क्या देवकीनंदन ठाकुर को “सवर्ण बनाम दलित पर आंदोलन” करना चाहिए ?

क्या भागवताचार्य देवकीनंदन ठाकुरजी की राजनीति में रूचि है ? क्या वे कथावाचन के अलावा जटिल राजनैतिक विषयों पर परिपक्व हैं? क्या सवर्णों बनाम दलित के बहुत ही गंभीर विषय पर धर्मगुरूओं को आगे आने की जरूरत है ? ऐसे बहुत से सवाल समाज में आज घूम रहे है। दरअसल बीते दिनों में हमारी एससीएसटी एक्ट को लेकर सुप्रीम कोर्ट और सरकार के कदमों के बाद आंदोलनों की बाढ़ सी लग गई है। एक ओर जहां दलितों ने पहले उच्चतम न्यायालय की टिप्पणी के बाद देश को हिला दिया वहीं सरकार की एससीएसटी एक्ट पर “ज्यों की त्यों” नीति ने बाद सवर्ण नाराज हो गए।
तो क्या धर्म से जुड़े लोगों को समाज में सदियों से चली आ रही एक गंभीर समस्या पर टीका टिप्पणी करनी चाहिए ? अगर आदर्श स्थिति की बात करें तो बिल्कुल बोलना चाहिए, लेकिन जब समाज में किसी बंटवारे की वजह से जटिलता और राजनैतिक पोषण की स्थिति हो, तो जाहिर है किसी भी वर्ग पर सोच को जाहिर करने से अगला वर्ग नाराज हो जाता है। शायद इसी वजह से सालों से एक चुभने वाली शांति समाज में मौजूद रही। राजनीति और धर्म को दो ध्रुव मानकर इसे अलग-अलग चलने की सलाह हर ओर से आती रहती है। दोनों से एक साथ आने से लाभ और अवसर भुनाने की बात समाज में गहरी बस चुकी है।
भागवताचार्य देवकीनंदन ठाकुर ने ग्वालियर में जब करणी सेना, क्षत्रिय महासभा, ब्राह्मण महासभा, समेत ओबीसी समाज के लोगों द्वारा आयोजित सम्मेलन में हिस्सा लिया तो बात दूर तलक चली गई। वहीं से उनके आह्वान ने हेडलाइन का रूप ले लिया। “हम सरकार को 2 माह का समय दे रहे हैं। सरकार 2 माह में इस एक्ट में संशोधन कर ले, नहीं तो 2018-19 का चुनावों में हम उन्हें बता देंगे, जनता की ताकत क्या होती हैं” बात केवल इतनी भर नहीं थी। समाज में दोनों वर्गों में गुस्सा कई वजहों से सालों या कहें कि सदियों से जगह ले चुका है। आरक्षण को लेकर समाज पिछले कई सालों में बहस को तैयार नहीं हो पाया है।
कथावाचन में कृष्ण के कुरूक्षेत्र के उवाच को जब कलियुग में यथार्थ में चरितार्थ करने की कोशिश देवकीनंदन ठाकुर ने की, तो सोशल मीडिया से लेकर समाचार जगत में हलचल सी हो गई। हर न्यूज एंकर ने पूछा कि “आपको क्या पड़ी है, कथा करिए महाराज”। लेकिन धर्म की भूली हुई भूमिका को पेश करने के लिए देवकीनंदन ठाकुर ने मानो कमर कस ली थी। वो शायद समानता की बात को कहना चाह रहे थे, पर मायने अलग ही देखे गए।
जाहिर है समाज में कई ऐसे मुद्दे हैं जिनपर कोई भी बोलना नहीं चाहता, पर इससे किसी भी समस्या को हल नहीं किया जा सकता है। एक धर्मगुरू की भूमिका समाज को दिशा देने की रहती है। वो अपने कार्यक्रमों, सत्संगों और पंडालों में इस बात का आह्नान हमेशा करता है कि मानवता प्रथम है। राजैनितक कारणों से पिछले कुछ सालों मे धर्म और राजनीति के बीच रेखा महीन सी हो गई है और बहुत सारी धार्मिक आस्थाओं को राजनीतिक नजरों से देखा जाना स्वाभाविक व्यवहार हो गया है।
देवकीनंदन ठाकुर एक भागवतकथा वाचक है जो हिंदू धर्म के कई मुद्दों पर खुलकर बोलते रहे हैं, वे इलाहाबाद को प्रयागराज कहलवाने के लिए कई मंचों पर बोल चुके हैं और इसे सांस्कृतिक आतंकवाद ठहरा चुके हैं। गाय, गंगा, और गायत्री की बात समय समय पर करते रहते है। लेकिन इस बार मामला थोड़ा अलग है, समाज में जाति को लेकर एक जड़ सोच का विकास हो चुका है, जिसे राजनीति ने पोषित किया है। ऐसे में हाथ जलने की पूरी संभावना है। आगरा में उनकी थोड़ी देर की गिरफ्तारी एक संदेश भी थी और खतरे की आवाज भी। प्रेस कॉंफ्रेस की उनकी कोशिश पर 250 पुलिसवाले तैनात थे। जाहिर है सर्वण बनाम दलित के उनकी बयानबाजी से हर कोई खुश नहीं है। हालांकि बाद में उन्होंने अखंड भारत मिशन का निर्माण किया, जिसे देश में समानता स्थापित करने की मूल वजह से बनाया गया।
एक धर्मगुरू को क्या करना चाहिए और क्या नहीं इसके नैतिक नियम तो धर्म ने ही बताए हैं, पर उसका सामाजिक व्यवहार और सामाजिक मुद्दों पर राय क्या हो, इसे लेकर समाज में अभी भी जागरूकता का अभाव है। किसी एक पद पर बैठकर दूसरे की बात करना कई बार अवसरवादिता की तरह देखा जाता है। मीडिया और सोशल मीडिया के दौर में हर बात और कदम के सही और गलत दोनों अर्थ सामने आते हैं। ऐसे में धर्म का प्रचार प्रसार, खासकर एक विशेष धर्म में करने वालों के सामने एक खास दिक्कत है कि वे किसी भी बात को कहकर अपने लिए समस्या मोल लें या नहीं। भले ही वो बात सही हो। इसलिए हम कई बार धर्मगुरुओं को नैतिक आधार पर उनकी टीका टिप्पणी के लिए आगे आने की अपेक्षा नहीं रखते है। पर जब कोई अपनी स्पष्टता के साथ बोलने लगे, तो समाज में पक्ष-विपक्ष का बनना शुरू हो जाता है। आज देवकीनंदन ठाकुर के लिए और उनके विरोध में काफी कुछ हो रहा है, पर देखना होगा कि क्या इस आंदोलन से कुछ प्राप्त होगा, या ये चुनाव के पहले ही शांत हो जाएगा।
Editorial Review Note
Written by Religion World — Bhavya Srivastava is the founder of Religion World and a veteran journalist with over 18 years of experience across broadcast, print, and digital media. A founding member of the International Association of Religion Journalists (IARJ), he has spent much of his career reporting on and producing content about religion, faith, and spirituality. View full profile →.
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