क्या है बहाई धर्म का आधार, नियम और उद्देश्य

 In Baha'i

क्या है बहाई धर्म का आधार, नियम और उद्देश्य

बहाई धर्म मूल रूप से इस्लाम धर्म की शिया शाखा के द्वारा फारस (आधुनिक ईरान) में उत्पन्न होने वाले नए विश्व धर्मों में से एक है. तथापि, इसने स्वयं के लिए एक विशेष स्थान को प्राप्त किया है. बहाई धर्म ने स्वयं को अपने आकार (50 लाख सदस्यों) के कारण, अपने मूल धर्म इस्लाम से अपनी व्यावहारिक स्वायत्तता, और अपनी सैद्धान्तिक विशिष्टता (एकेश्वरवादी तथापि समावेशी) को प्राप्त करते हुए एक अद्वितीय विश्व धर्म के रूप में वैश्विक स्तर पर (236 देशों) प्रतिष्ठित किया है.

बहाई धर्म के सबसे पुराने अग्रदूत सईद अली मुहम्मद थे, जिन्होने 23 मई, 1844 को स्वयं को बाब (“फाटक”), अर्थात् परमेश्वर की आठवीं और मुहम्मद के पश्चात् पहली अभिव्यक्ति के रूप में घोषित किया. इस वक्तव्य में निहितार्थ रूप से मुहम्मद को अन्तिम और सबसे बड़े भविष्यद्वक्ता और कुरान के पास अद्वितीय अधिकार होने से इन्कार करना पाया जाता है. इस्लाम इस तरह के विचारों को दयालुता भरी दृष्टि से नहीं लेता है. बाब और उनके अनुयायियों, जिन्हें बाबिस कहा जाता है, ने भारी सताव का सामना किया और 1950 के आने से पहले के 9 वर्षों तक ताबरिज, एधीरबैजान में बाब को राजनीतिक कैदी के रूप में मारने से पहले उन पर हुए अत्याधिक उत्पीड़न भरे सताव के भाग रहे हैं. परन्तु अपनी मृत्यु से पहले, बाब ने आने वाले पैगंबर अर्थात् भविष्यद्वक्ता के बारे में बात की, जिसे उसने “परमेश्वर जिसे प्रकट करेगा” के रूप में उद्धृत किया है. 22 अप्रैल, 1863 को, उनके अनुयायियों में से एक मिर्जा हुसैन अली ने स्वयं को उस भविष्यद्वाणी की पूर्ति और परमेश्वर की नवीनतम अभिव्यक्ति अर्थात् प्रगटीकरण की घोषणा की. उन्होंने स्वयं को बाहा’ऊ’ल्लाह (“परमेश्वर की महिमा”) पदवी के साथ पुकारा. इसलिए बाब को “बपतिस्मा देने वाले यूहन्ना” के रूप में देखा गया था – जो कि बाहा’ऊ’ल्लाह के लिए अग्रदूत के जैसे था, जबकि बाहा’ऊ’ल्लाह इस युग के लिए अधिक महत्वपूर्ण अभिव्यक्ति है. उनके अनुयायियों को बहाई कहा जाता है. इस उभरते हुए बहाई धर्म, जो अब इस नाम से पुकारा जाता है, की विशेषताएँ बाहा’ऊ’ल्लाह की घोषणाओं में स्पष्ट हो जाती हैं. उसने न केवल शिया इस्लाम में नवीनतम भविष्यद्वक्ता के आने का दावा किया, और न केवल उसने परमेश्वर की अभिव्यक्ति होने का दावा किया, परन्तु उसने स्वयं को मसीह का दूसरा आगमन, प्रतिज्ञा किया पवित्र आत्मा, परमेश्वर का दिन, मैत्रेय (बौद्ध धर्म से), और कृष्ण (हिन्दू धर्म से) होने का भी दावा किया है. बहाई धर्म की आरम्भिक अवस्थाओं में ही एक प्रकार का समावेशी विचार स्पष्ट रूप से पाया जाता है.

बहाई धर्म के संस्थापक

बहाई धर्म के संस्थापक बहाउल्लाह का जन्म आज से लगभग 200 वर्ष पूर्व तेहरान (ईरान) में हुआ था. बहाउल्लाह का शाब्दिक अर्थ है – ‘ईश्वरीय प्रकाश’ या ‘परमात्मा का प्रताप’. बहाउल्लाह को प्रभु का कार्य करने के कारण तत्कालिक शासक के आदेश से 40 वर्षों तक जेल में असहनीय कष्ट सहने पड़े. जेल में उनके गले में लोहे की मोटी जंजीर डाली गई तथा उन्हें अनेक प्रकार की कठोर यातनायें दी र्गइं. जेल में ही बहाउल्लाह की आत्मा में प्रभु का प्रकाश आया. ‘बहाउल्लाह’ ने प्रभु की इच्छा और आज्ञा को पहचान लिया. बहाउल्लाह की सीख है कि हम सबके हृदय एक हो जाये. परिवार में पति-पत्नी, पिता-पुत्र, माता-पिता, भाई-बहिन सभी परिवारजनों के हृदय मिलकर एक हो जाये तो परिवार में स्वर्ग उतर आयेगा. इसी प्रकार सारे संसार में सभी के हृदय एक हो जाँये तो सारा संसार स्वर्ग समान बन जायेगा. बहाई धर्म की प्रार्थना है कि एक कर दे हृदय अपने सेवकों के हे प्रभु, निज महान उद्देश्य उन पर कर प्रगट मेरे विभो. बहाउल्लाह ने कहा है कि सब धर्मों का सार मानव मात्र की एकता स्थापित करना है. यह आज के युग की समस्याओं का एकमात्र समाधान है. इसलिए हमें भी बहाउल्लाह की तरह अपनी इच्छा नहीं वरन् प्रभु की इच्छा और प्रभु की आज्ञा का पालन करते हुए प्रभु का कार्य करना चाहिए. परमात्मा ने बहाउल्लाह के माध्यम से हृदय की एकता का सन्देश पवित्र पुस्तक किताबे अकदस के द्वारा सारी मानव जाति को दिया.

