भारत में फूलों के रंग भी बिखरते हैं और बारूद से भी खेली जाती है होली

होली ऐसा त्योहार है जिस पर लोग दुश्मनी भुलाकर एक–दूसरे पर प्यार के रंग बरसाते हैं। भारत के अलग–अलग राज्यों में होली के अलग–अलग रंग देखने को मिलते हैं। बरसाने की लट्ठमार होली दुनियाभर में मशहूर है, तो कपड़ा फाड़ होली का भी अलग मजा है। होली पर देशभर में प्यार और भाईचारे के रंग बरसते हैं। आसमान में इंद्रधनुषी छटा छा जाती है तो धरती सतरंगी चादर ओढ़ लेती है। इनके बीच हवा में छाया रहता है मस्ती का रंग जिसमें सराबोर होली के हुड़दंगी जमकर धमाल मचाते हुए नजर आते हैं।
बारूद की होली
भारत में होली के बहुत से रंग देखे जा सकते हैं। यहां फूलों की होली भी खेली जाती है तो बारूद की होली भी होती है। राजस्थान के उदयपुर शहर से करीब 40 किलोमीटर दूर स्थित मेनार गांव होली के बाद चैत्र कृष्ण द्वितीया को बंदूकों की गूंज से थर्रा उठता है। बड़े तो बड़े बच्चे तक बारूद से ऐसे खेलते हैं मानो बारूद नहीं गुलाल हो। गांव के लोग देसी बंदूकों से इतने धमाके करते हैं कि देखने वाला दहशत में आ जाए। नजारा कुछ ऐसा होता है कि फिल्म रामलीला– गोलियों की रासलीला का दृश्य ताजा हो जाता है। बेखौफ बारूद का खेल खेला जाता है, बंदूकों में भरकर बारूद दागा जाता है तो हजारों पटाखे हाथों में लेकर ऐसे चलाए जाते हैं मानो कोई खेल तमाशा हो। जमरा बीज नाम से मशहूर इस पर्व के पीछे करीब 400 साल पुराना इतिहास जुड़ा हुआ है।

मुगलों पर जीत का जश्न है जमरा बीज
पूरे गांव में दीवाली जैसी भव्य रोशनी की जाती है। जमकर बारूद उड़ाया जाता है और तलवारों से गैर भी खेला जाता है। परंपरागत पोषाकों में गांव के लोग बंदूकें दागते हुए निकलते हैं और चारभुजा मंदिर के पास इकट्ठे होते हैं। कहा जाता है कि मुगलों की आखिरी चौकियों को इस गांव के लोगों ने ही ध्वस्त किया था। इस युद्ध में गांव के कुछ लोगों की जान भी गई थी जिनकी समाधियां गांव में ही बनाई गईं। इस जीत के बाद इलाके के राजा ने यहां के लोगों को खास पहचान दी। मुगलों पर जीत की खुशी में ही हर साल होली के बाद यहां जमरा बीज मनाया जाता है। गांव के लोग सेना की तरह निकलते हैं और जमकर बारूद दागते हैं। महिलाएं वीर रस के गीत गाती हैं और जमकर आतिशबाजी भी की जाती है। मुगलों को खदेड़ने की वीरता की झलक इस दौरान देखने को मिलती है और हर कोई जोश से भर जाता है। इसी जीत के जश्न के रूप में यहां होली के बाद हर साल जमरा बीज का आयोजन होता है। यह परंपरा बेहद खतरनाक भी है लेकिन जमरा बीज के जोश के आगे यह खतरा कोई मायने नहीं रखता। ढोल की थाप, गोलियों की गूंज, तलवारों की खनक और लाठियों की टकराहट से माहौल में जोश और जुनून पैदा हो जाता है।मेनारिया ब्राह्मणों के इस गांव में जमरा बीज का उत्साह दीवाली जैसा होता है। बाहर रह रहे लोग भी इस पर्व पर गांव जरूर आते हैं।
रिपोर्ट– देवेन्द्र शर्मा
Email: sharmadev09@gmail.com
Editorial Review Note
Written by Religion World — Bhavya Srivastava is the founder of Religion World and a veteran journalist with over 18 years of experience across broadcast, print, and digital media. A founding member of the International Association of Religion Journalists (IARJ), he has spent much of his career reporting on and producing content about religion, faith, and spirituality. View full profile →.
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