धर्म में सहिष्णुता क्यों जरूरी है?

धर्म में सहिष्णुता क्यों जरूरी है?

भूमिका

धर्म मानव जीवन का एक महत्वपूर्ण आधार है। यह हमें नैतिकता, करुणा, प्रेम और सदाचार का मार्ग दिखाता है। लेकिन जब धर्म के साथ सहिष्णुता नहीं जुड़ती, तो वही धर्म विभाजन, संघर्ष और हिंसा का कारण बन सकता है। इसलिए यह प्रश्न अत्यंत महत्वपूर्ण है कि धर्म में सहिष्णुता क्यों जरूरी है? सहिष्णुता का अर्थ है—दूसरों की मान्यताओं, विचारों और आस्थाओं का सम्मान करना, भले ही वे हमारी सोच से भिन्न हों।

धर्म का मूल उद्देश्य

लगभग सभी धर्मों का मूल संदेश एक ही है—मानवता की सेवा, प्रेम, शांति और करुणा। चाहे वह हिंदू धर्म का “वसुधैव कुटुंबकम्” हो, बौद्ध धर्म की करुणा हो, इस्लाम का भाईचारा, ईसाई धर्म का प्रेम या सिख धर्म की सेवा भावना—हर धर्म इंसान को बेहतर मनुष्य बनाने की शिक्षा देता है। जब हम सहिष्णु बनते हैं, तभी धर्म का वास्तविक उद्देश्य पूर्ण होता है।

सहिष्णुता से ही शांति संभव

इतिहास गवाह है कि जब-जब धर्म के नाम पर असहिष्णुता फैली, तब-तब समाज में अशांति, दंगे और युद्ध हुए। धार्मिक सहिष्णुता समाज में शांति और स्थिरता बनाए रखने की कुंजी है। जब लोग एक-दूसरे की आस्थाओं को समझते और स्वीकार करते हैं, तब संघर्ष की संभावना स्वतः कम हो जाती है।

विविधता में एकता का आधार

भारत जैसे देश में अनेक धर्म, संप्रदाय और परंपराएं साथ-साथ फलती-फूलती हैं। यह विविधता हमारी शक्ति है, कमजोरी नहीं। धार्मिक सहिष्णुता हमें सिखाती है कि भिन्नता के बावजूद एकता संभव है। जब हम दूसरे धर्मों को अपनाने की नहीं, बल्कि समझने की कोशिश करते हैं, तभी सामाजिक सौहार्द मजबूत होता है।

असहिष्णुता के दुष्परिणाम

धर्म में असहिष्णुता कट्टरता को जन्म देती है। कट्टर सोच व्यक्ति को संकीर्ण बना देती है, जिससे नफरत, भेदभाव और हिंसा बढ़ती है। आज के समय में कई सामाजिक और वैश्विक समस्याओं की जड़ धार्मिक असहिष्णुता ही है। यदि समय रहते सहिष्णुता को नहीं अपनाया गया, तो इसका असर आने वाली पीढ़ियों पर भी पड़ेगा।

युवा पीढ़ी और सहिष्णुता

आज की युवा पीढ़ी वैश्विक सोच रखती है। इंटरनेट और सोशल मीडिया ने दुनिया को एक मंच पर ला दिया है। ऐसे में युवाओं के लिए यह आवश्यक है कि वे धर्म को कट्टरता नहीं, बल्कि सहिष्णुता और मानवता के दृष्टिकोण से समझें। सहिष्णु युवा ही एक शांतिपूर्ण और प्रगतिशील समाज का निर्माण कर सकते हैं।

धर्म और मानवता का संबंध

धर्म तब तक अधूरा है, जब तक उसमें मानवता नहीं है। सहिष्णुता हमें यह सिखाती है कि हर इंसान पहले इंसान है, बाद में किसी धर्म का अनुयायी। जब हम इस भाव को समझ लेते हैं, तब धर्म विभाजन नहीं, बल्कि जोड़ने का माध्यम बन जाता है।

निष्कर्ष

धर्म में सहिष्णुता आज के समय की सबसे बड़ी आवश्यकता है। यह न केवल धार्मिक सौहार्द को बढ़ाती है, बल्कि समाज को हिंसा, नफरत और विभाजन से भी बचाती है। सच्चा धार्मिक व्यक्ति वही है, जो अपनी आस्था के साथ-साथ दूसरों की आस्थाओं का भी सम्मान करे। जब धर्म सहिष्णुता से जुड़ता है, तभी वह मानवता के कल्याण का सशक्त माध्यम बनता है।

~ रिलीजन वर्ल्ड ब्यूरो

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