बौद्ध धर्म : जानिये क्या है बौद्ध धर्म के सिद्धान्त

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बौद्ध धर्म: जानिये क्या है बौद्ध धर्म के सिद्धान्त

विद्वानों ने बौद्ध ग्रन्थों के आधार पर बौद्ध धर्म के सिद्धान्तों एवं दार्शनिक पक्ष की विवेचना की है. इनके आधार पर बौद्ध धर्म के सिद्धान्तों की चर्चा की जा सकती है.

कारण सिद्धान्त – महात्मा बुद्ध की मान्यता थी कि प्रत्येक कार्य एक कारण पर निर्भर होता है, अर्थात् संसार का कोई भी कार्य अकारण नहीं है. सृष्टि की समस्त घटनायें एक क्रम में हो रही हैं तथा एक घटना अथवा कार्य दूसरे कार्य के लिए कारण बन जाता है. इसे प्रतीत्य समुत्पाद (पतिच्च समुत्पाद) मध्यमा प्रतिपदा का नाम दिया गया. यह विचार आस्तिकता (शाश्वतता का सिद्धान्त) एवं नास्तिकता (उच्छेदवाद) के बीच का मार्ग हैं. आस्तिकता के नियम के अनुसार कुछ वस्तुयें नित्य हैं. उनका कोई आदि या अन्त नहीं है. ये किसी कारण का परिणाम नहीं है, आत्मा एवं ब्रह्म इसी कोटि में आते हैं. दूसरी ओर नास्तिकतावादी, चार्वाक एवं लोकायत यह मानते हैं कि वस्तुओं के नष्ट हो जाने पर कुछ भी शेष नहीं रहता. बुद्ध ने दोनों मतों को छोड़कर मध्यम मार्ग अपनाया जिसके अनुसार वस्तुओं का अस्तित्व है किन्तु वे नित्य नहीं हैं. उनकी उत्पत्ति कुछ कारणों पर निर्भर है. वस्तुओं का पूर्ण विनाश नहीं होता बल्कि उनका परिणाम शेष रह जाता है.

बुद्ध के हृदय में ज्ञान प्राप्ति से पूर्व अनेक शकायें उत्पन्न हुई थीं. उन्होंने विचार किया कि मनुष्य ऐसी दु:खपूर्ण स्थिति में क्यों है, जन्म, मृत्यु एवं दु:ख से मुक्ति का मार्ग, अन्तत: उन्हें ज्ञात हुआ जिसे आर्य सत्य चतुष्टय अथवा चत्वारि आर्य सत्यानि कहा गया. चार आर्य सत्य बौद्ध धर्म के सिद्धान्तों की आधारशिला हैं- दु:ख, दु:ख समुदाय, दु:ख निरोध एवं दु:ख निरोध का मार्ग.

दु:ख – महात्मा बुद्ध सम्पूर्ण संसार को दु:खमय मानकर चलते हैं. जरा, रोग, मृत्यु के दु:खमय दृश्यों को देखकर ही सिद्धार्थ ने सन्यास धारण किया था. ज्ञान प्राप्ति के बाद वे इस निष्कर्ष पर पहुंचे कि मानव जाति दु:ख से ग्रसित है. जरा, रोग, मृत्यु, अप्रिय का संयोग, प्रिय का वियोग, इच्छित वस्तु की अप्राप्ति आदि सभी आसक्ति से उत्पन्न होते हैं, अत: सभी दु:ख हैं. क्षणिक विषयों में आसक्ति ही पुनर्जन्म तथा बन्धन का कारण है, सांसारिक सुखों को यथार्थ सुख समझना केवल अदूरदर्शिता है. मनुष्य मिथ्या धारणा से अपना तादाम्य अपने शरीर या मन से कर लेता है जिसके परिणामस्वरूप उसे विविध प्रकार के भौतिक सुखों की तृष्णा होती है. तृष्णा के वशीभूत होकर मनुष्य अहंभाव से विभिन्न प्रकार के स्वार्थपूर्ण कार्य करता है एवं तृष्णा सम्पूर्ति न होने पर दु:ख का अनुभव करता है. बुद्ध ने अपने शिष्यों को एक उदाहरण देते हुए बताया था कि दु:ख की इस व्यापक वेदना से जितने आंसू बहाये हैं वे ही अधिक हैं, इन चारों समुद्रों का जल नहीं.

