सूरदास जयंती विशेष 2019 – श्री कृष्णलीला से जिन्होंने जन-जन में वात्सल्य भाव जगाया
कान्हा की अठखेलियों, नंदलाल और यशोदा मैया के बालगोपाल की बाल सुलभ शरारतों को देख सुनकर आप सब बड़े हुए हैं. और कहीं न कहीं अपने नन्हे मुन्नों में भी कान्हा की छवि देखते हैं. पर क्या जानते हैं जिन्होंने हमारा कृष्ण की लीलाओं से परिचय कराया, जिन्होंने सम्पूर्ण संसार के ह्रदय में वात्सल्य भाव जगाया, जिन्होंने श्री कृष्णा का कितना गुणगान किया उन्होंने कभी श्री कृष्णा को देखा ही नहीं. हम बात कर रहे हैं महाकवि सूरदास की जिनके बारे में कहा जाता था कि वो जन्मांध थे.
कृष्ण भक्ति की धारा में सूरदास का नाम सर्वोपरि लिया जाता है. कहते हैं कि सूरदास जन्मांध थे लेकिन उन्होंने इश्वर के उस रूप के दर्शन किये जिसे कोई नहीं कर पाया. अपने गुरु वल्लभाचार्य के दिखाए मार्ग पर सूरदास ने श्री कृष्ण की जो लीला देखी उसे उनके शब्दों में चित्रित होते हुए हम भी देखते हैं.
कब मनाई जाती है सूरदास जी की जयंती
सूरदास की जन्मतिथि को लेकर पहले मतभेद था, लेकिन पुष्टिमार्ग के अनुयायियों में प्रचलित धारणा के अनुसार सूरदास जी को उनके गुरु वल्लाभाचार्य जी से दस दिन छोटा बताया जाता है. वल्लाभाचार्य जी की जयंती वैशाख कृष्ण एकादशी को मनाई जाती है. इसके गणना के अनुसार सूरदास का जन्म वैशाख शुक्ल पंचमी को माना जाता है. इस कारण प्रत्येक वर्ष सूरदास जी की जयंती इसी दिन मनाई जाती है. आज वैशाख शुक्ल पंचमी है. आइये आज एक नज़र डालते हैं महाकवि सूरदास के जीवन पर-
जीवन परिचय
सूरदास के जन्म को लेकर विद्वानों के मत अलग-अलग हैं. कुछ उनका जन्म स्थान गांव सीही को मानते हैं जो कि वर्तमान में हरियाणा के फरीदाबाद जिले में पड़ता है तो कुछ मथुरा-आगरा मार्ग पर स्थित रुनकता नामक ग्राम को उनका जन्मस्थान मानते हैं. मान्यता है कि 1478 ई. में इनका जन्म हुआ था. सूरदास एक निर्धन सारस्वत ब्राह्मण परिवार में जन्में थे. इनके पिता रामदास भी गायक थे.
जन्मंधता की बात में विद्वानों में मतभेद
महाकवि सूरदास के जन्मांध होने को लेकर भी विद्वान एकमत नहीं हैं. दरअसल इनकी रचनाओं में जो सजीवता है जो चित्र खिंचते हैं, जीवन के विभिन्न रंगों की जो बारीकियां हैं उन्हें तो अच्छी भली नज़र वाले भी बयां न कर सकें इसी कारण इनके अंधेपन को लेकर शंकाएं जताई जाती हैं.
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गुरु वल्लभाचार्य से मुलाकात
ऐसा कहा जाता है कि महाकवि सूरदास बचपन से साधु प्रवृति के थे. जल्द ही ये बहुत प्रसिद्ध भी हो गये थे. लेकिन इनका मन वहां नहीं लगा और अपने गांव को छोड़कर समीप के ही गांव में तालाब किनारे रहने लगे. जल्द ही ये वहां से भी चल पड़े और आगरा के पास गऊघाट पर रहने लगे जहाँ सूरदास जल्द ही स्वामी के रूप में प्रसिद्ध हो गये. यहीं पर इनकी मुलाकात वल्लभाचार्य जी से हुई जिन्होंने सूरदास जी को पुष्टिमार्ग की दीक्षा दी और श्री कृष्ण की लीलाओं का दर्शन करवाया. वल्लभाचार्य ने इन्हें श्री नाथ जी के मंदिर में लीलागान का दायित्व सौंपा जिसे ये जीवन पर्यंत निभाते रहे.
कैसे हुआ देहावसान
मान्यता है कि इन्हें अपने देहावसान का आभास पहले से ही हो गया था. इनकी मृत्यु का स्थान गांव पारसौली माना जाता है. मान्यता है कि यहीं पर भगवान श्री कृष्ण ने रासलीला की थी. श्री नाथ जी की आरती के समय जब सूरदास वहां मौजूद नहीं थे तो वल्लाभाचार्य को आभास हो गया था कि सूरदास का अंतिम समय निकट है. उन्होंने अपने शिष्यों को संबोधित करते हुए इसी समय कहा था कि पुष्टिमार्ग का जहाज़ जा रहा है जिसे जो लेना हो ले सकता है. आरती के बाद सभी सूरदास जी के निकट आये. तो अचेत पड़े सूरदास जी में चेतना आयी.
गुरु और ईश्वर में कोई अंतर नहीं
कहते हैं कि जब उनसे सभी ज्ञान ग्रहण कर रहे थे तो चतुर्भुजदास जो कि वल्लाभाचार्य के ही शिष्य थे ने जिज्ञासावश पूछा कि सूरदास ने सदैव भगवद्भक्ति के पद गाये हैं गुरुभक्ति में कोई पद नहीं गाया. तब सूरदास ने कहा कि उनके लिये गुरु व भगवान में कोई अंतर नहीं है जो भगवान के लिये गाया वही गुरु के लिये भी
Editorial Review Note
Written by Religion World — Bhavya Srivastava is the founder of Religion World and a veteran journalist with over 18 years of experience across broadcast, print, and digital media. A founding member of the International Association of Religion Journalists (IARJ), he has spent much of his career reporting on and producing content about religion, faith, and spirituality. View full profile →.
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