उत्तराखंड संस्कृत अकादमी द्वारा संस्कृत के उत्थान, विकास और प्रचार-प्रसार हेतु उरूभंगम संस्कृत नाटक का प्रसिद्ध स्थानों पर मंचन

- परमार्थ निकेतन में उरूभंगम संस्कृत नाटक का हुआ मनमोहक मंचन
- महामण्डलेश्वर स्वामी असंगानन्द सरस्वती जी महाराज और स्वामी चिदानन्द सरस्वती जी महाराज ने दीप प्रज्वलित कर किया उरूभंगम संस्कृत नाटक का शुभारम्भ
- उत्तराखंड संस्कृत अकादमी द्वारा संस्कृत के उत्थान, विकास और प्रचार-प्रसार हेतु उत्तराखंड राज्य के प्रसिद्ध स्थानों पर किया जा रहा है उरूभंगम का मंचन
- हम जीवन पथ पर बिना अटके, बिना भटके बढ़ते रहे यही है ‘नाटक’- स्वामी चिदानन्द सरस्वती
ऋषिकेश, 21 फरवरी। परमार्थ निकेतन आश्रम में उरूभंगम नाटक का मनमोहक मंचन किया गया। परमार्थ निकेतन के सत्संग सभागार में महामण्डलेश्वर स्वामी असंगानन्द सरस्वती जी महाराज, स्वामी चिदानन्द सरस्वती जी महाराज, राष्ट्रीय स्वंय सेवक संघ के प्रांतीय कार्यवाहक श्री दिनेश सेमवाल जी, प्रदेश उपाध्यक्ष वी एच पी भारत गगन अग्रवाल जी, कार्यक्रम संयोजक संजू प्रसाद ध्यानी जी एवं अन्य विशिष्ट अतिथियों ने दीप प्रज्वलित कर उरूभंगम संस्कृत नाटक का शुभारम्भ किया गया।
उत्तराखंड संस्कृत अकादमी द्वारा संस्कृत के उत्थान, विकास, प्रचार-प्रसार, संस्कृत नाट्यविधा के संवर्धन एवं जनसामान्य को संस्कृत का अवबोध कराने हेतु उत्तराखंड राज्य के प्रसिद्ध स्थानों पर उरूभंगम का मंचन किया जा रहा है।


उरूभंग, महाकवि भास द्वारा लिखित प्राचीन संस्कृत नाटक है जिसकी रचना दूसरी और तीसरी शताब्दी ईसवी के मध्य की गयी थी जो महाकाव्य महाभारत पर आधारित है। महाकवि भास ने महाभारत की केन्द्रीय पट कथा को यथावत रखते हुये उसके परिपे्रक्ष्य को बदल दिया अर्थात महाभारत में दुर्योधन का चित्रण खलनायक के रूप किया गया है परन्तु भास रचित उरूभंगम् में दुर्योधन के मानवीय गुणों का चित्रण किया गया है। साथ ही भीम और दुर्योधन के बीच हुये युद्ध के पश्चात की घटना का वर्णन किया गया है।

परमार्थ निकेतन के परमाध्यक्ष स्वामी चिदानन्द सरस्वती जी महाराज ने नाटक के विषय में जानकारी देते हुये कहा, ’संसार भी एक नाटय शाला है, जीवन केवल नाटक बन कर न रह जाये उसका सारगर्भित सन्देश भी ग्रहण करें। नाटक अर्थात ना-अटक। हम जीवन पथ पर बिना अटके, बिना भटके बढ़ते रहे यही है ‘नाटक’। स्वामी जी ने कहा कि संस्कृत, विश्व की सबसे पुरानी और उल्लिखित भाषा है वर्तमान समय में विश्व की अत्यंत प्रसिद्ध संस्था नासा भी संस्कृत पर कार्य कर रही है। संस्कृत, कम्प्यूटर के लिये भी सबसे उपयुक्त भाषा है आगे आने वाले समय में संस्कृतज्ञ द्वारा निर्देशित सुपर कम्प्यूटर संस्कृत में भी कार्य करेंगे वैज्ञानिक इस ओर कार्य भी कर रहे है। संस्कृत को भारतीय संविधान में भी स्थान प्राप्त है अब जरूरत है तो उसे हृदय से स्वीकार करने की।’

स्वामी जी महाराज ने सभी का ध्यान पर्यावरण प्रदूषण और घटते जल स्तर की ओर आकर्षित करते हुये कहा कि भविष्य को बचाना है तो जल का संरक्षण करना नितांत आवश्यक है। उन्होने कहा कि जल है तो कल है। स्वामी जी महाराज के साथ नाटक का मंचन करने वाले छात्रों एवं विशिष्ट अतिथियों ने वाटर ब्लेसिंग सेरेमनी सम्पन्न की। स्वामी जी महाराज ने वहां उपस्थित सभी लोगो को पर्यावरण संरक्षण का संकल्प कराया। इस अवसर पर श्रीमती अनीता ममगाई जी, देवानन्द धसमाना जी, रंजनाथन केरवान जी, श्रीमती कुसुम कण्डवाल जी, श्री संजय शास्त्री, श्री भानु मित्र शर्मा जी, सुश्री नन्दबाला जी, सुश्री नन्दिनी त्रिपाठी जी, नरेेन्द्र बिष्ट, आचार्य संदीप शास्त्री, आचार्य दीपक शर्मा, राजेश दीक्षित, लक्की सिंह, आचार्य प्रिंस, अनेक देशी -विदेशी सैलानी, परमार्थ गुरूकुल के ऋषिकुमार और अन्य विशिष्ट अतिथि उपस्थित थे।
Editorial Review Note
Written by Religion World — Bhavya Srivastava is the founder of Religion World and a veteran journalist with over 18 years of experience across broadcast, print, and digital media. A founding member of the International Association of Religion Journalists (IARJ), he has spent much of his career reporting on and producing content about religion, faith, and spirituality. View full profile →.
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