ताजमहल के राज : जानिए कई अनसुने किस्से और सच्चाईयां

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जानिए किस पर रखी गयी ताजमहल की नींव..यमुना के बिना ताजमहल का नहीं होता वजूद..

ताज महल पर पिछले कुछ दिनों से बयानबाजी चल रही है. ताज महल को तेजो महालय बताने की होड़ सी लगी हुई है। पर प्रेम की इस यादगार निशानी को लेकर इतने किस्से हैं कि ये खुद ब खुद इनसे ही एक रहस्यमय इमारत बन जाती है। इतिहासकार राजकिशोर राजे ने ताजमहल से जुड़े कुछ तथ्यों की जानकारी दी थी, जो रिलिजन वर्ल्ड आपके साथ साझा कर रहा है।

इतिहासकार राजकिशोर राजे के अनुसार ताजमहल 50 कुंओं के ऊपर बना है। यही नहीं, शाहजहां से नाराज होकर मजदूरों ने जानबूझकर ताज में एक बड़ी गलती की। कुछ ऐेसे ही रोचक किस्सों को आइए जानते हैं।

ताजमहल का आधार लकड़ी पर

ताजमहल का आधार एक ऐसी लकड़ी पर बना हुआ है, जिसे मजबूत बनाए रखने के लिए नमीं की जरूरत होती है, ये काम पास में बहने वाली यमुना नदी करती है।

शिखर पर सोने का कलश

ताज महल के निर्माण के समय बादशाह शाहजहां ने इसके शिखर पर सोने का कलश लगवाया था. इसकी लंबाई 30 फीट 6 इंच लंबी थी. कलश में 40 हजार तोला (466 किलोग्राम) सोना लगा था. ताज महल का कलश 3 बार बदला गया. आगरा के किले को साल 1803 में हथियाने के बाद से ही अंग्रेजों की नजर ताज महल पर थी।

ताजमहल में है मेहमानखाना

ताज महल के मुख्‍य स्‍मारक के एक तरफ लाल रंग की मस्जिद है और दूसरी तरफ मेहमानखाना. ब्रिटिश शासन के दौरान मुख्‍य स्‍मारक के बगल का मेहमानखाना किराए पर दिया जाता था. इसमें नवविवाहित अंग्रेजी जोड़े आते थे. उस वक्त इसका किराया काफी महंगा था. ताज महल के मेहमानखाने की पहली मंजिल पर पहले दीवारें बंद नहीं थीं. अंग्रेजों के समय में इसमें दीवारें जोड़ी गईं और उन्हें कमरों में तब्‍दील कर दिया गया था. इसे अंदर से बेहद खूबसूरत बनाया गया था.

कब्र के ऊपर लैंप

ताज महल में शाहजहां और मुमताज की कब्र के ठीक ऊपर खूबसूरत लैंप टंगा हुआ है. ये लैंप मिस्त्र के सुल्‍तान बेवर्सी द्वि‍तीय की मस्जिद के लैंप की नकल है. इसे तैयार करवाने में 108 साल पहले 15 हजार रुपए खर्च हुए थे. इससे पहले यहां धुएं वाला लैंप जलता था. इससे पूरे मकबरे में धुआं भर जाता था. तत्‍कालीन ब्रिटिश वायसराय लॉर्ड कर्जन जब 18 अप्रैल, 1902 को आगरा आए थे. उस वक्‍त जब वह मकबरे में गए तो वहां धुएं से उन्‍हें काफी परेशानी हुई.

यह भी पढ़ें – ताजमहल : तेजो महालय या प्रेम की निशानी : किसने सबसे पहले की तेजो महालय की बात?

भूत-जिन्न नहीं होने दे रहे थे ताजमहल का निर्माण

ऐसा कहा जाता है कि ताज महल के निर्माण के वक्‍त भूत-जिन्‍न नींव को ध्‍वस्‍त कर देते थे. वो ताज की बुनियाद रखने नहीं देते थे और करीगरों को डराकर भगा दिया करते थे. उन्हें वहां से भगाने के लिए शाहजहां को इमामों ने अरब में बुखारा शहर के पीर हजरत अहमद बुखारी को बुलाने का सुझाव दिया था. बादशाह के बुलावे पर पीर अपने साथ भाई सैय्यद जलाल बुखारी शाह, सैय्यद अमजद बुखारी शाह और सैय्यद लाल बुखारी शाह और सैंकड़ों सहायकों के साथ आगरा आए. शाहजहां सभी पीर बाबाओं को लेने खुद गए थे. चारों पीर बंधुओं ने आगरा में ताज महल के नींव परिसर पर पहुंचकर कुरान और कलमों का पाठ करवाया था. इसके बाद शाहजहां के हाथों नींव रखवाकर ताज महल को बनवाने का काम शुरू करवाया गया. तब कहीं जाकर मोहब्बत की ये निशानी बनकर तैयार हो सकी. इन चारों पीर भाइयों की मजार ताज महल के चारों तरफ बनी हैं. माना जाता है कि जब तक ये मजार यहां हैं ताज महल को कभी कुछ नहीं होगा.

मुमताज के मकबरे पर पानी की बूंदें

मुमताज के मकबरे की छत की छेद से टपकते पानी की बूंद के पीछे कई कहानियां फेमस हैं, जिसमें से एक ये है कि जब शाहजहां ने सभी मज़दूरों के हाथ काट दिए जाने की घोषणा की ताकि वे कोई और ऐसी खूबसूरत इमारत न बना सकें तो मजदूरों ने इसमें एक ऐसी कमी छोड़ दी, जिससे शाहजहां का खूबसूरत सपना पूरा न हो सके.