दु:ख समुदाय – इस सन्दर्भ में सवाल यह उठता है कि दु:ख का कारण क्या है. बुद्ध ने प्रतीत्य समुत्पाद के माध्यम से दु:ख का कारण जानने का प्रयास किया. सिद्धान्त के अनुसार सभी वस्तुएँ कारणों एवं परिस्थितियों पर निर्भर करती हैं अत: दु:ख का भी कारण है. दु:ख अथवा जरा, मृत्यु तब ही संभव है जबकि जन्म (शरीर धारण) हो अर्थात् दु:ख जन्म (या जाति) पर निर्भर है. जन्म का होना तब ही संभव माना गया जबकि जन्म से पूर्व कोई अस्तित्व हो जिसे  भव (भाव) नाम दिया है. कहा जा सकता है कि भव का कारण है. भव से अभिप्राय कर्म से है जिसके कारण पुनर्जन्म होता है. प्रक्रिया में वह कौन सा कारण है जिसके होने से भव की उत्पत्ति होती है. भव का आधार  उपादान  माना गया. यदि मनुष्य कामना के वशीभूत होकर कर्म करे तो जन्म नहीं होता अर्थात् सकाम कर्म अथवा मोह को उपादान नाम दिया गया.  उपादान का हेतु तृष्णा (वासना) को माना है. यह उत्कृष्ट इच्छा करना कि जिन भोड़ों से हमें परितृप्ति होती है उनसे हमारा कभी वियोग न हो, इसको तृष्णा कहा गया. रूप, शब्द, स्पर्श, रस एवं गंध से तृष्णा सम्बद्ध होती है. तृष्णा का आधार वेदना है. पूर्व विषय भोग या सहानुभूति से हमारी तृष्णा जाग उठती है अर्थात् इन्द्रिय-जन्य अनुभूति को वेदना की संज्ञा दी गई. वेदना की अनुभूति के लिए ज्ञानेन्द्रिय का सम्पर्क आवश्यक है. ज्ञानेन्द्रिय के सम्पर्क (इन्द्रिय जन्य चेतना) को स्पर्श कहा गया. इद्रिय जन्य चेतना के अभाव में अनुभूति संभव नहीं है. स्पर्श हेतु पाँच इन्द्रिय एवं मन आवश्यक है. इसे षडायतन कहकर सम्बोधित किया है. इन छ: आयतनों (षडायतन) के लिए बुद्धि (या मन) एवं शरीर होना आवश्यक है. षडचेतनायें मनुष्य के शरीर एवं बुद्धि के समन्वय के कारण उत्पन्न हुई, मन:स्थिति पर आश्रित हैं. इसी मानस् तात्विक स्थिति को नामरूप कहा गया है जो शरीर एवं बुद्धि के साथ कार्य करने की शक्ति को स्पष्ट करता है. चेतना के बिना नामरूप नहीं हो सकते अर्थात् चेतना (विज्ञान) ही नामरूप का हेतु है. चेतना से तात्पर्य किसी वस्तु विशेष के बारे में सोचने वाली विचारधारा है और चेतना का आधार संस्कार माना गया. कर्म के अनुसार निर्मित संस्कार से विज्ञान या चेतना संभव होती है. संस्कार की उत्पत्ति के विषय में बुद्ध की धारणा थी कि इसका एकमात्र कारण अविद्या (अविज्जा) है. क्षणिक विषयों को सुखद समझ लेना ही अविद्या है. अविद्या के नाश से ही संस्कार नष्ट होंगे. इसी क्रम से मनुष्य की जन्म, मृत्यु या दु:ख से मुक्ति संभव मानी गई.

दुःख निरोध – प्रतीत्य समुत्पाद प्रक्रिया के अन्तर्गत यदि दु:ख के कारण को नष्ट कर दिया जाये तो दु:ख निरोध संभव है. अविद्या के निरोध से दु:ख को नष्ट किया जा सकता है क्योंकि अविद्या से ही तृष्णा उत्पन्न होती है और तृष्णा जिसके फलस्वरूप पुनर्जन्म होता है एवं नवीन चेष्टायें उत्पन्न होती हैं. इसको संसार का दुश्चक्र (भव चक्र) कहा गया.

