आदि शंकराचार्य और कुम्भ की परंपरा : दशनामी परंपरा और अखाड़ा
भारत अपनी धर्म प्रियता के लिए जाना जाता है। हजारों सालों से भारतवासी धर्म में आस्था रखते आये है। मनुष्य ने सृष्टि के निर्माण एवं विनाश में किसी अदृश्य शक्ति के आस्तित्व को ईश्वर के रूप में स्वीकार कर उसके समक्ष अपना सिर झुकाया तथा कल्याण के लिय ईश्वरीय शक्ति की पूजा अर्चना प्रारंभ की।

जगदगुरु शंकराचार्य का प्रादुर्भाव
नवीं शताब्दी में जगदगुरु आध्य शंकराचार्य जी का प्रादुर्भाव हुआ। इन्होंने दो बार पुरे देश का भ्रमण किया। अपने दार्शनिक सिद्धांत अद्वैतवाद का प्रचार किया। इस प्रकार वैदिक सनातन धर्म की पुनः प्रतिष्ठा की। एक विराट भारतीय हिंदू समाज की स्थापना की और जगतगुरु कहलाये।
इन्होंने लोकहित में वैदिक धर्म की धारा अहर्निश बहती रहे, इसे सुनिश्चित करते हुई देश की चारों दिशाओ में चार मठ – ज्योतिर्मठ, श्रंगेरिमाथ, शारदामठ तथा गोवर्धन कायम किये। इसके साथ ही सनातन धर्म के सरंक्षण हेतु एवं उसे गतिमान बनाये रखने की दृष्टि से पारिवारिक बंधन से मुक्त, नि: स्वार्थ,निस्पृह नागा साधुओं/संन्यासियों का पुनर्गठन किया। इनके संगठनो में व्यापक अनुशासन स्थापित किया और देश में दशनाम्
संयास प्रणाली चालू की। इसका विधान “ मठाम्नाय” नाम से अंकित किया।
संन्यासियों के संघों में दीक्षा के बाद संन्यासी द्वारा जो नाम ग्रहण किये जाते है, तथा उनके साथ जो इस शब्द जोड़े जाते है उन्ही के कारण दशनामी के नाम सेसंन्यासी प्रसिद्ध हुए और उनके ये दस नाम जिन्हें योग पट्ट भी कहा जाता है, प्रसिद्ध हुए।संन्यासियों के नाम के आगे जोड़े जाने वाले ये योग पटट शब्द है – गिरी ,पुरी, भारती, वन, सागर, पर्वत, तीर्थ, अरण्य, आश्रम, जन और सरस्वती।
आचार्य शंकर द्वारा रचित“ मठाम्नाय” ग्रन्थ के अनुसार साधु समाज के संघों के पदाधिकारियों की व्यवस्था निम्नअनुसार से की गई है….आदि शंकराचार्य ने हर दशनाम परंपरा को विभिन्न पीठों से जोड़ा।
(1) तीर्थ (2) आश्रम (3) सरस्वती (4) भारती (5) वन (6) अरण्य (7) पर्वत (8) सागर (9) गिरि (10) पुरी
- सरस्वती, तीर्थ, अरण्य, भारती – शृंगेरि शारदा पीठम्
- तीर्थ, आश्रम – द्वारका पीठ
- गिरि, पर्वत, सागर – ज्योतिर्मठ
- वन, पुरी, अरण्य – गोवर्धनपुरी मठ
1) तीर्थ – तत्वमसि आदि महाकाव्य त्रिवेणी – संगम – तीर्थ के सामान है जो संन्यासी इसे भली-भांति समझ लेते है, उन्हें तीर्थ कहते हैं।
2) आश्रम – जो व्यक्ति संन्यास-आश्रम में पूर्णतया समर्पित है, और जिसे कोई आशा अपने बंध में’ नहीं बांध सकती वह व्यक्ति आश्रम है।
3) वन – जो सुन्दर एकाकी, निर्जन वन में आशा बंधन से अलग होकर वास करते है, उस सन्यासी को “ वन् “ कहते है।
4) गिरी – जो संन्यासी वन में वास करने वाला एवं गीता के अध्ययन में लगा रहने वाला, गंभीर, निश्चल बुद्धि वाले सन्यासी “गिरी” कहलाते है।
