काशी से जुड़े है जैन धर्म के ये गुरु, लगती है भक्तों की भीड़

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काशी से जुड़े है जैन धर्म के ये गुरु, लगती है भक्तों की भीड़

धार्मिक नगरी काशी को जो भी काशी को पूरी तरह समझना चाहता है और सोचता है काशी बस यही है यही से काशी की नई गाथा शुरू हो जाती है. सनातन, बौद्ध के साथ ही वाराणसी जैन तीर्थ का बड़ा स्थल है. वाराणसी जैन से 24 सर्वोच्च गुरुओं में से दो की जन्म, कर्म और तप स्थली है. इसके साथ ही वाराणसी में आधा दर्जन से अधिक जैन गुरुओं के मंदिर भी है. जहां हर दिन जैन धर्म के साथ ही सैकड़ों देशी और विदेशी पर्यटक शान्ति की खोज में इन तीर्थ स्थलों पर घूमने आते है.

कौन हैं भगवान श्री सुपार्श्वनाथ

भगवान श्री सुपार्श्वनाथ जी का जन्म वाराणसी के इक्ष्वाकु वंश में ज्येष्ठ शुक्ल पक्ष की द्वादशी तिथि को विशाखा नक्षत्र में हुआ था. इनकी माता का नाम पृथ्वी देवी और पिता का नाम राजा प्रतिष्ठ था. सबसे पहले बात जैन धर्म के सातवें तीर्थंकर भगवान सुपार्श्वनाथ की. शहर के भदैनीघाट से सटे जैन घाट के ठीक ऊपर जैन धर्म के सातवें तीर्थंकर भगवान सुपार्श्वनाथ का जन्म स्थान है. यही भगवन सुपार्श्वनाथ की जन्म , कर्म और तप स्थली है. ज्येष्ठ मास की त्रयोदशी तिथि को वाराणसी में ही इन्होंने दीक्षा प्राप्ति की और दीक्षा प्राप्ति के 2 दिन बाद इन्होंने खीर से प्रथम पारण किया. दीक्षा प्राप्ति के पश्चात 9 महीने तक कठोर तप करने के बाद फाल्गुन कृष्ण पक्ष सप्तमी को धर्म नगरी वाराणसी में ही शिरीष वृक्ष के नीचे इन्हें कैवल्यज्ञान की प्राप्ति हुई थी. आज भी यहाँ आपको उनके जन्म कर्म से जुडी गाथा की चित्र देखने को मिलेगी.

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इसके अलावा शहर के भेलुपुर इलाके में तेईसवें तीर्थंकर भगवान पार्श्वनाथ की जन्मभूमि है. यही वो जगह है जहाँ जैन धर्म के 23 वें तीर्थांकर की जन्म , कर्म और तप भूमि है. जो आज जैन धर्मावलम्बियों के लिए बड़ा स्थल है. यहां आज जैन धर्म के 23 वें तीर्थांकर भव्य मंदिर है इस मंदिर में दर्शन के लिए हर रोज ढेरो श्रद्धालु आते है. इसके अलावा शहर में अलग अलग जगहों पर अन्य कई जैन धर्म गुरु के मंदिर है.

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सातवें तीर्थंकर भगवान सुपार्श्वनाथ और 23 वें तीर्थंकर भगवान पार्श्वनाथ के अलावा सिंहपुरी भी जैन धर्म के लिए बड़ा तीर्थ स्थल है जो बनारस से 7 मील दूर है इसके अलावा यहां श्रेयांसनाथ भगवान का मंदिर भी है जो सारनाथ से 10 मील दूर है माना जाता है श्रेयांसनाथ भगवान के गर्भ, जन्म, तप से तीन कल्याणक हुए.

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