दु:ख निरोध का मार्ग – संसार में दु:ख है, दु:ख समुदाय है. उसी प्रकार दु:ख से मुक्ति का मार्ग भी है. अविद्या एवं तृष्णा से उत्पन्न मनोवृत्तियों के निरोध का विधान भी है. तृष्णा से ही आसक्ति तथा राग का उद्भव होता है. रूप, शब्द, गंध, रस तथा मानसिक तर्क-वितर्क आसक्ति के मौलिक कारण हैं. दु:ख के निवारण के लिए तृष्णा का उन्मूलन आवश्यक है. धम्मपद में कहा गया है कि तृष्णा से शोक उत्पन्न होता है, भय की बात ही क्या. बुद्ध ने भिक्षुओं को निर्देशित किया है कि रूप, वेदना, संज्ञा, संस्कार एवं विज्ञान का निरोध ही दु:ख का निरोध है. कहा गया है कि इच्छाओं का परित्याग ही मुक्ति का मार्ग है एवं इच्छाओं का परित्याग अष्टांगिक मार्ग द्वारा किया जा सकता है. अष्टांगिक मार्ग को दु:ख निरोधगामिनी प्रतिपदा भी कहा जाता है. अष्टांगिक मार्ग को तीन स्कन्ध में विभक्त किया जाता है – प्रथम प्रज्ञा स्कन्ध में सम्यक् दृष्टि, सम्यक् संकल्प एवं सम्यक् वाक सम्मिलित किये गये हैं. सम्यक् कर्मान्त, सम्यक् आजीव शील स्कन्ध के अन्तर्गत रखे गये हैं. समाधि स्कन्ध में सम्यक् व्यायाम, सम्यक् स्मृति एवं सम्यक् समाधि आते हैं.

सत्य एवं असत्य तथा सदाचार एवं दुराचार का विवेक द्वारा चार आर्य सत्यों का सही परीक्षण करना सम्यक् दृष्टि है. इसे नीर-क्षीर विवेक भी कहा जा सकता है. अविद्या के कारण मिथ्या दृष्टि उत्पन्न हो जाती है जिसे समाप्त किया जाना होता है. सब वस्तुएँ अनित्य हैं, इस तरह जब प्रज्ञा से मनुष्य देखता है तो वह दु:खों से विरक्ति को प्राप्त होता है, यही विशुद्धि का मार्ग है. इच्छा एवं हिंसा की भावना से मुक्त संकल्प को सम्यक् संकल्प कहा गया. आर्य सत्यों के अभिज्ञान मात्र से लाभ नहीं होता जब तक उनके अनुसार जीवन यापन करने का दृढ़ संकल्प न किया जाये. धम्मपद में विवेचन मिलता है कि युवा होकर भी जो आलसी हैं जिसके मन और संकल्प निर्बल हैं ऐसा व्यक्ति प्रज्ञा के मार्ग को प्राप्त नहीं करता.

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सत्य, विनम्र एवं मृदुता से समन्वित वाणी को सम्यक् वाक् कहा गया. उल्लेख मिलता है कि मिथ्यावादिता, निद्रा, अप्रिय वचन तथा वाचालता से बचना चाहिए. वाणी की रक्षा करने, मन से संयमी बनने एवं शरीर से बुरा कार्य न करने को शुद्धि का मार्ग बताया है.

सम्यक् सकल्प को वचन में ही नहीं वरन् कर्म में भी परिणत करना चाहिए अर्थात् सत्कर्मों में संलग्न होना ही सम्यक् कर्मान्त है. दूसरे शब्दों में अहिंसा, अस्तेय, इन्द्रिय संयम ही सम्यक् कर्म है. किया हुआ वह कर्म अच्छा होता है जिसको करके मनुष्य को सन्ताप नहीं होता. जीवन-यापन की विशुद्ध प्रणाली को सम्यक् आजीव कहा है अर्थात् मन, वचन एवं कर्म के शुद्ध उपाय से जीविकोपार्जन करना है. किन्तु इसका अभिप्राय भिक्षु एवं गृहस्थ के लिए अलग-अलग था.