5) भारती – जो संन्यासी विद्यावान, बुद्धिमान है, जो दुःख कष्ट के बोझ को नहीं जानते हैं या घबराते नहीं वे संन्यासी “भारती” कहलाते हैं।
6) सागर – जो संन्यासी समुद्र की गंभीरता एवं गहराई को जानते हुऐ भी उसमे डुबकी लगाकर ज्ञान प्राप्ति का इच्छुक होते है, वे संन्यासी सागर कहलाते है।
7) पर्वत – जो संन्यासी पहाडों की गुफा में रहकर ज्ञान प्राप्त का इच्छुक होते है, “पर्वत” कहलाते है।
8) सरस्वती – जो संन्यासी सदैव स्वर के ज्ञान में निरंतर लगे रहते हैं और स्वर के स्वरुप की विशिष्टविवेचना करते रहते हैं तथा संसाररूपी असारता अज्ञानता को दूर करने में लगे रहते हैं, ऐसे संन्यासी सरस्वती कहलाते है।
9) अरण्य – अरण्य के ऋषि हैं कश्यप। ये नामधारी संन्यासी जगन्नाथ पुरी स्थित गोवर्धन पीठ के साथ जुड़े हैं।
10) पुरी – ये नामधारी संन्यासी भी जगन्नाथ पुरी स्थित गोवर्धन पीठ के साथ जुड़े हैं।
विभिन्न अखाड़े और उनका विधान
दशनामी साधु समाज के 7 प्रमुख अखाडों का जो विवरण आगे दिया गया है, वह श्री यदुनाथ सरकार द्वारा लिखित पुस्तक” नागे संन्यासियों का इतिहास “ पर आधारित है।
इनमें से प्रत्यक अखाड़े का अपना स्वतंत्र संगठन है, इनका अपना निजी लावाजमा होता है, जिसमे डंका, भगवा निशान, भाला, छडी ,वाध, हाथी, घोड़े, पालकी आदि होते है। इन अखाडों की सम्पति का प्रबंध श्री पंच द्वारा निर्वाचित आठ थानापति महंतो तथा आठ प्रबंधक सचिवों के जिम्मे रहती है। इनकी संख्या घट बढ़ सकती है।
इनके अखाडों का पृथक पृथक विवरण निम्न अनुसार है…
01. श्री पंच दशनाम जूना अखाडा – दशनामी साधु समाज के इस अखाड़े की स्थापना कार्तिक शुक्ल दशमी मंगलवार विक्रम संवत १२०२ को उत्तराखंड प्रदेश में कर्ण प्रयाग में हुई। स्थापना के समय इसे भैरव अखाड़े के नाम से नामंकित किया गया था। बहुत पहले स्थापित होने के कारण ही संभवत: इसे जुना अखाड़े के नाम से प्रसिद्ध मिली।इस अखाड़े में शैव नागा दशनामी साधूओ की जमात तो रहती ही है परंतु इसकी विशेषता भी है की इसके निचे अवधूतानियो का संघटन भी रहता है इसका मुख्य केंद्र बड़ा हनुमान घाट ,काशी (वाराणसी, बनारस) है। इस अखाड़े के इष्ट देव श्री गुरु दत्तात्रेय भगवान है जो त्रिदेव के एक अवतार माने जाते है।
02. श्री पंचायती अखाडा महनिर्वाणी – दशनामी साधुओ के श्री पंचायती महानिर्वाणी अखाड़े की स्थापना माह अघहन शुक्ल दशमी गुरुवार विक्रम संवत को गढ़कुंडा (झारखण्ड) स्थित श्री बैजनाथ धाम में हुई। इस अखाड़े का मुख्य केंद्र दारा गंज प्रयाग (इलाहाबाद ) में है। इस अखाड़े के इष्ट देव राजा सागर के पुत्रो को भस्म करने वाले श्री कपिल मुनि है। इसके आचार्य मेरे दीक्षा गुरु ब्रह्मलीन महामंडलेश्वर श्रीश्री 1008 स्वामी श्री विश्वदेवानंद जी महाराज थे, जिनका एक सड़क दुर्घटना में वर्ष 2013 में महाप्रयाण हो गया था। सूर्य प्रकाश एवं भैरव प्रकाश इस अखाड़े की ध्वजाए है। जिन्हें अखाडों के साधु संतो द्वारा देव स्वरुप माना जाता है। इस अखाड़े में बड़े बड़े सिद्ध महापुरुष हुए। जिसमें दशनामी अखाडों में इस अखाड़े का प्रथम स्थान है।
