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कोरोना में भी क्या असरकारक है यज्ञोपैथी ? – डॉ प्रणव पंड्या

कोरोना में भी क्या असरकारक है यज्ञोपैथी ? – डॉ प्रणव पंड्या

प्राचीन भारतीय संस्कृति में दिनचर्या का शुभारंभ हवन, यत्र, अग्निहोत्र आदि से होता था। तपस्वी ऋषि-मुनियों से लेकर सद्गगृहस्थों, वटुक-ब्रह्मचारियों तक नित्य प्रति यज्ञ किया करते थे। प्रातः सायं यज्ञ करके संसार के विविध रोगों का निवारण करते थे। ब्रह्मवर्चस शोधसंस्थान की किताब ‘यज्ञ चिकित्सा’ में बताया गया है कि यज्ञों का वैज्ञानिक आधार है। यज्ञों के माध्यम से शारीरिक, मानसिक और आध्यात्मिक लाभ उठाया जा सकता है और विभिन्न बीमारियों से छुटकारा भी पाया जा सकता है। इतना ही नहीं संपूर्ण वैज्ञानिक एवं वैदिक विधि से किए गए यज्ञ से वृक्ष-वनस्पतियों की अभिवृद्धि भी की जा सकती है। यज्ञ अनुसंधान वैज्ञानिक अध्यात्मवाद की एक शोध शाखा है।

शारीरिक रोगों के साथ ही मानसिक रोगों मनोविकृतियों से उत्पन्न विपन्नता से छुटकारा पाने के लिए यज्ञ चिकित्सा से बढ़कर अन्य कोई उपयुक्त उपाय-उपचार नहीं है। विविध अध्ययन, अनुसंधानों एवं प्रयोग परीक्षणों द्वारा ऋषि प्रणीत यह तथ्य अब सुनिश्चित होता जा रहा है।

यज्ञोपैथी

यह एक समग्र चिकित्सा की विशुद्ध वैज्ञानिक पद्धति है, जो एलोपैथी, होम्योपैथी आदि की तरह सफल सिद्ध हुई है। ब्रह्मवर्चस ने लिखा है, ‘भिन्न भिन्न रोगों के लिए विशेष प्रकार की हवन सामग्री प्रयुक्त करने पर उनके जो परिणाम सामने आए हैं, वे बहुत ही उत्साहजनक हैं। यज्ञोपैथी में इस बात का विशेष ध्यान रका गया है कि आयुर्वेद शास्त्रों में जिस रोग की जो औषधि बताई गई है, उसे खाने के साथ ही उन वनौषधियों को पलाश, उदुम्बर, आम, पीपल आदि की समिधाओं के साथ नियमित रूप से हवन किया जाता रहे, तो कम समय में अधिक लाभ मिलता है।

भैषज यज्ञ – आरोग्य वृद्धि एवं रोग निवारण के लिए किए गए यज्ञों को ‘भैषज्ञ यज्ञ’ कहते हैं। इसके तहत रोगी के शरीर में कौन सी व्याधि बढ़ी हुई है और कौन से तत्व घट या बढ़ गए हैंॽ उनकी पूर्ति करके शरीर की धातुओं का संतुलन ठीक करने के लिए किन औषधियों का आवश्यकता हैॽ ऐसा निर्णय करके वनौषधियों की हवन सामग्री बनाकर उसी प्रकृति के वेद मंत्रों से आहुतियां दिलाकर हवन कराया जाता है। यज्ञ के धुएं में रहने और उसी वायु से सुवासित जल, वायु एवं आहार का सेवन करने से रोगी को बड़ा आराम मिलता है।

कोरोना वायरस से बचने के लिए इन ओषधियों से बनाए हवन सामग्री – संक्रमणजन्य रोगों में प्रयुक्त होने वाली विशेष हवन सामग्री:-

अगर  तगर, जटामांसी, हाउबेर Hauber (Juniperus Communis), नीम पत्ती या छाल, तुलसी, गिलोय, कालमेघ, भुई आंवला, जायफल, जावित्री, आज्ञाघास, कडवी बछ, नागरमोथा, सुगध बाला, लौंग, कपूर, कपूर तुलसी, देवदारु, शीतल चीनी, सफेद चंदन, दारुहल्दी। उपरोक्त सब सामग्री को समान मात्रा में मिला कर उपयोग करें। उपरोक्त सूची में से अधिकतम सामग्री आसानी से उपलब्ध है जिसका औषधीयुक्त हवन सामग्री बनाने में उपयोग किया जा सकता है।

औषधीय हवन सामग्री जिसमें कपूर, गौघृत अवश्य हो, को लेकर गायत्री एवं महामृत्युंजय मंत्र की आहुति अवश्य दी जाये। इस हेतु शांतिकुंज से अनुशंसित हवन सामग्री की जानकारी दी जा रही है, इसे स्थानीय स्तर पर बना सकते हैं। आवश्यकता पडने पर उपलब्धता आधार पर इसे शांतिकुंज से भी प्राप्त किया जा सकता है। यदि यह सामग्री न भी मिले तो सामान्य हवन सामग्री का प्रयोग करें।इससे घर में विषाणु नष्ट होंगे, रोग प्रतिरोधक क्षमता बढेगी एवं सकारात्मकता बढेगी

अन्य विधियों से ज्यादा असरकारक

यज्ञ चिकित्सा के जानकार कहते हैं कि वे इसके सूक्ष्म परमाणु सीधे रक्त प्रवाह में पहुंचते हैं और पाचन शक्ति पर बोझ नहीं पड़ता जबकि मुख द्वारा ज्यादा पौष्टिक पदार्थ पाचन प्रणाली को लड़खड़ा सकते हैं। मुख द्वारा दी गई औषधि का कुछ अंश रक्त में जाकर शेष मल-मूत्र मार्ग से बाहर निकलजाता है, इस प्रकार कुछ ही मांग इच्छित अवयवों तक पहुंचता है। इंजेक्शन द्वारा दी गई औषधि ज्यादा असर करती है लेकिन इसकी भी सीमाएं हैं। कई दवाएं इन्हेलेशन थेरेपी से दी जाती हैं, ये जल्दी असर करती है। इसी तरह यज्ञोपैथी में फ्यूमीगेशन द्वारा धुएं में मौजूद दवाइयां श्वास मार्ग से एवं रोमकूपों से सीधे शरीर में प्रविष्ट करती है। रोगों के आधार पर वनौषधियों, जड़ियों, समधि सामग्री एवं हवनकुण्ड के आकार आदि का निर्णय लिया जाता है।

Post By Religion World