सम्यक् व्यायाम के बारे में विवरण मिलता है कि व्यक्ति को पुराने बुरे भावों का नाश, नवीन बुरे भावों का अनाविभाव, मन को उत्तम कायों में लगाना एवं शुभ विचारों को धारण करने की चेष्टा करनी चाहिए. सम्यक् व्यायाम से तात्पर्य विशुद्ध एवं विवेकपूर्ण प्रयत्न है.

सम्यक् स्मृति से मनुष्य सभी विषयों से विरक्त हो जाता है एवं सांसारिक बन्धनों में नहीं पड़ता. बौद्ध व्यवस्था में स्मृति के चार रूप माने गये हैं. प्रथम कायानुपश्यना से तात्पर्य शरीर की प्रत्येक चेष्टा को समझते रहना. दूसरी चितानुपश्यना है अर्थात् चित्त के राग-द्वेष आदि पहचानना. तीसरी वेदनानुपश्यना से अभिप्राय दु:ख एवं सुख दोनों ही अनुभूतियों के प्रति सजग रहना. चतुर्थ धर्मानुपश्यना अर्थात् शरीर, मन, वचन की प्रत्येक चेष्टा को समझना.

चित्त की एकाग्रता को समाधि कहा गया है. समाधि द्वारा पुराने क्लेश जड्-मूल से नष्ट हो जाते हैं और तृष्णा एवं वासनाओं से मुक्ति मिलती है तथा सत्वगुण की वृद्धि होती है. इसमें मनुष्य को अपने मन को नियन्त्रित करने का अभ्यास करना होता है. मन की चंचलता पर संयम पा लेने पर ज्ञान में एकाग्रता बढ़ती है. बौद्ध दर्शन में समाधि के कुछ स्तरों का उल्लेख मिलता है उग्रचार समाधि एवं अप्यना समाधि आदि.

निर्वाण – बुद्ध ने उनके उपदेशों को विचारपूर्वक ग्रहण करने की आज्ञा दी थी, क्योंकि प्रत्येक मनुष्य को अपना निर्वाण स्वयं को प्राप्त करना होता है. ज्ञान को आन्तरिक अवस्था में परिणत करने के लिए प्रज्ञा, शील, समाधि आवश्यक है एवं सत्य का साक्षात्कार तब तक नहीं हो सकता जब तक विचार एवं कर्म का संयम न हो. शील एवं समाधि की अवस्था को स्पष्ट करते हुए दासगुप्त ने लिखा है– हम अन्तर और बाहर से तृष्णा के पाश से जकड़े हुए हैं (तन्हाजटा) और इससे छुटकारा पाने का उपाय केवल यह है कि हम जीवन में उचित (शील) के ध्यान, समाधिज्ञान (प्रज्ञा) को स्थान दें. संक्षेप में शील का अर्थ है पाप कमों से दूर रहना. अत: सर्वप्रथम शील को धारण करना आवश्यक है. शील का धारण करने से दुर्वासनाओं से उत्पन्न दुष्कमों से दूर रहने के कारण भय और चिन्ता से मुक्ति होती है. शील के पश्चात् समाधि की क्रिया प्रारम्भ होती है. समाधि के द्वारा पुराने क्लेश जड़मूल से नष्ट हो जाते हैं और तृष्णा और वासनाओं से मुक्ति मिलती है एवं सत्त्वगुण की वृद्धि होती है. इसके द्वारा ज्ञान की प्राप्ति होती है और ज्ञान से मुक्ति प्राप्ति होती है जिसको अर्हत् कहते हैं. बौद्ध धर्म का एक मात्र लक्ष्य निर्वाण प्राप्त करना है. सामान्यत: इसका अभिप्राय जीवन-मृत्यु के चक्र से विमुक्ति माना है. हिरियन्ना ने निर्वाण की व्याख्या करते हुए लिखा है कि यह वास्तव में किसी मरणोत्तर अवस्था का सूचक नहीं है. यह तो उस अवस्था का सूचक है जो व्यक्ति के जीवित रहते हुए पूर्णता की प्राप्ति के बाद आती है. यह ऐसी अवस्था है जिसमें सामान्य जीवन की संकीर्ण रूचियाँ समाप्त हो गई होती हैं और व्यक्ति पूर्ण शान्ति और समत्व का जीवन बिताता है. यह मन की एक विशेष वृत्ति का सूचक है और वह जो इस वृत्ति को प्राप्त कर चुका है, अहत् कहलाता है, इसका अर्थ है योग्य या पावन.

