राम मंदिर आंदोलन से जुड़े प्रमुख हिंदू संत

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राम मंदिर आंदोलन से जुड़े प्रमुख हिंदू संत

अयोध्या में रामलला का मंदिर बनेगा। सदियों से चल रहे विवाद में सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट फैसला दिया। अदालत ने  रामलला की विवादित 2.77 एकड़ भूमि पर भव्य राम मंदिर बनाने के लिए केन्द्र सरकार को तीन महीने में ट्रस्ट बनाकर रूपरेखा तैयार करने की बात कही है। राम मंदिर के आंदोलन में वैसे तो सबसे बड़ा मोड़ 1992 में आया जब कारसेवकों ने बाबरी मस्जिद गिरा दी थी, पर इससे पहले भी कई बार ऐसा हुआ जब रामलला को लेकर संतों ने कई बार बड़े आंदोलन किए। आइए जानते हैं इस आंदोलन में कौन-कौन से संत जुड़े और उनके लंबे प्रयास से आज सबको राम मंदिर पर एक मनमाफिक फैसला मिला है।

महंत नृत्यगोपाल दास महाराज 

श्री राम जन्भूमि न्यास के अध्यक्ष महंत नृत्यगोपाल दास महाराज आज 81 साल के हैं। मणिरामदासजी की छावनी के महंत नृत्यगोपाल दास महाराज दशकों से राम आंदोलन से जुड़े है। 1984 में दिल्ली के विज्ञान भवन में विहिप ने पहली धर्म संसद आयोजित कर अयोध्या, मथुरा और काशी के धर्मस्थलों को हिंदुओं को सौंपने का प्रस्ताव पारित किया था। इसके बाद 21 जुलाई, 1984 को अयोध्या के वाल्मीकि भवन में बैठक कर विहिप ने रामजन्मभूमि यज्ञ समिति का गठन किया। इसका उपाध्यक्ष महंत नृत्यगोपाल दास महाराज को बनाया गया। 1985 में विहिप ने मंदिर निर्माण से जुड़ी गतिविधियां फिर तेज की और श्री रामजन्मभूमि न्यास का गठन किया। विहिप ने भगवदाचार्य स्मारक सदन में बैठक कर रामजन्मभूमि का स्वामित्व श्री रामजन्मभूमि न्यास को सौंपने की मांग की। इन सभी बैठकों, प्रस्तावों और आंदोलनों में महंत नृत्यगोपाल दास महाराज सक्रिय तौर पर मौजूद रहे और सतत राम मंदिर के लिए अपनी आवाज बुलंद करते रहे।

गोरक्षपीठाधीश्वर महंत अवेद्यनाथ

गोरखपुर के गोरक्षनाथ मठ की तीन पीढ़ियां राम मंदिर आंदोलन से जुड़ी रही हैं। आज उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ गोरक्षनाथ मठ के महंत हैं, कभी यहीं से राम मंदिर आंदोलन की शुरुआत हुई थी। योगी के गुरु महंत अवैद्यनाथ और अवैद्यनाथ के गुरु महंत दिग्विजय नाथ का इस आंदोलन में खास योगदान रहा है. दिग्विजय नाथ के निधन के बाद उनके शिष्य ने आंदोलन को आगे बढ़ाया. वे श्रीराम जन्‍म भूमि मुक्‍ति यज्ञ समिति के आजीवन अध्‍यक्ष रहे। महंत अवैद्यनाथ के दिगंबर अखाड़े के महंत रामचंद्र परमहंस के साथ बेहद आत्मीय संबंध थे।

ऐसा माना जाता है कि महंत अवैद्यनाथ की देखरेख में ही विवादित ढांचा ढहाने का प्लान तैयार किया गया। विश्व हिंदू परिषद के इलाहाबाद की  1989 की धर्म संसद में महंत अवैद्यनाथ के भाषण ने ही इस आंदोलन का भूमि तैयार की।