ताजमहल के चारो ओर बांस का घेरा

द्वितीय विश्व युद्ध, 1971 भारत-पाक युद्ध और 9/11 के बाद इस भव्य इमारत की सुरक्षा के लिए ASI ने ताजमहल के चारों ओर बांस का सुरक्षा घेरा बना कर उसे हरे रंग की चादर से ढक दिया था. इससे ताजमहल दुश्मनों को नजर न आए और इसे किसी प्रकार की क्षति से बचाया जा सके.

एक साथ चलते हैं सारे फव्वारे

ताज महल में लगा कोई भी फव्वारा किसी पाइप से नहीं जुड़ा हुआ है, बल्कि हर फव्वारे के नीचे एक तांबे का टैंक बना हुआ है। जो एक ही समय पर भरता है और दबाव बनने पर एक साथ ही काम करता हैं।

जब ताजमहल बेच दिया गया

आपको ये जानकर हैरानी होगी कि अंग्रेजों ने अपने फायदे के लिए मोहब्बत की इस निशानी को बेच दिया था. वो ताज महल तोड़कर इसके कीमती पत्थरों को ब्रिटेन लेकर जाना चाहते थे. बाकी संगमरमर के पत्थरों को बेचकर सरकारी खजाना भरने की फिराक में थे. साल 1828 में तत्‍कालीन गवर्नर जनरल लार्ड विलियम बैंटिक ने कोलकाता के अखबार में टेंडर भी जारी किया था.

नीलामी में रखी गई थी शर्त

ब्रिटिश हुकूमत के समय राजधानी कोलकाता हुआ करती थी. तब एक अंग्रेजी दैनिक अखबार में 26 जुलाई, 1831 को ताज महल को बेचने की एक खबर छपी. उस समय ताज महल को मथुरा के सेठ लक्ष्‍मीचंद ने सात लाख की बोली लगाकर इसे खरीद लिया था. नीलामी में ये भी शर्त थी कि इसे तोड़कर इसके खूबसूरत पत्थरों को अंग्रेजों को सौंपना होगा. सेठ का परिवार आज भी मथुरा में रहता है.

रद्द करनी पड़ी ताज महल की नीलामी

इतिहासकार प्रो. रामनाथ ने ‘दि ताज महल’ किताब में इस घटना का विवरण दिया है. उसके मुताबिक, ताज महल के पुराने सेवादारों को अंग्रेजी हुकूमत के विनाशकारी आदेश की भनक लग गई थी. खबर आग की तरह फैली और लंदन तक चली गई. लंदन में एसेंबली में नीलामी पर सवाल उठे. तब गवर्नर जनरल लॉर्ड विलियम बैंटिक को ताज महल की नीलामी रद्द करनी पड़ी.

क़ुतुब मीनार से ऊंची इमारत

कुतुब मीनार को देश की सबसे ऊंची इमारत के तौर पर जाना जाता है लेकिन इसकी ऊंचाई भी ताजमहल के सामने छोटी पड़ जाती है. सरकारी आंकड़ो के मुताबिक ताजमहल, कुतुब मीनार से 5 फीट ज़्यादा लंबा है.

ताजमहल पर 32 मिलियन खर्चा

शाहजहां ने जब ताजमहल बनवाया था, तो उस पर करीब 32 मिलियन खर्च हुए थे. जिसकी कीमत आज 1,062,834,098 USD (करीब 68 अरब 52 करोड़ 9 लाख 14 हजार 298 रुपए) हैं.

जब ताजमहल हुआ गायब

8 नवंबर 2000 का दिन ताजमहल को देखने वालों के लिए बड़ा ही शॉक करने वाला था. जादूगर पी.सी. सरकार जूनियर ने ऑप्टिकल साइंस के जरिए ताजमहल को गायब करने का भ्रम पैदा कर दिया था.

काले ताजमहल की ख्वाहिश

शाहजहां की एक ख्वाहिश ये भी थी कि जैसे उसने अपनी बीवी के लिए सफेद ताजमहल बनाया था. वैसा ही एक काला ताजमहल खुद के लिए बनवा सके. लेकिन शाहजहां को जब उसके बेटे औरंगजेब ने कैद कर लिया तो उसका ये सपना बस सपना ही रह गया.

ताजमहल के साथ फर्स्ट सेल्फी

आज हम सब सेल्फी के दीवाने हैं लेकिन George Harrison नाम के इस व्यक्ति ने Fish Eye Lense की मदद से उस समय ही ले ली थी, जब सेल्फी का दौर ही नहीं था. मतलब ताजमहल के साथ पहली सेल्फी George Harrison ने ली थी.

ताजमहल भी बदलता है रंग

ये बात जरूर हैरान करने वाली है लेकिन ताजमहल का रंग भी बदलता है. दिन के अलग-अलग पहर के हिसाब से ताज भी अपना रंग बदलता रहता है. सुबह देखने पर ताज गुलाबी दिखता है, शाम को दूधिया सफेद और चांदनी रात में सुनहरा दिखता है. ये सब सूर्य की रोशनी सफेद संगमरमर पर पड़ने से होता है.

असली कब्रों पर अल्लाह के 99 नाम

तहखाने में असली कब्र मौजूद है, जिसका दरवाजा साल में सिर्फ एक बार खोला जाता है. इसके ऊपर की गई नक्काशी नकली कब्र की तुलना में बेहद साधारण है. तहखाने में बनी मुमताज महल की असली कब्र पर अल्लाह के 99 नाम खुदे हुए हैं. इनमें से कुछ हैं, ‘ओ नीतिवान, ओ भव्य, ओ राजसी, ओ अनुपम…’वहीं, शाहजहां की कब्र पर खुदा है, ‘उसने हिजरी के 1076 साल में रज्जब के महीने की छब्बीसवीं तिथि को इस संसार से नित्यता के प्रांगण की यात्रा की.’

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