निर्वाण का तात्पर्य परमज्ञान भी माना जाता है, यह तृष्णा या आसक्ति से मुक्त होने का अभिज्ञान है, जिसे पूर्ण विशुद्धि भी कहा है. निर्वाण की प्राप्ति इस जीवन में भी संभव है, जैसा हिरियन्ना ने लिखा है कि कुछ विद्वान् इस अवस्था को अनिर्वचनीय मानते हैं तथा इसके अस्तित्व के विषय में मौन हैं तथा इसका शाब्दिक अर्थ दु:ख से मुक्ति माना गया. थॉमस ने निर्वाण तथा परिनिर्वाण में भेद किया तथा निर्वाण इसी जीवन काल में तथा परिनिर्वाण मृत्यु के बाद संभव माना गया. निर्वाण की प्राप्ति के बाद पुनर्जन्म एवं उत्पन्न होने वाले दुःख संभव नहीं होते क्योंकि जन्म ग्रहण करने के लिए आवश्यक कारण नष्ट हो जाते हैं. बौध धर्मावलम्बन हेतु व्यक्ति भिक्षु बनकर (संघ में प्रवेश) या गृहस्थ साधक के रूप में रह सकता है. किन्तु निर्वाण सामान्यतः भिक्षु बनने पर ही संभव माना है. अर्हत्  की अवस्था का विवेचन धम्मपद में मिलता है, जिसका मार्ग समाप्त जो शोक रहित तथा सर्वथा विमुक्त है, सब ग्रन्थियों से छूट चुका सन्ताप नहीं. उसका मन शान्त एवं वाणी तथा कर्म शान्त होते हैं.

कर्म – बौद्ध दर्शन में कर्म सिद्धान्त को स्वीकार किया है. मिलिन्दपन्हो में नागसेन कहते हैं कि मनुष्य अपने कर्मों के अनुसार सुख-दु:ख का भोग करते हैं. कर्म-फल से ही मनुष्य कुछ दीर्घजीवी एवं कुछ अल्पजीवी, स्वस्थ-अस्वस्थ, -कुरूप, धनी-निर्धन होते हैं दीन. सब अपने कर्मों का ही फल प्राप्त कर रहे हैं. परन्तु कर्म-फल इस जीवन में अथवा अन्य जीवन में तभी प्राप्त होता है जब मनुष्य राग, द्वेष एवं मोह-बन्धन में फंसा रहता है. लोभ एवं मोह का परित्याग कर मनुष्य जब अपरिग्रह का मार्ग ग्रहण करते हुए निष्काम कार्य करता है तब कर्म स्वत: समूल नष्ट हो जाते हैं. तृष्णा के अभाव में स्वयं कर्म विकसित नहीं हो सकता. तृष्णा के प्रति विरक्त होने एवं इसका परित्याग करने पर ही दु:ख से मुक्ति संभव मानी गई. वासना का नाश होने पर अहत् पद प्राप्त होता है और उसके पश्चात् उसके किये हुए कर्मों का फल प्राप्त नहीं होता, उसके कर्म नष्ट हो जाते हैं. पूर्व जन्म के कर्म-शेष रहने पर भी अर्हत् तृष्णा हो जाता है क्योंकि कामना के कारण ही कर्म फल मिलता है. वासना के नष्ट हो जाने पर अज्ञान, राग द्वेष एवं लोभ का भी नाश हो जाता है. कर्म 3 प्रकार के कहे गए हैं- मानसिक, शारीरिक (कायिक) तथा वाचिक (वाणी द्वारा किए गए कार्य). अर्हत पद प्राप्त होने पर कोई कामना शेष नहीं रह जाती है उसके शरीर एवं वाणी से किये कर्म का कोई फल नहीं होता. बुद्ध ने कर्म के आधार पर ही चरों वर्णों के लिए मुक्ति का प्रतिपादन किया. उनकी धरना थी की मनुष्य चाहे वह ब्राहमण हो, क्षत्रिय हो, वैश्य हो अथवा शूद्र हो, सम्यक कर्म करने से मोक्ष का अधिकारी होगा.

