बिना अपेक्षा सेवा करना क्यों कठिन है?

बिना अपेक्षा सेवा करना क्यों कठिन है?

सेवा, या सेवा भाव, धर्म और आध्यात्म का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है। यह न केवल दूसरों की मदद करने का कार्य है बल्कि व्यक्ति के आत्मिक और नैतिक विकास का भी साधन है। परंतु बिना किसी अपेक्षा या स्वार्थ के सेवा करना हर व्यक्ति के लिए आसान नहीं होता। आधुनिक जीवन की व्यस्तता, मानसिक तनाव और व्यक्तिगत लालसाएँ अक्सर इस सरल सिद्धांत को जटिल बना देती हैं। आइए समझते हैं कि बिना अपेक्षा सेवा करना क्यों कठिन है।

स्वार्थ और मानव स्वभाव

मनुष्य का स्वभाव स्वार्थपूर्ण होता है। हम आमतौर पर किसी भी कार्य में लाभ, सम्मान या सामाजिक मान्यता की तलाश करते हैं। इसलिए जब सेवा में कोई प्रतिफल या मान्यता नहीं होती, तो मन और भावनाएँ अक्सर झिझक या असंतोष की ओर झुकती हैं। इसे पार करना और सेवा को केवल मानवता और करुणा के लिए करना आसान नहीं होता।

मानसिक संतुलन की चुनौती

बिना अपेक्षा सेवा करने का अर्थ है अपनी इच्छाओं और लालसाओं को पीछे छोड़ना। यह मानसिक संतुलन, धैर्य और आत्म-नियंत्रण की मांग करता है। सेवा करते समय यदि व्यक्ति को तुरंत प्रतिक्रिया या परिणाम न मिले, तो निराशा और बेचैनी पैदा हो सकती है। यही कारण है कि सेवा को केवल निष्काम भाव से करना कठिन हो जाता है।

सामाजिक और पारिवारिक दबाव

आज के समय में व्यक्ति पर सामाजिक और पारिवारिक अपेक्षाएँ अधिक होती हैं। लोग अक्सर यह देखते हैं कि कौन कितना योगदान दे रहा है या समाज में किसे कितनी प्रतिष्ठा मिली। जब सेवा केवल दूसरों की मदद और मानवता के लिए हो, तो समाज कभी-कभी इसे कम समझ सकता है। यह भी बिना अपेक्षा सेवा को कठिन बनाने वाले कारणों में शामिल है।

अहंकार और स्वाभिमान

मनुष्य का अहंकार अक्सर सेवा में बाधा बनता है। हम चाहते हैं कि हमारी भलाई और मदद दूसरों द्वारा सराही जाए। जब हमारी सेवा की सराहना या पहचान नहीं मिलती, तो अहंकार चोट खाता है और सेवा करने का उत्साह कम हो जाता है। निष्काम सेवा, अर्थात बिना किसी मान्यता की चाहत, इस अहंकार पर विजय पाने की प्रक्रिया है।

आध्यात्मिक दृष्टिकोण की आवश्यकता

बिना अपेक्षा सेवा करने के लिए आध्यात्मिक दृष्टिकोण और मानसिक प्रशिक्षण की आवश्यकता होती है। संत और महात्मा हमेशा इस सिद्धांत पर जोर देते आए हैं कि सेवा ही ईश्वर की वास्तविक भक्ति है। भगवद गीता में भी कहा गया है कि कर्म करते समय फल की इच्छा त्यागना आवश्यक है। यह भाव प्रारंभ में कठिन लगता है, लेकिन अभ्यास और धैर्य से व्यक्ति इसे आत्मसात कर सकता है।

छोटे कदम और अभ्यास

सेवा को निष्काम बनाने के लिए व्यक्ति को छोटे कदमों से शुरुआत करनी चाहिए। छोटे-छोटे कार्य, जैसे किसी वृद्ध की मदद करना, गरीब को भोजन देना, बच्चों को शिक्षा देना या किसी को सांत्वना देना, धीरे-धीरे निष्काम भाव विकसित करते हैं। नियमित अभ्यास और आत्म-चिंतन से यह मानसिक और आत्मिक प्रशिक्षण मजबूत होता है।

निष्कर्ष

बिना अपेक्षा सेवा करना कठिन इसलिए है क्योंकि यह स्वार्थ, अहंकार, मानसिक अस्थिरता और सामाजिक दबाव के खिलाफ है। परंतु यही सेवा व्यक्ति और समाज दोनों को श्रेष्ठ बनाती है। जब हम सेवा को केवल मानवता, करुणा और समाज की भलाई के लिए अपनाते हैं, तो हमारी आत्मा शुद्ध होती है और समाज में सच्ची भलाई फैलती है। निष्काम सेवा कठिन जरूर है, लेकिन यही सच्चा धर्म और जीवन का सर्वोच्च मार्ग है।

~ रिलीजन वर्ल्ड ब्यूरो

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