नास्तिक यानि अविश्वास का योद्धा

 In Atheism


नास्ति अर्थात जो नहीं हैं यानि जिसका वजूद नहीं है. नास्तिकता को मानने वाले नास्तिक धर्म की परिभाषा कुछ इसी प्रकार देते हैं. नास्तिक का मतलब है ईश्वर को न मानने वाले. नास्तिकता अथवा नास्तिकवाद या अनीश्वरवाद वह सिद्धांत जो जगत् की सृष्टि करने वाले, इसका संचालन और नियंत्रण करनेवाले किसी भी ईश्वर के अस्तित्व को सर्वमान्य प्रमाण के न होने के आधार पर स्वीकार नहीं करता. नास्तिकता का पालन करने वाले मनुष्य ईश्वर (भगवान) के अस्तित्व का स्पष्ट प्रमाण न होने कारण झूठ करार देते हैं. अधिकांश नास्तिक किसी भी देवी देवता, परालौकिक शक्ति, धर्म और आत्मा को नहीं मानते. हिन्दू दर्शन में नास्तिक शब्द उनके लिये भी प्रयुक्त होता है जो वेदों को मान्यता नहीं देते.
क्या है नास्तिकता की अवधारणा
नास्तिक मानने के स्थान पर जानने पर विश्वास करते हैं. वहीं आस्तिक किसी न किसी ईश्वर की धारणा को अपने धर्म, संप्रदाय, जाति, कुल या मत के अनुसार बिना किसी प्रमाणिकता के स्वीकार करता है. नास्तिकता इसे अंधविश्वास कहती है क्योंकि किसी भी दो धर्मों और मतों के ईश्वर की मान्यता एक नहीं होती है. नास्तिकता रूढ़िवादी धारणाओं के आधार नहीं बल्कि वास्तविकता और प्रमाण के आधार पर ही ईश्वर को स्वीकार करने का दर्शन है. नास्तिकता के लिए ईश्वर की सत्ता को स्वीकार करने के लिए अभी तक के सभी तर्क और प्रमाण अपर्याप्त है.
बौद्ध धर्म मानवी मूल्यों तथा आधुनिक विज्ञान का समर्थक है और बौद्ध अनुयायी काल्पनिक ईश्वर में विश्वास नहीं करते है. इसलिए अल्बर्ट आइंस्टीन, डॉ॰ बी. आर. अम्बेडकर, बर्नाट रसेल जैसे कई विज्ञानवादी एवं प्रतिभाशाली लोग बौद्ध धर्म को विज्ञानवादी धर्म मानते है. चीन देश की आबादी में 91% से भी अधिक लोग बौद्ध धर्म के अनुयायी है, इसलिए दुनिया के सबसे अधिक नास्तिक लोग चीन में है. नास्तिक लोग धर्म से जुडे हुए भी हो सकते है.