अनात्मवाद – बुद्ध ने आत्मा को अनावश्यक कल्पना मानकर उसका निषेध करते हुए मात्र चेतना की अवस्था को स्वीकार किया. बुद्ध की मान्यता थी कि संसार अनित्य, क्षणिक एवं दु:ख रूप है जो दु:ख रूप है वह आत्मा नहीं हो सकती. इस तथ्य को अन्य लोगों (अबौद्धों) ने भी मान लिया कि पृथ्वी, जल, तेजस तथा वायु अर्थात् चार भूतों से निर्मित देह आत्मा नहीं है और अपनी आत्मा को चित्त के रूप में स्वीकार किया गया. तथापि विद्वानों की धारणा है अप्रत्यक्ष रूप से बुद्ध संभवत: आत्मा के अस्तित्व को स्वीकार करते थे किन्तु इस तथ्य को अभिव्यक्त नहीं करना चाहते थे. आत्मा सम्बन्धी प्रश्न पूछे जाने पर बुद्ध मौन रहे, तदुपरान्त आनन्द को कहा कि- आत्मा की अस्वीकृति से भौतिक वादियों के नास्तिकवाद का समर्थन होता है और आत्मा की स्वीकृति से शाश्वतवाद का, वस्तुत: दोनों ही मिथ्या धारणाये हैं. इस सन्दर्भ में हिरियन्ना ने लिखा है कि बौद्ध धर्म आत्मा का ऐसी स्थायी सत्ता के रूप में, जो बदलती हुई शारीरिक और मानसिक अवस्थाओं के बीच स्वयं अपरिवर्तित बनी रहे, अवश्य निषेध करता है, पर उसके स्थान पर एक तरल आत्मा को स्वीकार करता है, जिसे अपने तरलत्व के कारण ही परस्पर बिल्कुल पृथक और असमान अवस्थाओं की सन्तान नहीं माना जा सकता. इस प्रकार बुद्ध इस दृष्टि से भी मध्यमा प्रतिपदा का अनुगमन करते हुए आत्मा की स्वीकृति एवं अस्वीकृति पर सामान्यत: मौन रहे. जगत् नश्वर है अत: अनात्मवाद के विवेचन का अभिप्राय है कि सम्पूर्ण अनुभूत जगत् में आत्मा नहीं है. आत्मा को स्वीकार नहीं किये जाने के कारण का उल्लेख करते हुए कुछ विद्वानों ने लिखा है कि बुद्ध आत्मवाद का प्रचार करते तो संभवत: जनता में अपने प्रति आसक्ति उत्पन्न होती जो दुःख का मूल कारण है. इसके विरुद्ध अनात्मवाद का प्रचार करने पर मृत्योपरांत कुछ शेष नहीं रहना मानव के मानसिक त्रास का कारण बनता है. डॉ. राधाकृष्णन की मान्यता थी कि महात्मा बुद्ध आत्मा में विश्वास करते थे.

