क्या नई पीढ़ी धर्म से दूर हो रही है?
आज के समय में अक्सर यह कहा जाता है कि नई पीढ़ी धर्म से दूर होती जा रही है। सोशल मीडिया, तकनीक, करियर और आधुनिक जीवनशैली के बीच युवाओं को देखकर यह धारणा बनना स्वाभाविक भी है। लेकिन क्या यह सचमुच धर्म से दूरी है, या फिर धर्म को समझने का तरीका बदल रहा है? इस प्रश्न का उत्तर उतना सरल नहीं जितना दिखता है।
धर्म और आस्था की बदलती परिभाषा
पुरानी पीढ़ियों के लिए धर्म का अर्थ पूजा-पाठ, मंदिर-मस्जिद जाना, व्रत-उपवास और परंपराओं का पालन था। वहीं नई पीढ़ी धर्म को इन सीमाओं से आगे देखकर समझना चाहती है। आज के युवा सवाल पूछते हैं — क्यों, कैसे और किस उद्देश्य से।
यह प्रश्न पूछना धर्म से दूरी नहीं, बल्कि चेतन और जागरूक आस्था की ओर संकेत करता है। नई पीढ़ी कर्मकांड से अधिक धर्म के मूल संदेश — मानवता, नैतिकता और आत्मिक शांति — को महत्व देना चाहती है।
तकनीक और आधुनिक जीवन का प्रभाव
डिजिटल युग ने युवाओं की सोच को वैश्विक बना दिया है। अब जानकारी सीमित नहीं रही। अलग-अलग धर्मों, संस्कृतियों और विचारधाराओं से परिचय होने के कारण युवा तुलना करते हैं। ऐसे में वे अंधविश्वास या कठोर धार्मिक नियमों को स्वीकार करने से हिचकते हैं।
यह बदलाव कई लोगों को धर्म से दूरी जैसा लगता है, जबकि असल में यह धर्म की पारंपरिक अभिव्यक्ति से दूरी है, न कि आध्यात्मिक मूल्यों से।
संस्थागत धर्म से असंतोष
नई पीढ़ी का एक बड़ा वर्ग संस्थागत धर्म से सवाल करता है। जब धर्म राजनीति, भेदभाव, डर या नियंत्रण का माध्यम बनता है, तब युवाओं का विश्वास डगमगाता है।
युवा धर्म को विभाजन के बजाय जोड़ने वाला तत्व देखना चाहते हैं। जब उन्हें धर्म के नाम पर नफरत, हिंसा या असमानता दिखती है, तो वे उससे दूरी बना लेते हैं। यह दूरी धर्म से नहीं, बल्कि उसकी गलत व्याख्या से होती है।
व्यक्तिगत आध्यात्मिकता की ओर झुकाव
दिलचस्प बात यह है कि नई पीढ़ी पूरी तरह अधार्मिक नहीं हो रही। योग, ध्यान, माइंडफुलनेस, सकारात्मक सोच और आत्म-विकास जैसे विषय युवाओं में तेजी से लोकप्रिय हो रहे हैं।
यह दिखाता है कि युवा धर्म से नहीं, बल्कि पारंपरिक ढाँचों से बाहर निकलकर आध्यात्मिकता खोज रहे हैं। वे ईश्वर को नियमों में नहीं, अनुभव में महसूस करना चाहते हैं।
परिवार और समाज की भूमिका
कई बार धर्म को बच्चों पर थोप दिया जाता है। जब सवालों के जवाब देने के बजाय उन्हें चुप रहने को कहा जाता है, तो यह दूरी और बढ़ जाती है। नई पीढ़ी संवाद चाहती है, डर नहीं।
यदि परिवार और समाज धर्म को बोझ की बजाय समझ और संवेदना के साथ प्रस्तुत करें, तो युवाओं का जुड़ाव स्वाभाविक रूप से बना रह सकता है।
क्या यह वास्तव में चिंता का विषय है?
हर पीढ़ी धर्म को अपने समय के अनुसार समझती है। पहले परंपरा प्राथमिक थी, आज तर्क और अनुभव। इसका अर्थ यह नहीं कि नई पीढ़ी मूल्यहीन हो रही है। बल्कि वे नैतिकता, समानता और करुणा को अधिक महत्व दे रहे हैं।
धर्म यदि समय के साथ संवाद करे, स्वयं को मानवता से जोड़े और युवाओं के प्रश्नों को सम्मान दे, तो दूरी अपने आप कम हो सकती है।
नई पीढ़ी धर्म से दूर नहीं हो रही, बल्कि धर्म को नए दृष्टिकोण से देख रही है। वे दिखावे से अधिक सार को खोज रहे हैं। यह बदलाव डर का नहीं, बल्कि आत्ममंथन का संकेत है।
धर्म और युवा एक-दूसरे के विरोधी नहीं हैं। आवश्यकता है तो केवल समझ, संवाद और खुले मन की।
~ रिलीजन वर्ल्ड ब्यूरो