ईश्वरवाद और अनीश्वरवाद के बीच क्या है तर्क
दर्शन का अनीश्वरवाद के अनुसार जगत स्वयं संचालित और स्वयं शासित है. ईश्वरवादी ईश्वर के अस्तित्व के लिए जो प्रमाण देते हैं, अनीश्वरवादी उन सबकी आलोचना करके उनको काट देते हैं और संसारगत दोषों को बतलाकर निम्नलिखित प्रकार के तर्कों द्वारा यह सिद्ध करने का प्रयत्न करते हैं कि ऐसे संसार का रचनेवाला ईश्वर नहीं हो सकता.
ईश्वरवादी कहते है कि मनुष्य के मन में ईश्वरप्रत्यय जन्म से ही है और वह स्वयंसिद्ध एवं अनिवार्य है. यह ईश्वर के अस्तित्व का द्योतक है. इसके उत्तर में अनीश्वरवादी कहते हैं कि ईश्वरभावना सभी मनुष्यों में अनिवार्य रूप से नहीं पाई जाती और यदि पाई भी जाती हो तो केवल मन की भावना से बाहरी वस्तुओं का अस्तित्व सिद्ध नहीं होता. मन की बहुत सी धारणाओं को विज्ञान ने असिद्ध प्रमाणित कर दिया है.
जगत में सभी वस्तुओं का कारण होता है. बिना कारण के कोई कार्य नहीं होता. कारण दो प्रकार के होते हैं-एक उपादान, जिसके द्वारा कोई वस्तु बनती है और दूसरा निमित्त, जो उसको बनाता है. ईश्वरवादी कहते हैं कि घट, पट और घड़ी की भाँति समस्त जगत् भी एक कार्य (कृत घटना) है अतएव इसके भी उपादान और निमित्त कारण होने चाहिए. कुछ लोग ईश्वर को जगत का निमित्त कारण और कुछ लोग निमित्त और उपादान दोनों ही कारण मानते हैं. इस युक्ति के उत्तर में अनीश्वरवादी कहते हैं कि इसका हमारे पास कोई प्रमाण नहीं है कि घट, पट और घड़ी की भाँति समस्त जगत् भी किसी समय उत्पन्न और आरंभ हुआ था. इसका प्रवाह अनादि है, अत: इसके स्रष्टा और उपादान कारण को ढूँढ़ने की आवश्यकता नहीं है. यदि जगत का स्रष्टा कोई ईश्वर मान लिया जाय जो अनेक कठिनाइयों का सामना करना पड़ेगा; यथा, उसका सृष्टि करने में क्या प्रयोजन था? भौतिक सृष्टि केवल मानसिक अथवा आध्यात्मिक सत्ता कैसे कर सकती है? यदि इसका उपादान कोई भौतिक पदार्थ मान भी लिया जाय तो वह उसका नियंत्रण कैसे कर सकता है? वह स्वयं भौतिक शरीर अथवा उपकरणों की सहायता से कार्य करता है अथवा बिना उसकी सहायता के? सृष्टि के हुए बिना वे उपकरण और वह भौतिक शरीर कहाँ से आए? ऐसी सृष्टि रचने से ईश्वर का, जिसको उसके भक्त सर्वशक्तिमान, सर्वज्ञ और कल्याणकारी मानते हैं, क्या प्रयोजन है, जिसमें जीवन का अंत मरण में, सुख का अंत दु:ख में संयोग का वियोग में और उन्नति का अवनति में हो? इस दु:खमय सृष्टि को बनाकर, जहाँ जीव को खाकर जीव जीता है और जहाँ सब प्राणी एक दूसरे शत्रु हैं और आपस में सब प्राणियों में संघर्ष होता है, भला क्या लाभ हुआ है? इस जगत् की दुर्दशा का वर्णन योगवशिष्ठ के एक श्लोक में भली भाँति मिलता है, जिसका आशय निम्नलिखित है–
कौन सा ऐसा ज्ञान है जिसमें त्रुटियाँ न हों? कौन सी ऐसी दिशा है जहाँ दु:खों की अग्नि प्रज्वलित न हो? कौन सी ऐसी वस्तु उत्पन्न होती है जो नष्ट होने वाली न हो? कौन सा ऐसा व्यवहार है जो छलकपट से रहित हो? ऐसे संसार को रचने वाला सर्वज्ञ, सर्वशक्तिमान और कल्याणकारी ईश्वर कैसे हो सकता है?
ईश्वरवादी एक युक्ति यह दिया करते हैं कि इस भौतिक संसार में सभी वस्तुओं के अंतर्गत और समस्त सृष्टि में, नियम और उद्देश्य सार्थकता पाई जाती है. यह बात इसकी द्योतक है कि इसका संचालन करनेवाला कोई बुद्धिमान ईश्वर है इस युक्ति का अनीश्वरवाद इस प्रकार खंडन करता है कि संसार में बहुत सी घटनाएँ ऐसी भी होती हैं जिनका कोई उद्देश्य, अथवा कल्याणकारी उद्देश्य नहीं जान पड़ता, यथा अतिवृष्टि, अनावृष्टि, अकाल, बाढ़, आग लग जाना, अकालमृत्यु, जरा, व्याधियाँ और बहुत से हिंसक और दुष्ट प्राणी. संसार में जितने नियम और ऐक्य दृष्टिगोचर होते हैं उतनी ही अनियमितता और विरोध भी दिखाई पड़ते हैं. इनका कारण ढूँढ़ना उतना ही आवश्यक है जितना नियमों और ऐक्य का. जैसे, समाज में सभी लोगों को राजा या राज्यप्रबंध एक दूसरे के प्रति व्यवहार में नियंत्रित रखता है, वैसे ही संसार के सभी प्राणियों के ऊपर शासन करनेवाले और उनको पाप और पुण्य के लिए यातना, दंड और पुरस्कार देनेवाले ईश्वर की आवश्यकता है. इसके उत्तर में अनीश्वरवादी यह कहता है कि संसार में प्राकृतिक नियमों के अतिरिक्त और कोई नियम नहीं दिखाई पड़ते. पाप और पुण्य का भेद मिथ्या है जो मनुष्य ने अपने मन से बना लिया है. यहाँ पर सब क्रियाओं की प्रतिक्रियाएँ होती रहती हैं और सब कामों का लेखा बराबर हो जाता है. इसके लिए किसी और नियामक तथा शासक की आवश्यकता नहीं है. यदि पाप और पुण्य के लिए दंड और पुरस्कार का प्रबंध होता तथा उनको रोकने और करानेवाला कोई ईश्वर होता; और पुण्यात्माओं की रक्षा हुआ करती तथा पापात्माओं को दंड मिला करता तो ईसामसीह और गांधी जैसे पुण्यात्माओं की नृशंस हत्या न हो पाती.
इस प्रकार अनीश्वरवाद ईश्वरवादी सूक्तियों का खंडन करता है और यहाँ तक कह देता है कि ऐसे संसार की सृष्टि करनेवाला यदि कोई माना जाय तो बुद्धिमान और कल्याणकारी ईश्वर को नहीं, दुष्ट और मूर्ख शैतान को ही मानना पड़ेगा.
भारत के अनीश्वरवादी दर्शन
पाश्चात्य दार्शनिकों में अनेक अनीश्वरवादी हो गए हैं और हैं. भारत में जैन, बौद्ध, चार्वाक, सांख्य और पूर्वमीमांसा दर्शन अनीश्वरवादी दर्शन हैं. इन दर्शनों में दी गई युक्तियों का सुंदर संकलन हरिभद्र सूरि लिखित षड्दर्शन समुच्चय के ऊपर गुणरत्न के लिखे हुए भाष्य, कुमारिल भट्ट के श्लोकवार्तिक और रामानुजाचार्य के ब्रह्मसूत्र पर लिखे गए श्रीभाष्य में पाया जाता है. धर्म मनुष्य को बाटँनेँ का काम करता है. अतः ईश्वर सिर्फ जनता का अफीम होता है.

