शून्यता से पूर्णता की यात्रा ही ध्यान है !
नियमित रूप से ध्यान करने से व्यक्ति के मन में उठते हर प्रकार के द्वंद्व शांत हो जाते हैं और उसका मन एक ऐसी अवस्था को प्राप्त होता है जिसमें वह हर प्रकार के विचारों और बंधन से स्वयं को मुक्त पाता है। इस अवस्था में चित्त को गहन शान्ति और आनंद का अनुभव होता है जिसके परिणामस्वरूप व्यक्ति अपने सामान्य जीवन में आने वाली परिस्थितियों का सामना अधिक जागरूकता और निपुणता से कर पाने में स्वयं को सक्षम पाता है और उसे स्वयं में सकारात्मक दृष्टिकोण, अधिक ऊर्जा और उत्साह की अनुभूति होने लगती है।
ध्यान के 120 प्रकार हैं जिनमें से स्वामी दीपांकर जी वो प्रकार सिखाते हैं जो समझने, सीखने और अपनाने में अत्यंत सरल और सुगम हैं। ध्यान के लिए सबसे आवश्यक है एक शांत वातावरण का चुनाव करके अपने अनुसार एक आरामदेह मुद्रा में अपनी पीठ को सीधा रखते हुए बैठना। अब अपने स्वांस पर ध्यान केन्द्रित कर उसे भीतर और बाहर आते गौर से देखें। मन में विचार आएं तो उन्हें आने दें उन्हें रोकने या उनसे किसी प्रकार का संघर्ष न करें केवल साक्षी बनकर उन्हें देखें, कुछ ही समय में आप पाएंगे कि धीरे धीरे विचारों का आना शांत हो जाएगा और अंततः विचारहीन अवस्था प्राप्त हो जाएगी। इसके साथ ही मन शांत और स्थिर होने लगेगा और आप अपने ह्रदय की धड़कन को सुन पाएंगे जो ध्यान की अवस्था कहलाती है।
“मैं न तो मन हूँ, न बुद्धि, न अहंकार, न ही चित्त हूँ
मैं न तो कान हूँ, न जिह्वा, न नासिका, न ही नेत्र हूँ
मैं न तो आकाश हूँ, न धरती, न अग्नि, न ही वायु हूँ
मैं तो मात्र शुद्ध चेतना हूँ, अनादि हूँ, अनंत हूँ, अमर हूँ”
Editorial Review Note
Written by Religion World — Bhavya Srivastava is the founder of Religion World and a veteran journalist with over 18 years of experience across broadcast, print, and digital media. A founding member of the International Association of Religion Journalists (IARJ), he has spent much of his career reporting on and producing content about religion, faith, and spirituality. View full profile →.
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