क्या स्कूलों में नैतिक शिक्षा जरूरी है?

क्या स्कूलों में नैतिक शिक्षा जरूरी है?

भूमिका

आज के प्रतिस्पर्धात्मक और तेज़ी से बदलते समाज में शिक्षा को अक्सर केवल अंक, डिग्री और करियर तक सीमित कर दिया गया है। स्कूलों में बच्चों को गणित, विज्ञान, तकनीक और भाषाओं का ज्ञान तो दिया जाता है, लेकिन जीवन जीने की सही दिशा सिखाने वाली नैतिक शिक्षा को अक्सर नज़रअंदाज़ कर दिया जाता है। ऐसे में यह प्रश्न अत्यंत प्रासंगिक हो जाता है कि क्या स्कूलों में नैतिक शिक्षा वास्तव में आवश्यक है? इसका उत्तर स्पष्ट रूप से “हाँ” है, क्योंकि नैतिक शिक्षा ही व्यक्ति को एक अच्छा इंसान और जिम्मेदार नागरिक बनाती है।

नैतिक शिक्षा का अर्थ

नैतिक शिक्षा का अर्थ है बच्चों को सत्य, ईमानदारी, करुणा, सम्मान, अनुशासन, जिम्मेदारी और सहिष्णुता जैसे मूल्यों की शिक्षा देना। यह शिक्षा किसी विशेष धर्म या पंथ से नहीं जुड़ी होती, बल्कि सार्वभौमिक मानवीय मूल्यों पर आधारित होती है। नैतिक शिक्षा बच्चों को सही और गलत में अंतर करना सिखाती है और उन्हें अपने आचरण के प्रति जागरूक बनाती है।

बचपन में नैतिक शिक्षा का महत्व

बचपन वह समय होता है जब बच्चे का चरित्र आकार लेता है। इस अवस्था में जो संस्कार और मूल्य बच्चों को मिलते हैं, वही उनके पूरे जीवन को प्रभावित करते हैं। स्कूल वह स्थान है जहाँ बच्चा अपने परिवार के बाद सबसे अधिक समय बिताता है। इसलिए स्कूलों की जिम्मेदारी बनती है कि वे बच्चों के चरित्र निर्माण में सकारात्मक भूमिका निभाएँ।

केवल अकादमिक शिक्षा क्यों पर्याप्त नहीं

यदि शिक्षा केवल किताबी ज्ञान तक सीमित रह जाए और उसमें नैतिकता का समावेश न हो, तो वह अधूरी मानी जाती है। इतिहास गवाह है कि उच्च शिक्षित लेकिन नैतिक मूल्यों से रहित लोग समाज के लिए खतरा बन सकते हैं। नैतिक शिक्षा अकादमिक ज्ञान को सही दिशा देती है और उसे मानव कल्याण से जोड़ती है।

नैतिक शिक्षा और सामाजिक व्यवहार

नैतिक शिक्षा बच्चों में सहानुभूति, सहयोग और आपसी सम्मान की भावना विकसित करती है। इससे स्कूलों में अनुशासन बना रहता है और हिंसा, बदमाशी तथा भेदभाव जैसी समस्याओं में कमी आती है। नैतिक रूप से सशक्त बच्चे न केवल अपने लिए, बल्कि समाज के लिए भी उपयोगी सिद्ध होते हैं।

आधुनिक समय में नैतिक शिक्षा की आवश्यकता

आज के डिजिटल युग में बच्चे सोशल मीडिया, इंटरनेट और विभिन्न बाहरी प्रभावों से जल्दी प्रभावित हो जाते हैं। कई बार यह प्रभाव उन्हें भ्रमित कर देता है कि क्या सही है और क्या गलत। नैतिक शिक्षा ऐसे समय में बच्चों के लिए मार्गदर्शक दीपक का काम करती है और उन्हें आत्मसंयम व विवेकपूर्ण निर्णय लेना सिखाती है।

जिम्मेदार नागरिक निर्माण में भूमिका

नैतिक शिक्षा बच्चों को केवल अच्छा विद्यार्थी नहीं, बल्कि अच्छा नागरिक भी बनाती है। यह उन्हें कानून का सम्मान करना, समाज के प्रति जिम्मेदारी निभाना और लोकतांत्रिक मूल्यों को समझना सिखाती है। ऐसे नागरिक ही किसी भी राष्ट्र की वास्तविक शक्ति होते हैं।

स्कूलों में नैतिक शिक्षा कैसे दी जाए

नैतिक शिक्षा को केवल एक विषय तक सीमित रखने के बजाय उसे स्कूल की संस्कृति का हिस्सा बनाया जाना चाहिए। कहानियों, प्रेरक प्रसंगों, समूह चर्चा, नाट्य गतिविधियों और शिक्षक के व्यवहार के माध्यम से नैतिक मूल्यों को प्रभावी ढंग से सिखाया जा सकता है। शिक्षक स्वयं जब आदर्श आचरण प्रस्तुत करते हैं, तब बच्चे उनसे सबसे अधिक सीखते हैं।

निष्कर्ष

नैतिक शिक्षा कोई अतिरिक्त बोझ नहीं, बल्कि शिक्षा की आत्मा है। बिना नैतिक मूल्यों के शिक्षा दिशाहीन हो जाती है। स्कूलों में नैतिक शिक्षा को शामिल करना इसलिए जरूरी है ताकि हम केवल योग्य पेशेवर ही नहीं, बल्कि संवेदनशील, ईमानदार और जिम्मेदार मानव भी तैयार कर सकें। एक नैतिक रूप से मजबूत पीढ़ी ही एक स्वस्थ, शांत और प्रगतिशील समाज का निर्माण कर सकती है।

~ रिलीजन वर्ल्ड ब्यूरो

Post By Religion World