आइये जानते हैं विवाह मुहूर्त, मुहूर्त संशोधन, कुंडली मिलान और त्रिबल शुद्धि क्या है

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आइये जानते हैं विवाह मुहूर्त, मुहूर्त संशोधन, कुंडली मिलान और त्रिबल शुद्धि क्या है

उत्तम मुहूर्त में शादी करने से वर-वधू का दांपत्य जीवन सुखमय बीतता है. बाधाएं उपस्थित नहीं होतीं हैं.अतः विवाह शुभ लग्न व मुहूर्त के साथ-साथ शुद्ध मंत्रोच्चार व विधि विधान से ही होना चाहिए. सभी ग्रह अपनी अपनी उपस्थिति जीवित अवस्था में बताते हैं यथा ब्रह्मांड तथा पिंडे के कथन के अनुसार प्रत्येक व्यक्ति सभी ग्रहों से पूर्ण है. संसार में पिता के रूप में सूर्य, माता के रूप में चंद्र भाई के और पति के रूप में मंगल, बहन, बुआ और बेटी के रूप में बुध, धर्म और भाग्य के प्रदाता तथा शिक्षा को देने वाले गुरु के रूप में वृहस्पति, पत्नी और भौतिक संपन्नता के रूप में शुक्र, जमीन-जायदाद कार्य तथा काम करने वाले लोगों के रूप में शनि, ससुराल और दूर के संबंधियों के रूप में राहु, पुत्र, भांजा साले आदि के रूप में केतु जीवित रूप में माने जाते हैं. इन सभी ग्रहों के अनुसार व्यक्ति के लिए विवाह मुहूर्त बनाए गए हैं, जिस प्रकार की प्रकृति व्यक्ति के अंदर होती है उसी प्रकार के ग्रह की शक्ति के समय में विवाह किया जाता है. जब स्त्री और पुरुष के आपसी संबंधों के लिए विवाह मिलान किया जाता है तथा दोनों के ग्रहों को राशि स्वामियों के अनुसार समय को तय किया जाता है तभी विवाह किया जाता है, और उसी ग्रह के नक्षत्र के समय में लगन और समय निकाल कर विवाह किया जाता है.

कैसे होता है मुहूर्त संशोधन

पंडित दयानंद शास्त्री के अनुसार हिंदुओं में शुभ विवाह की तिथि वर-वधू की जन्म राशि के आधार पर निकाली जाती है. वर या वधू का जन्म जिस चंद्र नक्षत्र में हुआ होता है उस नक्षत्र के चरण में आने वाले अक्षर को भी विवाह की तिथि ज्ञात करने के लिए प्रयोग किया जाता है. विवाह कि तिथि सदैव वर-वधू की कुंडली में गुण-मिलान करने के बाद निकाली जाती है. विवाह की तिथि तय होने के बाद कुंडलियों का मिलान नहीं किया जाता.

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क्यों किया जाता है कुंडली मिलान

विवाह स्त्री व पुरुष की जीवन यात्रा की शुरुआत मानी जाती है. पुरुष का बाया व स्त्री का दाहिना भाग मिलाकर एक-दूसरे की शक्ति को पूरक बनाने की क्रिया को विवाह कहा जाता है. भगवान शिव और पार्वती को अ‌र्द्धनारीश्वर की संज्ञा देना इसी बात का प्रमाण है. ज्योतिष में चार पुरुषार्थो में काम नाम का पुरुषार्थ विवाह के बाद ही पूर्ण होता है.

क्या विवाह मुहूर्त में जरूरी है त्रिबल शुद्धि

पंडित दयानंद शास्त्री के अनुसार विवाह मुहूर्त के लिए मुहूर्त शास्त्रों में शुभ नक्षत्रों और तिथियों का विस्तार से विवेचन किया गया है. उत्तराफाल्गुनी, उत्तराषाढ़, उत्तराभाद्रपद,रोहिणी, मघा, मृगशिरा, मूल, हस्त, अनुराधा, स्वाति और रेवती नक्षत्र में, 2, 3, 5, 6, 7, 10, 11, 12, 13, 15 तिथि तथा शुभ वार में तथा मिथुन, मेष, वृष, मकर, कुंभ और वृश्चिक के सूर्य में विवाह शुभ होते हैं. मिथुन का सूर्य होने पर आषाढ़ के तृतीयांश में, मकर का सूर्य होने पर चंद्र पौष माह में, वृश्चिक का सूर्य होने पर कार्तिक में और मेष का सूर्य होने पर चंद्र चैत्र में भी विवाह शुभ होते हैं.

