21 जून को अंतर्राष्ट्रीय योग दिवस मनाया जा रहा है. कोरोना वायरस के कारण इस बार योग दिवस डिजिटल माध्यम से मनाया जायेगा. इस बार रिलिजन वर्ल्ड लेकर आया है आपके लिए उन 21 आधुनिक योगियों कि सीरीज जिन्होंने योग को पुनः पूरे देश में प्रतिष्ठित किया.
महावतार बाबा

विश्व के सबसे बड़े ‘योगीराज’ कहलाने वाले संत श्यामाचरण लाहड़ी ने एक बाबा से शिक्षा लेकर योग का मार्ग अपनाया था, जिन्हें महावतार बाबा के नाम से जाना जाता है. संत श्यामाचरण लाहड़ी ने ही गृहस्थ लोगों के बीच क्रियायोग को लोकप्रिय बनाने का काम किया था. उन्होंने साधना के नियमों को सरल बनाया, ताकि अपने कामों के बीच साधना मार्ग पर चल कर लोग परमात्मा को जान सकें.
आदि शंकराचार्य, संत श्यामाचरण लाहड़ी और संत कबीर को शिक्षा देने वाले महान महावतार बाबा के बारे में कुछ ऐसे तथ्य हैं, जो साबित करते हैं कि वो वाकयी एक दिव्य शक्ति हैं. आज हम आपको यही तथ्य बता रहे हैं:
दुनिया में सबसे ज़्यादा बिकने वाली आध्यात्मिक आत्मकथा, ‘ऑटोबायोग्राफ़ी ऑफ़ अ योगी’ के लेखक परमहंस योगानंद ने इस किताब में महावतार बाबा के बारे लिखा है. परमहंस योगानंद के गुरु श्यामाचरण लाहड़ी थे. उन्होंने ही लाहड़ी को क्रियायोग की शिक्षा दी थी, जिसके बारे में गीता में भगवान श्रीकृष्ण और योगसूत्र में ऋषि पतंजलि ने बताया है.
महावतार बाबा को श्यामाचरण लाहड़ी ने अपने पूर्वजन्म का गुरु माना था.’ श्यामाचरण लाहड़ी को पर्वतीय क्षेत्र के भ्रमण के दौरान महावतार बाबा दिखाई दिए थे. उन्होंने ही उन्हें क्रियायोग का मार्ग गृहस्थों को दिखाने का आदेश दिया था.
महावतार बाबा ने ही लाहड़ी को बताया था कि कृष्ण द्वारा अर्जुन को दिया गया योग का ज्ञान ही क्रियायोग है.
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एक दिन लाहड़ी रेल की पटरी बिछवा रहे थे, तभी उन्हें किसी के पुकारने की आवाज़ आई, जब वो उस आवाज़ के पीछे गए, तो उन्हें महाअवतार बाबा के दर्शन हुए थे. महाअवतार बाबा ने लाहड़ी से कहा था कि उनकी पिछले जन्म की साधना अधूरी रह गई थी, जिसे पूरा करने का समय आ गया है. उन्होंने प्रमाण के तौर पर उन्हें पिछले जन्म का आसन, चटाई और अन्य सामान भी दिखाए थे.
परमहंस योगानन्द ने भी अपनी किताब में बाबा के साथ अपनी प्रत्यक्ष भेट के बारे में बताया है. श्री युक्तेश्वर गिरि की पुस्तक ‘द होली साइंस’ में भी उनका प्रत्यक्ष वर्णन मिलता है.
बाबाजी के जन्मस्थान और परिवार के बारे में किसी को कुछ पता नहीं चल सका। जो लोग भी उनसे जब भी मिले, उन्होंने हमेशा उनकी उम्र 25-30 वर्ष ही बताई। लाहिड़ी महाराज ने बताया था कि उनकी शिष्य मंडली में दो अमेरिकी शिष्य भी थे। वे अपनी पूरी शिष्य मंडली के साथ कहीं भी कभी भी पहुंच जाया करते थे। परमहंस योगानंद ने अपनी पुस्तक में बाबाजी से जुड़ी दो घटनाओं का उल्लेख किया है जिनपर एक बार तो भरोसा नहीं होता।
ऐसे टाल दी शिष्य की मृत्यु
पहली घटना का उल्लेख करते हुए योगानंद ने लिखा है कि एक बार रात में बाबाजी अपने शिष्यों के साथ थे। पास ही में अग्नि जल रही थी। बाबाजी ने उस अग्नि से एक जलती हुई लकड़ी उठाकर अपने एक शिष्य के कंधे पर मार दी। जलती हुई लकड़ी से इस तरह मारे जाने पर बाबाजी के शिष्यों ने विरोध किया। इस पर बाबाजी ने उस शिष्य के कंधे पर हाथ रखते हुए कहा कि मैंने तुम्हें कोई कष्ट नहीं पहुंचाया है बल्कि आज होने वाली तुम्हारी मृत्यु को टाल दिया है।
मृतक यूं जिंदा हो गया
इसी तरह जो दूसरी बात का उल्लेख योगानंद ने किया है, उसके अनुसार एक बार बाबाजी के पास एक व्यक्ति आया और वह जोर-जोर से उनसे दीक्षा देने की जिद करने लगा। बाबाजी ने जब मनाकर दिया तो उसने पहाड़ से नीचे कूद जाने की धमकी दी। इसपर बाबाजी ने कहा ‘कूद जाओ’, उस शख्स ने आव देखा न ताव पहाड़ी से कूद गया। यह दृश्य देख वहां मौजूद लोग अचंभित रह गए। तब बाबाजी ने शिष्यों से कहा- ‘पहाड़ी से नीचे जाओ और उसका शव लेकर आओ।’ शिष्य पहाड़ी से नीचे गए और क्षत-विक्षत शव लेकर आ गए। शव को बाबाजी के सामने रख दिया। बाबाजी ने शव के ऊपर जैसे ही हाथ रखा, वह मरा हुआ व्यक्ति सही सलामत जिंदा हो गया। इसके बाद बाबाजी ने उससे कहा कि ‘आज से तुम मेरी टोली में शामिल हो गए। तुम्हारी ये अंतिम परीक्षा थी।’
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