पुनर्जन्म – बौद्ध धर्म पुनर्जन्म में विश्वास करता है, किन्तु इसमें नित्य आत्मा अस्तित्व स्वीकार नहीं किया है. अत: यह विचार परस्पर विरोधी है. कहा गया है कि कर्ता के बिना कर्म हो सकता है तो आत्मा के बिना भी पुनर्जन्म हो सकता है. बौद्ध धर्म में न केवल जीवन समाप्ति के बाद पुनर्जन्म माना गया बल्कि प्रतिक्षण पुनर्जन्म को स्वीकार किया है. पुनर्जन्म मृतव्यक्ति का नहीं होता बल्कि उसी के संस्कार वाले दूसरे व्यक्ति का जन्म हो सकता है. मृत्यु के बाद व्यक्ति का चरित्र बना रहता है एवं अपनी मानसिक शक्ति से अन्य व्यक्ति को जन्म देता है अर्थात् आत्मा का पुनर्जन्म न होकर चरित्र का होता है. यह प्रक्रिया तब तक चलती रहती है जब तक कि तृष्णा पर विजय प्राप्त न कर ली जाये. हिरियन्ना ने कहा है जो भी हो बुद्ध ने इस सिद्धान्त को एक बड़ी सीमा तक तर्क संगत बना दिया–  इससे जुड़े हुए अलौकिक और भौतिकवाद के तत्त्व बिल्कुल निकाल दिये. बुद्ध ने इन दोनों मतों को अस्वीकार कर दिया और कर्म को नैतिकता के क्षेत्र में अपनी ही प्रकृति के अनुसार स्वतंत्रतापूर्वक काम करने वाला एक अपौरुषेय नियम माना.

अनीश्वरवाद – सृष्टि कर्ता के रूप में बुद्ध ने ईश्वर को स्वीकार नहीं किया क्योंकि ऐसा करने पर ईश्वर को दु:ख का सर्जक भी मानना होगा. यद्यपि कुछ विद्वान् बुद्ध को नितान्त अनीश्वरवादी नहीं मानते बल्कि नितान्त कर्मवादी होने के कारण एवं मानव जाति को जटिल सवालों से दूर रखने के लिए ईश्वर सम्बन्धी प्रश्नों का विवेचन अनावश्यक समझा. डॉ. राधाकृष्णन की मान्यता है कि- ईश्वर को अनिर्वचनीय परम तत्त्व के रूप में स्वीकार किया जाये तो चार्वाक को छोड़कर किसी भी भारतीय दर्शन को अनीश्वरवादी नहीं कहा जा सकता.

प्रयोजनवाद – यथार्थवादी बुद्ध ने जीवन के ठोस तथ्यों को स्वीकार करने के लिए प्रेरित किया. यद्यपि उनके उपदेशों में परलोक का विवेचन मिलता है. ऐसा करना संभवतः कर्म सिद्धान्त की स्वीकृति हेतु अपेक्षित था, तथापि बुद्ध जिस वस्तु के विषय में प्रत्यक्ष रूप से ज्ञान न हो उसका बहिष्कार करना उचित समझते थे. उन्होंने वेद प्रमाण्य एवं यज्ञ प्रक्रिया को भी अस्वीकार किया अर्थात् वे प्रत्यक्ष एवं तर्क के दायरे के बाहर किसी भी तथ्य की स्वीकृति के लिए सहमत नहीं थे. इस दृष्टि से बुद्ध को प्रयोजनवादी भी कहा जाता है, क्योंकि उनके उपदेश उन्हीं विषयों से सम्बद्ध थे जिन्हें मानव कल्याण के लिए आवश्यक समझा गया. महात्मा बुद्ध ने लोक, जीव, परमात्मा, आत्मा सृष्टि सम्बन्धी अनेक विवादों को अप्रयोज्य मानते हुए दस अकथनीय सिद्धान्तों का विवेचन किया. लोक से सम्बन्धित तथ्य है- क्या लोक नित्य है; अनित्य है, शान्त है, अनन्त है? इसी प्रकार जीव से सम्बद्ध तथ्य है- क्या जीव एवं शरीर एक हैं अथवा- भिन्न हैं, क्या मृत्यु के बाद तथागत होते हैं या नहीं होते हैं? वस्तुतः बौद्ध में आदर्शवाद एवं यथार्थवाद का व्यवहारपरक संयोजन देखा जाता है. बुद्ध जीवन को दु:खमय पाया. अत: उससे बचना आवश्यक है साथ ही दु:ख से बचने के उपायों की चर्चा की. किन्तु बुद्ध के उपदेशों को दु:खवादी कहने का तात्पर्य यह नहीं कि वे निराशावाद की ओर उन्मुख करने वाले हैं क्योंकि अहत् की अवस्था इस लोक एवं जीवन में शान्ति की संभावना को स्वीकार करती है.

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