पंडित दयानंद शास्त्री के अनुसार विवाह मुहूर्त का विचार करते समय वर के लिए सूर्य का बल, कन्या के लिए बृहस्पति (गरू) का बल और वर-कन्या दोनों के लिए चंद्रमा के बल का विचार किया जाता है. यदि सूर्य, चंद्रमा तथा गुरू का बल पूर्ण नहीं हो तो विवाह नहीं किया जाता है. क्योंकि वर-कन्या के विवाह के समय गुरू जीवनदाता एवं भाग्य विधाता होते हैं. चंद्रमा धन देने वाले तथा मानसिक शांति प्रदान करते हैं. इसी प्रकार सूर्य तेज प्रदान करते हैं. कहने का अभिप्राय यह है कि ये सब ग्रह यदि विवाह के समय पूर्ण अनुकूल हों तो सर्वथा उत्तम हैं. वर-वधु के लिए सौभाग्यशाली होते हैं.

जन्म लग्न से अथवा जन्म राशि से अष्टम लग्न तथा अष्टम राशि में विवाह शुभ नहीं होते हैं. विवाह लग्न से द्वितीय स्थान पर वक्री पाप ग्रह तथा द्वादश भाव में मार्गी पाप ग्रह हो तो कर्तरी दोष होता है, जो विवाह के लिए निषिद्ध है. इन शास्त्रीय निर्देशों का सभी पालन करते हैं, लेकिन विवाह मुहूर्त में वर और वधु की त्रिबल शुद्धि का विचार करके ही दिन एवं लग्न निश्चित किया जाता है. कहा भी गया है—

स्त्रीणां गुरुबलं श्रेष्ठं पुरुषाणां रवेर्बलम्.

तयोश्चन्द्रबलं श्रेष्ठमिति गर्गेण निश्चितम्..

अत: स्त्री को गुरु एवं चंद्रबल तथा पुरुष को सूर्य एवं चंद्रबल का विचार करके ही विवाह संपन्न कराने चाहिए. सूर्य, चंद्र एवं गुरु के प्राय: जन्मराशि से चतुर्थ, अष्टम एवं द्वादश होने पर विवाह श्रेष्ठ नहीं माना जाता. सूर्य जन्मराशि में द्वितीय, पंचम, सप्तम एवं नवम राशि में होने पर पूजा विधान से शुभफल प्रदाता होता है. गुरु द्वितीय, पंचम, सप्तम, नवम एवं एकादश शुभ होता है तथा जन्म का तृतीय, षष्ठ व दशम पूजा से शुभ हो जाता है. विवाह के बाद गृहस्थ जीवन के संचालन के लिए तीन बल जरूरी हैं— देह, धन और बुद्धि बल. देह तथा धन बल का संबंध पुरुष से होता है, लेकिन इन बलों को बुद्धि ही नियंत्रित करती है. बुद्धि बल का स्थान सर्वोपरि है, क्योंकि इसके संवर्धन में गुरु की भूमिका खास होती है. यदि गृहलक्ष्मी का बुद्धि बल श्रेष्ठ है तो गृहस्थी सुखद होती है, इसलिए कन्या के गुरु बल पर विचार किया जाता है. चंद्रमा मन का स्वामी है और पति-पत्नी की मन:स्थिति श्रेष्ठ हो तो सुख मिलता है, इसीलिए दोनों का चंद्र बल देखा जाता है. सूर्य को नवग्रहों का बल माना गया है. सूर्य एक माह में राशि परिवर्तन करता है, चंद्रमा 2.25 दिन में, लेकिन गुरु एक वर्ष तक एक ही राशि में रहता है. यदि कन्या में गुरु चतुर्थ, अष्टम या द्वादश हो जाता है तो विवाह में एक वर्ष का व्यवधान आ जाता है.