महंत दिग्विजय नाथ

गोरक्षनाथ मठ के पहले महंत दिग्विजय नाथ ने ही पर बाबरी मस्जिद को मंदिर में बदलने करने की कल्पना की थी. ऐसा जिक्र आता है कि उन्हीं की अगुवाई में 22 दिसंबर 1949 को विवादित ढांचे के भीतर चोरी-छिपे भगवान राम की प्रतिमा रखवाई गई। उस समय हिंदू महासभा के विनायक दामोदर सावरकर के साथ दिग्विजय नाथ ही थे, जिनके हाथ में इस आंदोलन की कमान थी. हिंदू महासभा के सदस्यों ने तब अयोध्या में इस काम को अंजाम दिया था. ये दोनों लोग अखिल भारतीय रामायण महासभा के सदस्य थे।

महंत रामचंद्र परमहंस

रामचंद्र परमहंस राम जन्मभूमि न्यास के पहले अध्यक्ष भी थे, जिसे मंदिर निर्माण के लिए गठित किया गया था। 1913 को जन्मे महंत परमहंस का जन्म 1913 में हुआ और वे सन 1934 से ही अयोध्या में राम जन्मभूमि आंदोलन से जुड़े गए। वे हिंदू धर्म के दिगंबर अखाड़ा के अध्यक्ष भी रहे। 1950 में मंहत रामचंद्र परमहंस ने श्री राम की पूजा अर्चना के लिए कोर्ट अर्जी दायर की। पूजा-अर्चना बेरोक-टोक जारी रखने के लिए जिला न्यायालय के आदेश की पुष्टि कर दी। जिसके बाद ही आज तक रामलला की पूजा अर्चना रोजाना होती है। परमहंस महाराज के दृढ़ संकल्प का ही नतीजा था कि 09 नवम्बर 1989 को शिलान्यास हुआ। महंत परमहंस जी का 92 साल की उम्र में 31 जुलाई 2003 को निधन हो गया। उनका मुस्लिम पक्षकार हाशिम अंसारी से बेहद आत्मयी संबंध रहा।

स्वामी वामदेव

स्वामी वामदेव की ही अध्यक्षता में साल 1984 में अखिल भारतीय संत-सम्मेलन का आयोजन जयपुर में हुआ। इसमें राम जन्मभूमि आंदोलन को आगे बढ़ाने के लिए 15 दिनों तक लगातार 400 साधु-संतों के साथ गहन विचार-विमर्श किया गया। 30 अक्तूबर, 1990 को विश्व हिंदू परिषद ने अयोध्या में कारसेवा का आह्व‍ान किया था। स्वामी वामदेव अपनी वृद्धावस्था के बावजूद सभी बाधाओं को पार करते हुए अयोध्या पहुँचे थे। 2 नवंबर, 1990 को जब कारसेवकों पर गोली चली तो इससे स्वामी जी इतने क्रोधित हो गए थे कि उन्होंने 4 नवंबर को प्रशासन को रक्तपात की चेतावनी दे दी। उन्होंने कहा कि अगर कर्फ्यू हटाकर प्रशासन ने कारसेवकों को रामलला के दर्शन नहीं करने दिए तो बड़े पैमाने पर खून बहेगा। 6 दिसंबर, 1992 को जब विवादित ढाँचा गिराया जा रहा था, स्वामी जी कारसेवकपुरम में ही मौजूद थे। मार्च 1993 को संत सम्मेलन में उन्होंने अयोध्या के बाद काशी और मथुरा का मुद्दा भी उठाया। अप्रैल 1993 की रामनवमी को अयोध्या में 9 दिनों का अनुष्ठान भी किया। राममंदिर के लिए जीवनपर्यंत लड़ने वाले स्वामी वामदेव का 20 मार्च, 1997 को देहावसान हुआ। (साभार – युद्ध मे अयोध्या)

शंकराचार्य स्वरूपानंद सरस्वती महाराज 

शंकराचार्य स्वरूपानंद सरस्वती महाराज ने विवादित ढांचा ध्वंस के बाद रामजन्मभूमि न्यास की भूमिका नकारते हुए रामालय ट्रस्ट के गठन का एलान किया और कहा, राममंदिर निर्माण रामालय ट्रस्ट कराएगी। 1993 में वे तत्कालीन केंद्र सरकार के दूत के तौर पर रामनगरी की ओर उन्मुख हुए और रामालय ट्रस्ट की बात रखी। ट्रस्ट की ओर से प्रस्तावित राममंदिर का मॉडल भी उन्होंने प्रस्तुत किया। बीते कुंभ में शंकराचार्य ने अयोध्या जाकर राम मंदिर निर्माण की बात रखी तो हर ओर हलचल मच गई। लेकिन बाद में देश के माहौल में शांति बनाए रखने के लिए उन्होंने इसे टाल दिया।

