मातृत्व का शिखर स्वरुप “मां छिन्नमस्ता”
श्री काली कुल और दशमहाविद्या की अत्युत्म शक्ति मां छिन्नमस्ता पूरे संसार में अपने अद्भुत स्वरुप के लिए विख्यात हैं। मां काली के इस स्वरुप के इतने गूढ़ अर्थ हैं जिन्हें शब्द ब्रम्ह में भी समाहित करना असंभव है। माता काली अपने आद्या स्वरुप में अगर ब्रम्हांड की क्रियात्मक शक्ति हैं और उनका तारा स्वरुप अगर संसार के निर्माण की शक्ति हैं तो मां छिन्नमस्ता संसार का पालन करने वाली शक्ति है।

मां छिन्नमस्ता के इस स्वरुप से उनके जगत का पालन करने का आभास होता है। ये जगत क्षुधा की अग्नि के नियमन से ही चलता है। वो क्षुधा उदर की हो या फिर काम वासना की । इसी लिए मां के इस स्वरुप में दोनों ही भूखों से परे जाने का दर्शन मिलता है। मां को कामेश्वरी भी कहा जाता है। क्योंकि मां छिन्नमस्ता कामदेव और रति के उपर विराजित हैं। इसका एक अर्थ यह भी है कि काम वासना के दमन या फिर रुपांतरण के बाद ही साधना का मार्ग प्रशस्त होता है।

माता छिन्नमस्ता का ये स्वरुप दार्शनिकों और साधकों के लिए हमेशा से एक रहस्य रहा है
माता छिन्नमस्ता का वर्णन कई पुराणों, श्री भैरव तंत्र और शाक्त मत के महत्वपूर्ण ग्रंथ शाक्त प्रमोद में विस्तार से किया गया है। माता के दो प्रसिद्ध मंदिर झारखंड के रजरप्पा और हिमाचल के चिंतापूर्णी में हैं। जहां रजरप्पा में मां का स्वरुप उग्र है वहीं चिंतापूर्णी में माता अपने मातृत्व के शिखर पर हैं।
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लेखक – अजीत कुमार मिश्रा
संपर्क – ajitkumarmishra78@gmail.com
Editorial Review Note
Written by Religion World — Bhavya Srivastava is the founder of Religion World and a veteran journalist with over 18 years of experience across broadcast, print, and digital media. A founding member of the International Association of Religion Journalists (IARJ), he has spent much of his career reporting on and producing content about religion, faith, and spirituality. View full profile →.
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