चंद्र एवं सूर्य तो कुछ दिनों या महीने में राशि परिवर्तन के साथ शुद्ध हो जाते हैं, लेकिन गुरु का काल लंबा होता है. सूर्य, चंद्र एवं गुरु के लिए ज्योतिषशास्त्र के मुहूर्त ग्रंथों में कई ऐसे प्रमाण मिलते हैं, जिनमें इनकी विशेष स्थिति में यह दोष नहीं लगता. गुरु-कन्या की जन्मराशि से गुरु चतुर्थ, अष्टम तथा द्वादश स्थान पर हो और यदि अपनी उच्च राशि कर्क में, अपने मित्र के घर मेष तथा वृश्चिक राशि में, किसी भी राशि में होकर धनु या मीन के नवमांश में, वर्गोत्तम नवमांश में, जिस राशि में बैठा हो उसी के नवमांश में अथवा अपने उच्च कर्क राशि के नवमांश में हो तो शुभ फल देता है.

त्रिबल विचार के लिए वर-कन्या की जन्म राशि से तत्समय जिन-जिन राशियों में गुरू-सूर्य तथा चंद्र विचरण कर रहे हों, वहां तक गिनती की जाती है तथा इनका निर्णय निम्न प्रकार से करते हैं-

वर के लिए सूर्य विचार- यदि वर की राशि से वर्तमान राशि में गतिशील सूर्य गिनती करने पर चौथे, आठवें या बारहवें स्थान में पड़ें तो ऎसे समय में विवाह नहीं करें यह पूर्णरू पेण अशुभ है. यदि पहले, दूसरे, पांचवें, सातवें या नवें स्थान में सूर्य पड़े तो सूर्य पड़े तो सूर्य के दान और पूजादि करके विवाह शुभ हो सकता है. वक्री राशि से यदि सूर्य तीसरे, छठे, दशवें या ग्यारहवें स्थानों में हों तो विवाह अधिक शुभप्रद होता है.

कन्या के लिए बृहस्पति विचार- कन्या की राशि से वर्तमान राशि में गतिशील गुरू यदि चौथे, आठवें या बारहवें स्थान में पड़े तो विवाह अशुभ होगा. ऎसे समय में विवाह नहीं करें. यदि पहले, तीसरे, छठे या दशवें स्थान में गुरू हों तो दान-पूजादि करने पर ही शुभकारक होता है. यदि दूसरे, पांचवे, सातवें, नौवें या ग्यारहवें स्थान में गुरू हों तो शुभप्रद होंगे. यानी विवाह करना शुभ रहेगा.

चंद्र विचार [दोनों के लिए]- यदि वर-कन्या दोनों की राशि से चंद्रमा चौथे, आठवें या बारहवें स्थान में पड़े तो अशुभ है. ऎसे में विवाह नहीं करें. अन्य सभी स्थानों पर चंद्रमा के रहते विवाह करना शुभ रहेगा.

सारांश यह है कि सूर्य-चंद्र तथा गुरू तीनों ही विवाह के समय यदि चौथे, आठवें या बारहवें स्थान पर पड़ें तो अशुभ होते हैं. इस समय विवाह नहीं करें. कुछ शास्त्रकार पुरूष के लिए बारहवें चंद्रमा को शुभ मानते हैं, परन्तु स्त्री के लिए बारहवां चंद्रमा सर्वथा निषिद्ध है. इसी प्रकार त्रिबल [सूर्य-चंद्र तथा गुरू] विचार में ग्यारहवां स्थान सर्वथा शुभ होता है.

सिंह राशि भी गुरु की मित्र राशि है, लेकिन सिंहस्थ गुरु वर्जित होने से मित्र राशि में गणना नहीं की गई है. भारत की जलवायु में प्राय: 12 वर्ष से 14 वर्ष के बीच कन्या रजस्वला होती है. अत: बारह वर्ष के बाद या रजस्वला होने के बाद गुरु के कारण विवाह मुहूर्त प्रभावित नहीं होता है.

ज्योतिषाचार्य पंडित दयानंद शास्त्री जी 

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