डॉ. रामविलासदास वेदांती 

श्रीरामजन्मभूमि न्यास के वरिष्ठ सदस्य व पूर्व सांसद डॉ. रामविलास दास वेदांती ने खुलकर कई बार कहा है कि उन्होंने बाबरी मस्जिद का ढांचा गिराया है। राममंदिर आंदोलन रामजन्म भूमि न्यास व विश्व हिंदू परिषद से गहरे से जुड़े रहे डॉ. रामविलास दास वेदांती। वे दो बार अयोध्या से सांसद भी रहे।

स्वामी सत्यमित्रानंद गिरी महाराज 

पिछले साल की बात है। 2018 में अयोध्या में राम मंदिर निर्माण न होने पर देह त्याग करने का एलान करके स्वामी सत्यमित्रानंद गिरी महाराज ने सबको चिंता में ला दिया। उन्होंने तो यह तक कह दिया था कि अगर छह दिसंबर से राम मंदिर का निर्माण कार्य शुरू नहीं हुआ तो वे आमरण अनशन करेंगे। इसी साल 25 जून को ब्रह्मलीन हुए भारत माता मंदिर के संस्थापक पद्मभूषण महामंडलेश्वर स्वामी सत्यमित्रानंद गिरी ने संत समाज को साथ लेकर राम मंदिर के लिए आंदोलन खड़ा कर दिया था।

स्वामी चिन्मयानंद

1980 में स्वामी चिन्मयानंद राम जन्मभूमि मुक्ति संघर्ष समिति के राष्ट्रीय संयोजक बनें। मुमुक्षु आश्रम के जरिए उन्होने बहुत सारे संतों को राम मंदिर के आंदोलन से जोडा। लिब्राहन आयोग से बाबरी मस्जिद विध्वंस मामले में उन्हें भी दोषी माना था। वे महंत अवैद्यनाथ के करीबी रहे।

युगपुरुष स्वामी परमानंद

दशकों से राम आंदोलन से जुड़े संत युगपुरुष स्वामी परमानंद जी ने मुस्लिमों से कई बार अनुरोध किया है कि वे सहमति के आधार पर विवादित जमीन हिंदुओं को सौंपे। विहिप के विभिन्न प्रस्तावों में प्रमुखता से शामिल रहे। धर्म सम्मेलनो में वे हमेशा मुखरता से राम मंदिर की बात रखते चले आ रहे हैं।

जगद्गुरु रामानंदाचार्य स्वामी शिवरामाचार्य

दो फरवरी, 1986 को रामजन्मभूमि का ताला खुलने के साथ मंदिर निर्माण के लिए रामजन्मभूमि न्यास के रूप में स्वतंत्र संस्था का गठन किया और इसका प्रथम अध्यक्ष जगद्गुरु रामानंदाचार्य स्वामी शिवरामाचार्य को बनाया गया। 1984 में विहिप के संस्थापक महासचिव अशोक सिंहल ने प्रस्ताव रखा कि रामजन्मभूमि का स्वामित्व अविलंब जगद्गगुरु रामानंदाचार्य को सौंप दिया जाय। तब तक श्री राम जन्मभूमि न्यास का गठन नहीं हुआ था। यह मंदिर निर्माण की मांग को लेकर पहली जनसभा थी।

महंत रघुवर दास

महंत रघुवर दास पहले संत थे जिन्होनें फैजाबाद की अदालत में 1885 में बाबरी मस्जिद से सटे एक राम मंदिर के निर्माण की मांग करते हुए याचिका दायर की थी। महंत रघुबर दास ने दावा किया था कि वो जन्मस्थान अयोध्या के महंत हैं। फैज़ाबाद के जिला जज ने इस पर फैसला देते हुए मंदिर बनाने की इजाज़त देने से मना कर दिया था। न्यायाधीश ने माना था कि मस्ज़िद हिंदुओं के लिए पवित्र जगह पर बनी है, लेकिन उनका कहना था कि 350 साल बाद स्थिति में बदलाव नहीं किया जा सकता।

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