप में 14 वर्षों तक राज्य काज पूर्ण करूंगा, परन्तु जैसे ही 14 वर्षों की अवधि पूर्ण होगी, आपको पुनः अयोध्या लौट आना होगा अन्यथा मैं अपने प्राण त्याग दूंगा.”

राजकुमार भरत के ऐसे विचार सुनकर और उनकी मनःस्थिति को देखकर राजकुमार लक्ष्मण को भी उनके प्रति अपने क्रोध पर पश्चाताप होता हैं कि उन्होंने इतने समर्पित भाई पर किस प्रकार संदेह किया और उन्हें इन दुखी घटनाओं के घटित होने का कारण समझा. भगवान श्री राम भी अपने छोटे भाई भरत का अपार प्रेम, समर्पण, सेवा भावना और कर्तव्य परायणता देखकर उन्हें अत्यंत ही प्रेम के साथ अपने गले से लगा लेते हैं. वे अपने छोटे भाई राजकुमार भरत को अपनी चरण पादुकाएं देते हैं और साथ ही साथ भरत के प्रेम पूर्ण आग्रह पर ये वचन भी देते हैं कि जैसे ही 14 वर्षों की वनवास की अवधि पूर्ण होगी, वे अयोध्या वापस लौट आएंगे. अपने बड़े भाई श्री राम के इन वचनों को सुनकर राजकुमार भरत थोड़े आश्वस्त होते हैं और उनकी चरण पादुकाओं को बड़े ही सम्मान के साथ अपने सिर पर रखकर बहुत ही दुखी मन से अयोध्या की ओर प्रस्थान करते हैं. अन्य सभी परिवार जन भी एक – दूसरे से बड़े ही दुखी मन से विदा लेते हैं.

जब राजकुमार भरत अपने राज्य अयोध्या लौटते हैं तो प्रभु श्री राम की चरण पादुकाओं को राज्य के सिंहासन पर सुशोभित करते हैं और वे स्वयं अपने बड़े भाई श्री राम की ही तरह सन्यासी वस्त्र धारण करके उन्हीं की तरह जीवन यापन करने का निश्चय करते हैं. वे अयोध्या के पास स्थित नंदीग्राम में एक साधारण सी कुटिया में रहते हैं और यहीं से प्रभु श्री राम के प्रतिनिधि के रूप में संपूर्ण राज – काज सँभालते हैं और अपने भाई श्री राम के राज्य की रक्षा करते हैं.

स्वामी प्रताप पूरी जी महाराज ने कहा कि ’’कथा मनोरंजन का नहीं मनन का विषय है।’’

स्वामी प्रताप पूरी जी महाराज ने कहा कि ’’कथा मनोरंजन का नहीं मनन का विषय है।’’

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