क्यों मनाई जाती बकरीद/ईद उल अजहा ?

 In Islam, Mythology

क्यों मनाई जाती बकरीद/ईद उल अजहा ?

इस्लाम के खास त्योहारों में बकरीद भी है। इस्लाम की पाक किताब कुरआन में बकरीद केबार में बताया गया है। परवदिगार अल्लाह ने हज़रत इब्राहिम के सपने में  आकर उनसे उनकी सबसे प्रिय चीज की कुर्बानी मांगी। हज़रत इब्राहिम को सबसे प्रिय अपना बेटा था। उन्होंने अपने बेटे की कुर्बानी देने का मन बना लिया, क्योंकि अल्लाह का आदेश था। हज़रत इब्राहिम ने अपने बेटे की कुर्बानी देने के लिए उसकी गर्दन पर वार किया।कुरआन में इस बाक का जिक्र है कि परवदिगार अल्लाह ने चाकू की वार से हज़रत इब्राहिम के पुत्र को बचाने के लिए बेटे की जगह एक बकरे की कुर्बानी दिलवा दी। इसी के बाद से बकरीद मनाई जाती है।

इस त्योहार को बकरीद, ईद-उल-अजहा बकरा ईद या ईद-उल जुहा के नाम से भी जाना जाता है। 2019 में ये 12 अगस्त को मनाया जा रहा है। ईद-उल-ज़ुहा हज़रत इब्राहिम की कुर्बानी की याद में ही मनाया जाता है। इसी दिन यानि बकरीद को हज़रत इब्राहिम ने अल्लाह के आदेश पर अल्लाह के लिए अपनी शिद्दत के लिए अपने बेटे हज़रत इस्माइल की कुर्बानी की फैसला किया। इसी वजह से पूरी दुनिया में मुसलमान बकरीद मनाता है।

बकरीद या ईद-उल-ज़ुहा का यह त्योहार इस्लाम के पांचवें सिद्धान्त यानि हज से भी जुड़ा हैं। रिवाज के अनुसार इस्लाम धर्म के लोग इस दिन किसी जानवर जैसे बकरा, भेड़, ऊंट आदि की कुर्बानी देते हैं। बकरीद के दिन कुर्बानी के गोश्त को तीन हिस्सों में बांटा जाता है। एक खुद के लिए, दूसरा सगे-संबंधियों के लिए और तीसरा गरीबों के लिए। बकरीद के दिन सभी लोग साफ-पाक होकर नए कपड़े पहनकर नमाज पढ़ते हैं। मर्दों को मस्जिद व ईदगाह और औरतों को घरों में ही पढ़ने का हुक्म है। नमाज पढ़कर आने के बाद ही कुर्बानी की प्रक्रिया शुरू की जा सकती है।

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