भारत एक ऐसा देश है जहाँ आपको विविधता में एकता दिखेगी। यहां सबसे अधिक धर्मों को मानने वाले लोग रहते हैं। यह भारत की गंगा-जमुनी तहजीब का ही नतीजा है कि सब धर्मों को मानने वाले लोग एक-दूसरे के पर्व त्योहार में शरीक होते हैं। खासकर होली की बात ही निराली है। होली उत्साह का पर्व है। देश के लगभग प्रत्येक भाग में यह त्योहार मनाया जाता है।
हिंदू धर्म के अलावा विभिन्न समुदाय में भी होली अलग-अलग रूपों में मनाई जाती है। गुजराती, मारवाड़ी, सिख, बंगाली समुदाय में होली के ढेरों रंग देखने को मिलता है। तो आइये जानते हैं विभिन्न समुदाय में होली के रंग कैसे खिल उठते हैं-
सिख धर्म

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मारवाड़ी समाज
मारवाड़ी समाज में भी होलिका दहन से होली की शुरुआत होती है। महिलाएं सप्ताह भर पहले से इसकी तैयारी करती हैं। गोबर का बरकुल्ला बनाया जाता है। गोबर से ही होलिका बनाते हैं, जिसमें कौड़ी की आंख बनाई जाती है। भक्त प्रहलाद के प्रतीक के रूप में एक पेड़ लगाते हैं। होलिका दहन के दिन बरकुल्ला को जलाया जाता है, इसमें चना और गेहूं की बाली सेंकी जाती है। होलिका दहन के बाद राख से कौड़ी चुनने की परंपरा है। घर के सभी सदस्य होलिका दहन में शामिल होते हैं। पौराणिक प्रथा के अनुसार पूजा-पाठ की जाती है। शादी के बाद युवतियां पहली होली मायके में मनाती है और होलिका दहन में शामिल होती है। पंद्रह दिनों तक लड़की मायके में रहती है। दूसरे दिन रंग-अबीर की होली होती है।
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गुजराती समाज
गुजराती समाज में होलिका दहन के लिए तीन-चार फीट का गड्ढा बनाकर उसमें सात घड़ों में चना व धान रखकर मिट्टी से ढक दिया जाता है। उपर गोइठा रखकर होलिका दहन किया जाता है। होलिका के चारों ओर नई वधु व नवजात का प्रदक्षिणा कराया जाता है। होलिका के सात-आठ फेरे लगाए जाते हैं। फेरे लगाते हुए ज्वार (धानी) को होलिका के चारों ओर गिराया जाता है। होलिका दहन के बाद चना धान को घड़ों को बाहर निकाला जाता है, जिसे लोग प्रसाद के रूप में ग्रहण करते हैं। दूसरे दिन सुबह रंगों की होली और शाम में अबीर खेला जाता है।
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कुछ रिवाज़ ऐसे भी
पति पत्नी के अलावा किसी अन्य को रंग नहीं

आदिवासियों की इको फ्रेंडली होली
झारखंड के आदिवासी इको फ्रेंडली होली मनाते हैं। इसमें न रंगों का इस्तेमाल होता है न ही केमिकल्स का। शुद्ध व सादे पानी से होली खेली जाती है। प्रकृति के पुजारी माने जाने वाले आदिवासियों की परंपरा में ही पर्यावरण संरक्षण के सूत्र शामिल हैं। हर साल बाहा पर्व के अवसर पर पानी की होली होती है। बाहा पर्व के दूसरे दिन एक दूसरे पर पानी डाल संताल आदिवासी खुशियां मनाते हैं। आदिवासी अपनी हर जरूरत प्रकृति से पूरी करते हैं इसलिए पूजा भी प्रकृति की ही की जाती है और होली भी प्राकृतिक तौर-तरीके से पानी से खेली जाती है। रंग जैसे कृत्रिम उत्पाद से आदिवासी अब भी दूर हैं। बाहा पर वैसे तो आदिवासी समुदाय के लोग सादे पानी से एक दूसरे को भिगोते हैं, लेकिन इसके भी कई नियम हैं। मसलन, पानी रिश्ते के आधार पर ही एक दूसरे को डाला जा सकता है। जिस रिश्ते में मजाक चलता है, पानी की होली उसी के साथ खेली जा सकती है। मसलन, जीजा-साली के बीच। भाई-बहन, चाचा-भतीजा जैसे रिश्ते में एक दूसरे को पानी नहीं डाला जा सकता है।
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