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क्या है बहाई धर्म का आधार

ऐसा माना जाता है कि  200 वर्ष पूर्व भौतिकता का प्रभाव बढ़ जाने के कारण मानव से मानव की दूरियाँ बढ़ती जा रही थी और मानव जीवन दुखों से भरता जा रहा था तब दयालु परमपिता परमात्मा ने टुकडे़-टुकड़े में बंटे हुए मानव जीवन को ‘हृदयों की एकता’ के सूत्र में पिरोकर पारिवारिक एकता, विश्व एकता तथा मानव कल्याण के लिए बहाउल्लाह को धरती पर भेजा. मानव समाज आज नवीन और महान युग में प्रवेश कर रहा है. बहाउल्लाह का उद्देश्य आज के समाज को खंडित करने वाले परस्पर विरोधी विचारों की विविधता पर जोर न देकर उन्हें एक मिलन-बिन्दु पर लाना है. बहाउल्लाह का उद्देश्य अतीत काल के अवतारों की महानता अथवा उनकी शिक्षाओं के महत्व को कम करना नहीं बल्कि उनमें निहित आधारभूत सच्चाईयों को वर्तमान युग की आवश्यकताओं, क्षमताओं, समस्याओं और जटिलताओं के अनुरूप दुहराना है. बहाई धर्म की आधारशिला मानव मात्र की एकता है.

बहाई धर्म पूरे विश्व से मतभेद समाप्त कर एक शान्तिमय एवं खुशहाल विश्व समाज की परिकल्पना पर अवलम्बित है. बहाई धर्म विश्व का ऐसा धर्म है जो कि सारी दुनिया को प्रेम, एकता एवं आध्यात्मिकता के पवित्र सूत्र में बांधने के लिए कार्य कर रहा हैं.

बहाई धर्म के उद्देश्य

बहाई धर्म विश्व के समस्त धर्मो का समिश्रण है. बहाई धर्म एक ऐसा धर्म है जो किसी भी धर्म की अवहेलना नहीं करता बल्कि सभी धर्मो को एक समान समझता है व सभी धर्मो और उनके अवतारों व पैगम्बरों का आदर करना सिखाता है. बहाई धर्म परमात्मा और इसके अवतारों की एकता को स्वीकार करता हुआ व ’वसुधैव कुटुम्बकम्’ के सिद्धान्त का समर्थन व पोषण करता है. बहाई शिक्षाओं के अनुसार हमारे जीवन के मूलतः चार उद्देश्य हैं:-

  • परमात्मा को ‘जानना’ तथा उसकी ‘पूजा’ करना.परमात्मा को ‘जानने’ के मायने है युग-युग में विभिन्न अवतारों के माध्यम से दिये गये पवित्र ग्रन्थों में जाकर परमात्मा की इच्छा तथा आज्ञा को जानना तथा पूजा के मायने है प्रभु की इच्छा के अनुसार ‘प्रभु का कार्य’ करना.
  • प्रभु कार्य के लिए प्रगतिशील धर्म के अन्तर्गत युग-युग में परमात्मा की ओर से अवतरित अवतारांे राम, कृष्ण, बुद्ध, ईशु, मोहम्मद, गुरू नानक, महावीर, मोजज, अब्राहीम, बहाउल्लाह आदि तथा उनके द्वारा दिये गये पवित्र ग्रन्थों में उद्घाटित ईश्वरीय शिक्षायें जैसे – मर्यादा, न्याय, सम्यक ज्ञान, करूणा, भाईचारा, त्याग, अहिंसा, हृदय की एकता आदि आध्यात्मिक मूल्यों को धारण करना.
  • मनुष्य योनि में हमारा जन्म अपनी आत्मा के विकास के लिए हुआ है. हमें अपनी आत्मा के विकास द्वारा अगली दुनियाँ (दिव्य लोक) की तैयारी करना चाहिए. इस हेतु हमें अपने प्रत्येक कार्य-व्यवसाय को ‘प्रभु के कार्य’ की पवित्र भावना से करना चाहिए. हमारे प्रत्येक कार्य रोजाना परमात्मा की सुन्दर प्रार्थना बने.
  • परिवार, विद्यालय तथा समाज को मिलकर प्रत्येक बालक का बाल्यावस्था से ही भौतिक, सामाजिक तथा आध्यात्मिक गुणों का संतुलित विकास करने का वातावरण निर्मित करना चाहिए.इस प्रकार मानव सभ्यता को आगे बढ़ाकर उसके अंतिम लक्ष्य अर्थात धरती पर आध्यात्मिक सभ्यता स्थापित करने का प्रयत्न करना चाहिये.
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