03. तपो निधि श्री निरंजनी अखाडा पंचायती – दशनामी साधुओ के तपोनिधि श्री निरंजनी अखाडा पंचायती अखाडा की स्थापना कृष्ण पक्ष षष्टि सोमवार विक्रम सम्वत ९६० को कच्छ (गुजरात) के मांडवी नामक स्थान पर हुई। इस अखाड़े का मुख्य केंद्र मायापूरी हरिद्वार (है )। इस अखाड़े के इष्ट देव भगवान कार्तिकेय है।
04. पंचायती अटल अखाडा- इस अखाड़े’ की स्थापना माह मार्गशीर्ष शुक्ल ४ रविवार’ विक्रम संवत ७०३ को गोंडवाना में हुई। इस अखाडे के इष्टदेव श्री गणेश जी है।
05. तपोनिधि श्री पंचायती आनंद अखाडा – दशनामी तपोनिधि श्री पंचायती आनंद अखाड़े’ की’ स्थापना’ माह शुक्ल चतुर्थी रविवार विक्रम संवत ९१२ कोबरार प्रदेश में हुई। इस अखाड़े के’ इष्ट’देव’ भगवान श्री सूर्यनारायण’ है’ तथा इसके’ आचार्य महामंडलेश्वर’ स्वामी श्री देवानंद सरस्वती जी महाराज है। अध्यक्ष श्री महंत सागरानन्द जी एवं महंत शंकरानंद जी है। इस अखाड़े का प्रमुख केंद्र कपिल धारा काशी (बनारस ) है। इस अखाड़े के केंद्रीय स्थान (कपिल धारा) के प्रमुख’ सचिव श्री महंत कन्हीयापूरी जी एवं श्री महंतचंचलगिरी है।
06. श्री पंचदशनाम आह्वान अखाडा – इस अखाड़े की स्थापना माह ज्येष्ट कृष्णपक्ष नवमी शुक्रवार का विक्रम संवत ६०३ में’ हुई। इस अखाड़े के’ इष्ट’देव’ सिद्धगणपति भगवान है। इसका मुख्य केंन्द्र दशाशवमेघ घाट काशी (बनारस) है। यह’ अखाडा श्री पंच दशनाम जुना अखाडा के’ आचार्य महामंडलेश्वर स्वामीश्री शिवेंद्र पूरी जी’ महाराज तथा सचिव श्रीमहंतशिव शंकर जी महाराजएवं महंत’ प्रेमपूरीजी’ महाराज है।
07. श्री पंचअग्नि अखाडा – श्री पंच अग्नि अखाड़े की स्थापना’और उसके’ विकास की एक अपनी गतिशील परम्परा है’| उल्लेखनीय यह है’ है की दशनामी साधु समाज के अखाडों की व्यवस्था में सख्त अनुशासन कायम रखने की दृष्टि से इलाहाबाद कुम्भ तथा अर्धकुम्भ एवं हरिद्वार कुम्भ’ में इन अखाडों में श्री महंतो का नया चुनाव होता है।
Editorial Review Note
Written by Religion World — Bhavya Srivastava is the founder of Religion World and a veteran journalist with over 18 years of experience across broadcast, print, and digital media. A founding member of the International Association of Religion Journalists (IARJ), he has spent much of his career reporting on and producing content about religion, faith, and spirituality. View full profile →.
Religion World provides information on all religions and presents it impartially. You can send us information, news, updates, opinions, and suggestions at religionworldin@gmail.com. You can also follow us on X (Twitter), Facebook, and YouTube.
Leave a Reply