मानवाधिकार के परिप्रेक्ष्य में एक गंभीर विमर्श
धर्म मानव जीवन का एक गहरा और संवेदनशील पक्ष है। यह व्यक्ति को नैतिकता, करुणा, सह-अस्तित्व और आत्मिक शांति का मार्ग दिखाता है। लगभग सभी धर्म मानवता, प्रेम और न्याय की शिक्षा देते हैं। लेकिन आज के समय में यह प्रश्न तेजी से उभर रहा है कि क्या धर्म अपने मूल उद्देश्य से भटक गया है? क्या धर्म का उपयोग मानव कल्याण के बजाय विभाजन, हिंसा और सत्ता के साधन के रूप में किया जा रहा है? इस प्रश्न को मानवाधिकारों के संदर्भ में समझना अत्यंत आवश्यक है।
धर्म का मूल उद्देश्य
धर्म का मूल उद्देश्य मानव को नैतिक और संवेदनशील बनाना है। सत्य, अहिंसा, दया, समानता और भाईचारा—ये सभी मूल्य लगभग हर धर्म की बुनियाद हैं। धर्म व्यक्ति को आत्मसंयम सिखाता है और समाज में शांति बनाए रखने का संदेश देता है। यदि धर्म को उसके वास्तविक स्वरूप में अपनाया जाए, तो वह मानवाधिकारों को मजबूत करने वाला माध्यम बन सकता है।
धर्म का राजनीतिक और सामाजिक दुरुपयोग
समस्या तब शुरू होती है जब धर्म को व्यक्तिगत आस्था के बजाय सामूहिक पहचान और सत्ता के औजार के रूप में इस्तेमाल किया जाता है। राजनीति में धर्म का दुरुपयोग कर लोगों को बांटा जाता है, भावनाएं भड़काई जाती हैं और “हम बनाम वे” की मानसिकता पैदा की जाती है। इससे सामाजिक सौहार्द बिगड़ता है और मानवाधिकारों का हनन होता है, विशेषकर अल्पसंख्यकों और कमजोर वर्गों के अधिकार खतरे में पड़ जाते हैं।
हिंसा और नफरत के लिए धर्म का प्रयोग
आज दुनिया के कई हिस्सों में हिंसा, आतंकवाद और दंगों को धर्म के नाम पर正 ठहराया जाता है। जबकि किसी भी धर्म की शिक्षाएं हिंसा का समर्थन नहीं करतीं। धर्म का यह गलत इस्तेमाल न केवल निर्दोष लोगों की जान लेता है, बल्कि जीवन, स्वतंत्रता और गरिमा जैसे मूल मानवाधिकारों का सीधा उल्लंघन करता है। यह धर्म के नाम पर मानवता के खिलाफ अपराध है।
महिलाओं और अल्पसंख्यकों पर प्रभाव
धर्म के गलत इस्तेमाल का सबसे गहरा असर महिलाओं और अल्पसंख्यक समुदायों पर पड़ता है। कई बार धार्मिक व्याख्याओं के नाम पर महिलाओं की शिक्षा, स्वतंत्रता और समानता को सीमित किया जाता है। इसी तरह धार्मिक अल्पसंख्यकों को भेदभाव, सामाजिक बहिष्कार और हिंसा का सामना करना पड़ता है। मानवाधिकारों की दृष्टि से यह अस्वीकार्य है, क्योंकि हर व्यक्ति समान अधिकार और सम्मान का हकदार है।
मानवाधिकार और धार्मिक स्वतंत्रता
संयुक्त राष्ट्र की मानवाधिकारों की सार्वभौमिक घोषणा (UDHR) के अनुसार, प्रत्येक व्यक्ति को धर्म की स्वतंत्रता प्राप्त है। इसका अर्थ है कि व्यक्ति को अपना धर्म चुनने, बदलने या न मानने की आज़ादी है। लेकिन जब धर्म को जबरन थोपा जाता है या किसी विशेष धर्म को श्रेष्ठ घोषित किया जाता है, तब यह स्वतंत्रता खत्म हो जाती है और मानवाधिकार केवल सिद्धांत बनकर रह जाते हैं।
मीडिया और सोशल मीडिया की भूमिका
आधुनिक समय में मीडिया और सोशल मीडिया भी धर्म के गलत इस्तेमाल में बड़ी भूमिका निभा सकते हैं। भ्रामक खबरें, नफरत भरे संदेश और उकसाने वाली सामग्री समाज में तनाव बढ़ाती है। यदि इन माध्यमों का उपयोग जिम्मेदारी से न किया जाए, तो यह धार्मिक कट्टरता और मानवाधिकार उल्लंघन को और बढ़ावा देता है।
समाधान और आगे का रास्ता
धर्म का गलत इस्तेमाल रोकने के लिए शिक्षा, संवाद और संवैधानिक मूल्यों को मजबूत करना आवश्यक है। धर्म को व्यक्तिगत आस्था तक सीमित रखना और राज्य को निष्पक्ष बनाए रखना बेहद जरूरी है। जब मानवाधिकार, समानता और कानून का शासन सर्वोपरि होगा, तभी धर्म अपनी सकारात्मक भूमिका निभा सकेगा।
निष्कर्ष
निष्कर्षतः यह कहा जा सकता है कि धर्म स्वयं समस्या नहीं है, समस्या है उसका गलत इस्तेमाल। जब धर्म को नफरत, हिंसा और सत्ता के लिए प्रयोग किया जाता है, तब वह मानवाधिकारों के खिलाफ खड़ा हो जाता है। एक सभ्य और न्यायपूर्ण समाज के लिए आवश्यक है कि हम धर्म से ऊपर मानवता को रखें और धर्म को जोड़ने का माध्यम बनाएं, तोड़ने का नहीं।
~ रिलीजन वर्ल्ड ब्यूरो