भारतीय दर्शन में नास्तिक

भारतीय दर्शन में नास्तिक शब्द तीन अर्थों में प्रयुक्त हुआ है.
(1)जो लोग वेद को परम प्रमाण नहीं मानते वे नास्तिक कहलाते हैं. इस परिभाषा के अनुसार बौद्ध, जैन और लोकायत मतों के अनुयायी नास्तिक कहलाते हैं और ये तीनों दर्शन ईश्वर या वेदों पर विश्वास नहीं करते इसलिए वे नास्तिक दर्शन कहे जाते हैं.

(2)जो लोग परलोक और मृत्युपश्चात् जीवन में विश्वास नहीं करते; इस परिभाषा के अनुसार केवल चार्वाक दर्शन जिसे लोकायत दर्शन भी कहते हैं, भारत में नास्तिक दर्शन कहलाता है और उसके अनुयायी नास्तिक कहलाते हैं.

(3) जो लोग ईश्वर (खुदा, गॉड) के अस्तित्व में विश्वास नहीं करते. ईश्वर में विश्वास न करनेवाले नास्तिक कई प्रकार के होते हैं. घोर नास्तिक वे हैं जो ईश्वर को किसी रूप में नहीं मानते. चार्वाक मतवाले भारत में और रैंक एथीस्ट लोग पाश्चात्य देशें में ईश्वर का अस्तित्व किसी रूप में स्वीकार नहीं करते; अर्धनास्ति उनका कह सकते हैं जो ईश्वर का सृष्टि, पालन और संहारकर्ता के रूप में नहीं मानते. इस परिभाषा के अनुसार भारत के बहुत से दर्शन नास्तिक की कोटि में आ जाते हैं. वास्तव में न्याय और वेदांत दर्शनों को छोड़कर भारत के अन्य दर्शन सांख्य, योग, वैशेषिक, मीमांसा, बौद्ध और जैन नास्तिक दर्शन कहे जा सकते हैं क्योंकि इनमें ईश्वर को सर्जक, पालक और विनाशक नहीं माना गया है. ऐसे नास्तिकों को ही अनीश्वरवादी कहते हैं.

आधुनिक काल में नास्तिक
नास्तिक अर्थात् अनीश्वरवादी लोग सभी देशों और कालों में पाए जाते हैं. इस वैज्ञानिक और बौद्धिक युग में नास्तिकों की कमी नहीं है. बल्कि यह कहना ठीक होगा कि ऐसे लोग आजकल बहुत कम मिलेंगे जो नास्तिक (अनीश्वरवादी) नहीं है. नास्तिकों का कहना यह है कि ईश्वर में विश्वास करने की आवश्यकता ही नहीं पड़ती. सर्जक मानने की आवश्यकता तो तभी होगी जब कि यह प्रमाणित हो जाए कि कभी सृष्टि की उत्पत्ति हुई होगी. यह जगत् सदा से चला आ रहा जान पड़ता है. इसके किसी समय में उत्पन्न होने का कोई प्रमाण ही नहीं है. उत्पन्न भी हुआ तो इसका क्या प्रमाण है कि इसकी विशेष व्यक्ति ने बनाया हो, अपने कारणों से स्वत: ही यह बन गया हो. इसका चालक और पालक मानने की भी आवश्यकता नहीं है क्योंकि जगत् में इतनी मारकाट, इतना नाश और ध्वंस तथा इतना दु:ख और अन्याय दिखाई पड़ता है कि इसका संचालक और पालक कोई समझदार और सर्वशक्तिमान् और अच्छा भगवान नहीं माना जा सकता, संभवतः वो एक विक्षिप्त शक्तिधारक ही हो सकता है. संसार में सर्जन और संहार दोनों साथ साथ चल रहे हैं. इसलिए यह कहना व्यर्थ है, कि किसी दिन इसका पूरा संहार हो जाएगा और उसके करने के लिए ईश्वर को मानने की आवश्यकता है. नास्तिकों के विचार में आस्तिकों द्वारा दिए गए ईश्वर के अस्तित्व को सिद्ध करने के लिए सभी प्रमाण प्रमाणाभास हैं.

साभार:विकिपीडिया

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